6/26/2022

लोक प्रशासन की प्रकृति, क्षेत्र

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प्रश्न; क्या आप मानते हैं कि लोक प्रशासन एक विज्ञान हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए। 

अथवा" लोक प्रशासन का विषय-क्षेत्र क्या हैं? विवेचना कीजिए।

अथवा" लोक प्रशासन के क्षेत्र से संबंधित "पोस्डकॉर्ब" दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए।

अथवा" लोक प्रशासन की प्रकृति का वर्णन कीजिए। 

उत्तर-- 

लोक प्रशासन की प्रकृति (lok prashasan ki prakriti)

हम पिछले लेख में यह जान चुके हैं कि लोक प्रशासन का अर्थ क्या है? अब हम इस विषय की प्रकृति पर विचार करेंगे। लोक प्रशासन एक गतिशील विषय है जिसकी प्रकृति में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है। इस विषय के स्वरूप पर बदलती हुई सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों एवं अन्य संबंधित सामाजिक विज्ञानों का व्यापक प्रभाव पड़ा है। सामान्यतया लोक प्रशासन की प्रकृति पर दो दृष्टियों से विचार किया जाता है-- प्रथम इस दृष्टि से कि यह विज्ञान है या कला या दोनों का समन्वित रूप, दूसरा इस दृष्टि से कि इस विषय के अंतर्गत किन क्रियाकलापों का अध्ययन किया जाना चाहिए।

लोक प्रशासन कला है या विज्ञान 

लोक प्रशासन के स्वरूप के बारे में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे कला और विज्ञान दोनों मानते हैं, किन्तु अन्य विद्वानों के अनुसार यह विज्ञान नही हो सकता हैं। डाॅ. अवस्थी एवं माहेश्वरी के शब्दों में," लोक प्रशासन का प्रयोग दो अर्थों में किया जा सकता हैं। प्रथम, अर्थ में लोक प्रशासन का शासकीय मामलों के संचालन की विधि अथवा प्रक्रिया के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। द्वितीय, यह बौद्धिक अन्वेषण का क्षेत्र भी माना जाता हैं। अपने प्रथम रूप में लोक प्रशासन एक प्रक्रिया है तथा दूसरे रूप में अध्ययन का विषय। एक प्रक्रिया के रूप में लोक प्रशासन निश्चित ही कला हैं। परन्तु प्रश्न यह कि क्या शासकीय मामलों के अध्ययन के विषय के रूप में लोक प्रशासन को विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती हैं। 

विज्ञान और लोक प्रशासन 

आधुनिक युग विज्ञान की प्रधानता का युग है और विज्ञान को विशेष सम्मान प्राप्त हैं। विज्ञान के साथ सम्बद्ध होने वाले विषय की महिमा बढ़ जाती है। लोक प्रशासन की वैज्ञानिकता की स्थापना करने वाले अधिकांश विचारक संयुक्त राज्य अमेरिका के है। इन विचारकों ने रसायन विज्ञान तथा भौतिक विज्ञान की तरह प्रशासन के नियमों की खोज कर इसे वैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। इससे वहाँ यह विवाद उत्पन्न हुआ कि लोक प्रशासन को विज्ञान माना जा सकता है अथवा नहीं? 

लोक प्रशासन वैज्ञानिकता के पक्ष में तर्क 

लोक प्रशासन विज्ञान है या नही? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिये हमें लोक प्रशासन को भी विज्ञान के मापदंडों की कसौटी पर कसकर इसका मूल्‍यांकन करना पड़ेगा। इस संबंध में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-- 

1. लोक प्रशासन के नियम या सिद्धांत भी विज्ञान की तरह निश्चित होते हैं। उदाहरण के लिए लोक-प्रशासन के सिद्धांत विकेंद्रीकरण, कार्य-विभाजन द्वारा प्रशासन लक्ष्य प्राप्त करने का सिद्धांत, प्रत्यायोजन का सिद्धांत एवं पद-सोपान प्रणाली आदि वैज्ञानिक और निश्चित सिद्धांत हैं। 

2. लोक प्रशासन का अध्ययन भी विज्ञान की तरह सुसंगठित और क्रमबद्ध होता है इसके सिद्धांत और संगठन में क्रमबद्धता पाई जाती है, वे एक-दूसरे में सुस्पष्ट होते हैं। 

