6/30/2022

नवीन लोक प्रशासन, लक्ष्य/उद्देश्य, विशेषताएं

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नवीन लोक प्रशासन 

navin lok prashasan uddeshya mahatva;नवीन लोक प्रशासन की अवधारणा 1960 के दशक मे विकसित हुई। इस दशक मे अमरीकी समाज मे जो परिवर्तन हुए, उसका प्रभाव परम्परागत लोक प्रशासन पर भी पड़ा। नवीन लोक प्रशासन आंदोलन लोक प्रशासन के नवयुवक विद्वानों का आंदोलन है। 

नवीन लोक प्रशासन शब्द-बन्ध का प्रयोग लोक प्रशासन विषय के लिये नया है। परम्परागत लोक प्रशासन मे कुशलता तथा मितव्ययिता को अधिक महत्व दिया गया था परन्तु नवीन लोक प्रशासन के समर्थकों ने इन पुरातन अवधारणाओं को नकार दिया। उनका मानना था कि समस्त प्रशासनिक गतिविधियों की धुरी मानव है और मानव को कुशलता के मशीनी ढाँचे मे बांध कर नही रखा जा सकता। अतः मनुष्य है और मनुष्य को कुशलता के मशीनी ढाँचे