3. लोक प्रशासन में भी भविष्यवाणी की जा सकती हैं। अनुशासन एवं कार्यकुशलता का ध्यान रखकर प्रशासन के निश्चित लक्ष्य प्राप्त किये जा सकते हैं। 

4. लोक-प्रशासन के सिद्धांत भी विज्ञान की तरह सर्वव्यायी होते हैं। ।

लोक प्रशासन की वैज्ञानिकता के विपक्ष में तर्क

अनेक विचारक लोक प्रशासन को विज्ञान नहीं मानते। लोक प्रशासन को विज्ञान न मानने के निम्नलिखित कारण बताये जाते हैं--

1. सर्वमान्य नियम तथा सिद्धांत नहीं 

प्राकृतिक विज्ञानों में कई सर्वमान्य नियम तथा सिद्धांत होते है। यह नियम अटल है। लोक प्रशासन में ऐसे सर्वमान्य सिद्धांत तथा नियम नहीं है। किसी समाज में लोक प्रशासन में अधिकारी बहुत शक्ति सम्पन्न होते हैं तो किसी समाज में अधिकारियों को कम शक्तियाँ देना उचित होता है। इस प्रकार समाज की आवश्‍यकतानुसार नियम निर्धारित होते हैं। सर्वमान्य सिद्धांत तथा नियम नहीं बनाये जा सकते। 

2. लोक प्रशासन में पर्यवेक्षण असंभव 

प्राकृतिक विज्ञानों में सत्य बात कहने के लिए प्रयोगशालाओं में परीक्षण, निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण किया जा सकता हैं। लोक प्रशासन में ऐसी कोई प्रयोगशाला नहीं होती। इसमें सत्य जानने की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं होती। इनमें तथ्यों का सत्यापन नहीं हो सकता। 

3. लोक प्रशासन की मूल्यात्मकता 

प्राकृतिक विज्ञानों में ठोस नियम तथा तथ्य होते है। वह नियम तथा तथ्य अच्छे है या बूरे, उचित हैं या अनुचित, नैतिक हैं अथवा अनैतिक, इन पर कोई विचार नहीं होता। लोक प्रशासन में इन मूल्यों (Values) पर विचार होता हैं। प्रत्‍येक प्रश्‍न की समस्या का औचित्य देखा जा सकता हैं। डाॅ. भाम्भरी के अनुसार," मूल्यों तथा गुणों का जो प्रशासनिक तथ्यों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध होते हैं, वैज्ञानिक रूप से अध्ययन नहीं किया जा सकता, तब फिर लोक प्रशासन को विज्ञान कैसे कहा जा सकता हैं?

4. निश्चितता का अभाव

लोक प्रशासन को विज्ञान न मानने का यह भी एक कारण है कि इसमें निश्चितता का अभाव हैं। लोक प्रशासन के निष्कर्ष पूर्णता से वंचित रहते हैं। इसके विपरीत प्राकृतिक विज्ञानों के नियमों में निश्चितता रहती हैं। भौतिक विज्ञान के गुरुत्वाकर्षण की भाँति प्राकृतिक विज्ञानों के अन्य नियम भी अटल होते हैं। वे हर काल और हर स्थान में लागू होते हैं। लोक प्रशासन में यह निश्चितता नहीं पायी जाती हैं। अतः उसे विज्ञान की संज्ञा नहीं दी जा सकती हैं। 

लोक प्रशासन एक सामाजिक विज्ञान हैं 

उपरोक्त तर्कों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लोक प्रशासन एक विज्ञान हैं, परन्तु यह अन्य विज्ञानों की तरह प्राकृतिक विज्ञान नहीं हैं, बल्कि यह एक सामाजिक विज्ञान हैं। डाॅ. अवस्थी एवं माहेश्वरी के अनुसार," सभी विज्ञानों को मोटे रूप में तीन समूहों में बाँटा जा सकता हैं। पहला, पदार्थ का ज्ञान जिसे प्राकृतिक विज्ञान कहते हैं। दूसरा, मानव जीवन का विज्ञान जिसे मानविकी कहते हैं। तीसरा, समूह विज्ञान जिसे सामाजिक विज्ञान की संज्ञा दी जाती हैं। लोक प्रशासन एक सामाजिक विज्ञान हैं। 

लोक प्रशासन एक कला के रूप में 

लोक प्रशासन के दो अर्थ हैं-- एक तो लोक प्रशासन जो एक शासन की समस्‍त प्रक्रिया का नाम हैं; और दूसरा, लोक प्रशासन शासन प्रक्रिया के अध्ययन का नाम है। शासन की प्रक्रिया के रूप में लोक प्रशासन एक कला है। सूक्ष्म दृष्टिकोण से देखने पर ज्ञात होता है कि लोक प्रशासन भी एक कला है। इसके करने के लिए विशेष दक्षता और योग्यता की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार चित्रकारी का ज्ञान न रखने वाला चित्रकार नहीं बन सकता हैं, उसी प्रकार दक्षता तथा योग्यता न होने पर शासन का कार्य नहीं चलाया जा सकता। कला के माध्यम से मानव भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है, उसी प्रकार शासन भी मानव की इच्छाओं को साकार रूप देता है। मानव की बेहतर शासन व्यवस्था की इच्छा को यह अभिव्यक्ति देता है। कला पर समाज की संस्कृति तथा उसके परिवेश का प्रभाव पड़ता है। लोक प्रशासन में भी शासन की गतिविधियों का, सामाजिक आवश्यकताओं का प्रभाव पड़ता है तथा लोक प्रशासन उसी के अनुरूप ढलने का प्रयास करता हैं। लोक प्रशासन अपने सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवेश से कला की ही भाँति प्रभावित होता है। इसीलिए लोक प्रशासन भी एक कला हैं। 

अवस्थी एवं माहेश्वरी का कहना हैं," लोक प्रशासन चाहे कितना ही भौतिक व समाज की जड़ बातों से संबंधित हो, उसका मुख्य उद्देश्य एक नये समाज की रचना करना या उसके निर्माण में योग देना हैं। प्रशासन का सुख एक कलाकार का सुख है और उसे अपने कार्य से वैसा ही सन्तोष मिलता है, जैसा कि एक कलाकार को अपने कला को आँखों से देखने पर मिलता हैं।

निष्कर्ष 

चार्ल्स वर्थ की भाँति यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि लोक प्रशासन विज्ञान भी है तथा कला भी। उन्हीं के शब्दों में," प्रशासन कला है क्योंकि इसमें उत्तमता, नेतृत्‍व, उत्साह तथा उच्च विचारों की आवश्यकता होती है। यह एक विज्ञान है, क्योंकि इसमें निगमनात्मक विश्लेषण, सतर्कता युक्त नियोजन तथा विवेकपूर्ण साधनों की आवश्यकता हैं।

लोक प्रशासन का विषय-क्षेत्र (lok prashasan ka kshera)

लोक प्रशासन की प्रकृति को समझने के उपरान्त आप यह जानेंगे कि इस विषय के अंतर्गत किन तथ्यों तथा समस्याओं का अध्ययन किया जाता है, अर्थात लोक प्रशासन का अध्ययन क्षेत्र क्या है? जिस प्रकार आपने इस विषय की परिभाषा तथा इसके स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों में तीव्र मतभेद पाया, उसी प्रकार का मतभेद विषय के अध्ययन क्षेत्र के सम्बन्ध में भी पाया जाता है। 

लोक प्रशासन के क्षेत्र के विषय मे कई दृष्टिकोण प्रचलित है। राजनीति विज्ञान विषय की भांति ही लोक प्रशासन क्षेत्र की सीमा-रेखा करना भी कठिन कार्य है। विद्वानों मे इसके अध्ययन क्षेत्र के संबंध मे बड़ा मतभेद है। इसके क्षेत्र की सीमा-रेखा तय करना इसलिए कठिन प्रतीत होता है कि तुलनात्मक दृष्टि से यह एक नया विषय है तथा क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित ज्ञान के रूप मे इसका जन्म हाल ही के वर्षों की घटना है। साथ ही यह एक विकासशील शास्त्र भी है और लोक कल्याणकारी राज्य के क्षेत्र विस्तार के कारण लोक प्रशासन के क्षेत्र मे भी निरंतर परिवर्तन हो रहा है तथा विषय अत्यधिक गतिशील बन रहा है। 

आधुनिक युग में लोक प्रशासन के क्षेत्र के विषय में निम्नलिखित दृष्टिकोण प्रचलित हैं-- 

1. संकुचित दृष्टिकोण 

इस दृष्टिकोण के अनुसार लोक प्रशासन का सम्बन्ध शासन की कार्यपालिका शाखा से है, इसलिए इसके अंतर्गत केवल कार्यपालिका से सम्बन्धित कार्यों का अध्ययन किया जाना चाहिए। हर्वर्ट साइमन तथा लूथर गुलिक जैसे विद्वान इस दृष्टिकोण के समर्थक है। इस दृष्टिकोण को स्वीकार करने पर लोक प्रशासन के क्षेत्र के अंतर्गत निम्नलिखित बातें सम्मिलित की जा सकती हैं-- कार्यरत कार्यपालिका अर्थात असैनिक कार्यपालिका का अध्ययन, सामान्य प्रशासन का अध्ययन, संगठन सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन, कार्मिक प्रशासन का अध्ययन, वित्तीय प्रशासन का अध्ययन और प्रशासनिक उत्तरदायित्व एवं उपलब्धियों का अध्ययन।

2. व्यापक दृष्टिकोण 

कुछ विद्वानों का कहना है कि लोक प्रशासन के क्षेत्र में सरकार के तीनों अंगों-- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्य सम्मिलित करना आवश्यक हैं। इस दृष्टिकोण द्वारा लोक प्रशासन का विषय-क्षेत्र सरकार के सैनिक, असैनिक, राजनीतिक, सार्वजनिक, आन्तरिक या बाह्य सभी प्रकार के कार्यों तक विस्‍तृत हो जाता हैं। 

3. पोस्डकार्ब दृष्टिकोण 

यह लोक प्रशासन के क्षेत्र में 'लूथर गुलिक, का दृष्टिकोण हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार लोक प्रशासन के क्षेत्र में योजनाएँ बनाना, संगठन करना, कर्मचारियों की व्यवस्था करना, निर्देशन करना तथा समन्वय करना, रिपोर्ट तैयार करना एवं बजट तैयार करना सम्मिलित हैं। इन सभी कार्यों के लिए प्रत्युत अंग्रेजी शब्दों के प्रथम अक्षरों के संयोग से Posdcord शब्द बना हैं। इस प्रकार Posdcord का अर्थ हैं-- 

1. P= Planning अर्थात् आयोजन 

किसी प्रशासनिक कार्य के सम्पादन अथवा उसके संगठन से पहले उसका आयोजन (Planning) किया जाना चाहिए। 

2. O= Organisation अर्थात् संगठन 

आयोजन के बाद प्रशासनिक कार्य के लिए संगठन जुटाया जाना चाहिए। 

3. S= Staffing अर्थात् कार्मिक संगठन 

में अधिकारी या कर्मचारी लगते हैं। इन सबको मिलाकर ही संगठन बनता हैं। 

4. D= Direction अर्थात् निर्देशन 

संगठन बन जाने के बाद कार्मिकों को उनके कार्य के अनुरूप निर्देशन दिया जाना चाहिए।

5. Co= Co-ordination अर्थात् समन्वय 

शासन के विभिन्न विभागों और कार्यों के बीच तालमेल बैठाना आवश्यक हैं। यही समन्वय हैं। 

6. R= Reporting अर्थात् प्रतिवेदन 

कार्य की प्रगति के संबंध में समय-समय पर उच्च अधिकारियों और जनता को प्रतिवेदन देते रहना चाहिए। 

7. B= Budgeting अर्थात् बजट 

समस्त प्रशासनिक कार्यों के लिए वित्तीय व्यवस्था आवश्यक हैं। यह बजट के अन्‍तर्गत ही आती हैं। 

इन सभी शब्दों के प्रारम्भिक अक्षरों को मिलाकर ही बना हैं POSDCORB । लूथर गुलिक के अनुसार यह सूत्र लोक प्रशासन के क्षेत्र का प्रतीक हैं।

पोस्डकॉर्ब की आलोचना 

एक ओर जहाँ पोस्डकॉर्ब को लोक प्रशासन के क्षेत्र और स्वरूप को प्रकट करने वाले सूत्र के रूप में विशेष महत्व मिला है, वहीं इस सूत्र की कूट आलोचना हुई हैं। पोस्डकॉर्ब दृष्टिकोण की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती हैं-- 

1. गतिशीलति की उपेक्षा

लोक प्रशासन एक गतिशील विधा है। विज्ञान के नए आविष्कारों ने इस विधा को अधिक गतिशील बना दिया है। प्रशासन के उपकरण बदल रहे हैं। तकनीक बदल रही है। इस संबंध मे भी पोस्डकॉर्ब कुछ नहीं करता।

2. सामाजिक परिवेश की उपेक्षा 

समय, स्थान और परिस्थितियों का भी लोक प्रशासन के चरित्र पर बहुत प्रभाव पड़ता हैं। प्रत्‍येक देश में लोक प्रशासन के क्षेत्र और प्रकृति में अंतर हो सकता हैं। लूथर गुलिक का सिद्धांत इस अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य की उपेक्षा करता है। 

3. अधूरा सिद्धांत 

यह लोक प्रशासन के समूचे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करता इसमें लोक प्रशासन के कई महत्वपूर्ण पक्ष छूट गए हैं; जैसे-- इसमें लोक संपर्क का कोई उल्लेख नहीं हैं। लोक संपर्क के बिना तो सफल लोक प्रशासन संभव ही नहीं हैं। इसी तरह लूथर गुलिक के सूत्र में बजट का समावेश हैं, परन्तु लेखांकन और लेखा परीक्षण का नहीं, अतः यह एक अधूरा सिद्धांत हैं। 

4. व्यावहारिक पक्ष की उपेक्षा 

'पोस्डकॉर्ब' के विरूद्ध एक तर्क यह है कि इसमें लोक प्रशासन के व्यावहारिक पक्ष की पूरी तरह उपेक्षा हुई हैं। लोक प्रशासन के सैद्धांतिक पक्ष का तो यह सूत्र प्रतिनिधित्व करता है परन्तु व्यावहारिक रूप से उठने वाली समस्याओं का इसमें कोई उल्लेख नहीं है। जैसे-- कार्मिक अधिकारियों के बीच उठने वाले विवादों का समाधान कैसे करें, पोस्डकॉर्ब इस सिद्धांत के बारे में मौन हैं। 

पोस्डकॉर्ब का महत्व 

उपरोक्त आलोचनाओं के बाद भी पोस्डकॉर्ब एक महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं। यह लोक प्रशासन के क्षेत्र एवं प्रकृति को केवल सूत्र में व्यक्त कर देता हैं। डाॅ. भाम्भरी के शब्दों में," पोस्डकॉर्ब क्रियाएं बड़े पैमाने के सभी संगठनों में की जाती हैं। यह प्रबंध संबंधी सामान्य समस्याएं हैं जो कि विभिन्न एजेंसियों में पाई जाती हैं।"

4. प्रबन्धकीय दृष्टिकोण 

इस दृष्टिकोण के समर्थक केवल उन्हीं प्रमाणों को प्रशासन मानते हैं जो किसी उद्यम सम्बन्धी कार्यों को पूरा करते हैं। प्रबन्धकीय कार्यों का लक्ष्य उद्यम की सभी क्रियाओं का एकीकरण, नियन्त्रण तथा समन्वय करना होता है जिससे  सभी क्रियाकलाप एक समन्वित प्रयत्न जैसे दिखाई देते हैं साइमन स्मिथबर्ग तथा थॉमसन इस दृष्टिकोण के समर्थक हैं जिनके अनुसार प्रशासन शब्द अपने संकुचित अर्थों में आचरण के उन आदर्शों को प्रकट करने के लिए प्रयोग किया जाता है जो अनेक प्रकार के सहयोगी समूहों में समान रूप से पाए जाते हैं। ये आदर्श न तो उस लक्ष्य विशेष पर ही आधारित होते हैं जिस की प्राप्ति के लिए वे सहयोग कर रहे हैं और न ही उन विशेष तकनीकी रीतियों पर ही अवलम्बित हैं जो उन लक्ष्यों हेतु प्रयोग की जाती है। इस विचार का पक्ष लेते हुए लूथर गुलिक ने भी लिखा है, " प्रशासन का सम्बन्ध कार्य पूरा किए जाने और निर्धारित उद्देश्यों की परिपूर्ति से है।" 

दूसरे शब्दों में इस विचार के समर्थक लोक प्रशासन को केवल कार्यपालिका शाखा की गतिविधियों तक ही सीमित कर देते हैं। 

5. एकीकृत दृष्टिकोण 

इस दृष्टिकोण के समर्थक लोक प्रशासन को लोक नीति को लागू करने और उसकी पूर्ति के लिए प्रयोग की गई गतिविधियों का योग मानते। इस प्रकार निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समन्धित की जाने वाली क्रियाओं का योग ही प्रशासन है, चाहे ये क्रियाएँ प्रबन्धकीय या तकनीकी हों विस्तृत रूप से सरकार की सभी गतिविधियाँ जो कार्यपालिका, विधानपालिका या न्यायपालिका से सम्बन्धित हैं लोक प्रशासन में शामिल हैं। एल. डी. व्हाइट, विल्सन, डीमाक और पिफनर आदि लेखकों ने इस विचार का समर्थन किया है। एल. डी. व्हाइट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है, " लोक प्रशासन का सम्बन्ध उन सभी कार्यों से है जिनका प्रयोजन सार्वजनिक नीति को पूरा करना या उसे क्रियान्वित करना होता है।" 

इस सम्बन्ध में पिफनर ने कहा है कि लोक प्रशासन का अर्थ है सरकार का काम करना चाहे वह कार्य स्वास्थ्य प्रयोगशाला में एक्सरे मशीन का संचालन हो अथवा टकसाल में सिक्के बनाना हो। लोक प्रशासन से तात्पर्य है लोगों के प्रयासों में समन्वय स्थापित करके कार्य को सम्पन्न करना ताकि वे मिलकर कार्य कर सकें अथवा अपने निश्चित उद्देश्यों को पूरा कर सकें। 

डिमॉक तथा काईनिंग के अनुसार, " अध्ययन विषय के रूप में प्रशासन उन सरकारी प्रयत्नों के प्रत्येक पहलू की परीक्षा करता है तो कानून तथा लोकनीति को क्रियान्वित करने हेतु किए जाते हैं। एक प्रक्रिया के रूप में इसमें वे सभी प्रयत्न आ जाते हैं जो किसी संस्थान में अधिकार क्षेत्र प्राप्त करने से लेकर अन्तिम ईंट रखने तक उठाए जाते हैं और कार्यक्रमों का निर्माण करने वाले अभिकरण का प्रमुख भाग भी इसमें सम्मिलित होता है) तथा व्यवसाय के रूप में प्रशासन किसी भी सार्वजनिक संस्थान के क्रियाकलापों का संगठन तथा संचालन करता है।"

6. लोक कल्याणकारी दृष्टिकोण

लोक प्रशासन के क्षेत्र से संबंधित एक अन्य दृष्टिकोण है। इसे आदर्शवादी दृष्टिकोण भी कहा जाता है। इस दृष्टिकोण के समर्थक राज्य और लोक प्रशासन में अधिक अन्तर नहीं मानते। उनके मातानुसार वर्तमान समय में राज्य लोक कल्याणकारी है। अतः लोक प्रशासन भी लोक कल्याणकारी है। दोनों का लक्ष्य एक ही है-- जनहित अथवा जनता को हर प्रकार से सुखी बनाना। इस दृष्टिकोण के समर्थ कहते हैं कि," आज लोक प्रशासन सभ्य जीवन का रक्षक मात्र ही नहीं, वह सामाजिक न्याय तथा सामाजिक परिवर्तन का भी महान साधन है।" 

इससे स्पष्ट होता है कि लोक प्रशासन का क्षेत्र जनता के हित में किए जाने वाले सभी कार्यों तक फैला हुआ है। एल. डी. व्हाइट लोक प्रशासन को अच्छी जिंदगी के लक्ष्य की प्राप्ति का साधन मानते हैं। '

संयुक्त विश्वविद्यालय अध्ययन और लोक प्रशासन परिषद् की लोक प्रशासन समिति' ने लोक प्रशासन के अध्ययन क्षेत्र का वर्णन इस प्रकार किया है-

(अ) इसमें प्रशासन के ऊपर विविध प्रकार के नियंत्रणों का अध्ययन होता है।

(ब) लोक प्रशासन में लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के भीतर प्रशासकीय प्रक्रिया का अध्ययन होता है। 

(स) लोक सेवा, स्थानीय शासन सेवा तथा ऐसी ही अन्य कर्मचारियों से संबंधित कार्मिक समस्याओं का अध्ययन होता है। 

संयुक्त विश्वविद्यालय अध्ययन और लोक प्रशासन परिषद् का विवरण; संयुक्त विश्वविद्यालय अध्ययन ओर लोक प्रशासन परिषद् की लोक प्रशासन समिति ने लोक प्रशासन के अध्ययन-क्षेत्र का वर्णन इस प्रकार किया है--

 1 . लोक प्रशासन में लोकतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था के भीतर प्रशासकीय प्रक्रिया का अध्ययन होता हैं।

2. इसमें प्रशासन के ऊपर विविध प्रकार के नियन्त्रणों का अध्ययन होता है। 

3. लोक सेवा, स्थानीय शासन सेवा तथा ऐसी ही अन्य कर्मचारियों से सम्बन्धित कार्मिक समस्याओं का अध्ययन होता है। 

4. नियोजन, अनुसन्धान, सूचना तथा सार्वजनिक सम्पर्क एवं प्रशासकीय स्वविवेक के प्रयोग से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन होता है। 

आज आमतौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि लोक प्रशासन अन्य सामाजिक विज्ञानों की ही भांति एक पूर्ण विषय है, इसके अन्तर्गत अध्ययन के पांच प्रमुख विशेष क्षेत्र हैं-- 

(अ) प्रशासनिक अथवा संगठनात्मक सिद्धान्तों का अध्ययन (Study of Administrative or Organization Theory) 

(ब) सार्वजनिक कार्मिक प्रशासन का अध्ययन (Study of Public Personnel Administration) 

(स) सार्वजनिक वित्तीय प्रशासन का अध्ययन (Study of Public Financial Administration) 

(द) तुलनात्मक लोक प्रशासन का अध्ययन (Study of Comparative Public Administration) 

(ई) सार्वजनिक नीति का अध्ययन (Study of Public Policy) 

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में लोक प्रशासन की क्रियाओं का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक हो गया है और समाजवादी व जनकल्याणकारी विचारधारा की प्रगति के साथ-साथ वह निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। लोक प्रशासन के अन्तर्गत केन्द्र, राज्य तथा स्थानीय सभी स्तरों की सरकारों के संगठन एवं कार्यप्रणाली का अध्ययन किया जाता है, पोस्डकोर्ब द्वारा दर्शायी गयी तकनीकों का भी अध्ययन किया जाता है और मानवीय सम्बन्धों का भी" लोक प्रशासन के अन्तर्गत केवल प्रशासन के अन्तर्गत केवल प्रशासन की तकनीकों एवं विधियों का ही अध्ययन नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इसको अपना ध्यान उन मनुष्यों पर भी केन्द्रित करना चाहिए जो कि उन तकनीकों एवं विधियों का प्रयोग करते हैं और जो प्रशासनिक संगठनों में काम करते हैं।"

आधुनिक समाज में लोक प्रशासन के बढ़ते हुए क्षेत्र के कारण 

जैसा कि पूर्व में किये गये वर्णन से स्‍पष्‍ट है आधुनिक समाजों में लोक प्रशासन के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हुई हैं। लोक प्रशासन के क्षेत्र में हुई वृद्धि के कारण इस प्रकार हैं-- 

1. लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा 

लोक प्रशासन के क्षेत्र में वृद्धि का प्रथम कारण लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का विकास है। आधुनिक राज्यों की विशेषताओं से उनका लोक-कल्याणकारी रूप एक ऐसा तत्व है जो विश्व के अधिकांश देशों में पाया जाता है। यह अवधारणा 'पुलिस राज्य' की अवधारणा से बिल्कुल विपरीत है। इस तरह के राज्य में सरकार का उद्देश्य आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा तथा न्याय व्यवस्था के अतिरिक्त जनकल्याण के लिए काम करना होता है। राज्य के कार्यों में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण लोक प्रशासन का क्षेत्र भी बढ़ा हैं।

2. लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था

लोक प्रशासन के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि का दूसरा प्रमुख कारण विश्व के अधिकांश देशों में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को अपनाया जाना भी हैं। लोकतंत्र में प्रशासन सेवक की भूमिका अदा करता है। प्रशासन का ध्येय सार्वजनिक हित होता है और प्रशासन की भूमिका महान् एवं सृजनात्मक होती है। लोकतंत्र में प्रशासन एक नैतिक कार्य है और प्रशासक एक नैतिक अभिकर्ता। अतः स्वाभाविक ही है कि लोक प्रशासन के क्षेत्र में अभिवृद्धि हो। 

3. प्रशासन का लोकनीति के निर्माण में सहयोग देना 

वर्तमान संसदीय शासन व्यवस्थाओं में कार्यपालिका विधि निर्माण में व्यवस्थापिका का नेतृत्व करती है। कार्यपालिका के राजनीतिक सदस्य इन कार्य को प्रशासकों के सहयोग से ही पूर्ण कर पाते हैं। इस अवस्था में लोक प्रशासन लोकनीति के क्रियान्वयन के साथ-साथ लोकनीति के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका अदा करने लगा हैं। इसलिए लोक प्रशासन के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हुई हैं। 

4. वैज्ञानिक प्रबंध एवं मानव संबंध आन्दोलन 

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में वैज्ञानिक प्रबंध आंदोलन के अग्रगामियों टेलर तथा उनके अनुयायियों ने कुछ ऐसे सिद्धांतों, प्रमापों तथा नियंत्रणों का प्रयोग करना प्रारंभ किया जिनके द्वारा कोई व्यावसायिक संस्था प्रभावकारी ढंग से संचालित की जा सकती है। इस वैज्ञानिक प्रबंध की विचारधारा के पूरक के रूप में एक मानव संबंध आंदोलन का उद्भव हुआ। आधुनिक प्रबन्‍ध में मानवीय संबंध का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिक प्रबन्‍ध तथा एल्टन मेयो और उनके अनुयायियों के मानव संबंध आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के कारण ही लोक प्रशासन के क्षेत्र में वृद्धि हुई हैं। 

5. व्यवहारवाद का प्रभाव 

द्वितीय महायुद्ध के उपरांत लोक प्रशासन के क्षेत्र में व्यवहारवादी दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण उपागम के रूप में प्रयुक्‍त हुआ। इसका आग्रह है कि लोक प्रशासन के अध्ययन में विशेष बल इस बात पर दिया जाना चाहिए कि प्रशासनिक संगठन में मानवीय व्यवहार का स्वरूप कैसा हैं। इस दृष्टिकोण ने भी लोक प्रशासन के क्षेत्र में वृद्धि की। 

6. ज्ञान की अंतरसम्बद्धता

ज्ञान एक पूर्ण इकाई है। किसी एक विषय में संपूर्ण अध्ययन के लिए उसमें अंतर-अनुशासनात्मकता लायी जाना आवश्यक हैं। वर्तमान समय में लोक प्रशासन के अंतर्गत अनुशासनात्मकता पर बहुत अधिक बल दिया जाता हैं। इस कारण भी लोक प्रशासन का क्षेत्र बढ़ा हैं।

7. समाजवादी विचारधारा का प्रभाव 

साम्यवादी एवं समाजवादी विचारधारा में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर राज्य का नियंत्रण रहता हैं। इन सभी क्षेत्रों को नियंत्रित एवं निर्देशित करने का कार्य राज्य प्रशासनिक यंत्र द्वारा ही कर पाता हैं। एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों ने समाजवाद को अपनी व्यवस्था के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाया हैं। इस कारण भी लोक प्रशासन का क्षेत्र अभूतपूर्व रूप से बढ़ा हैं।

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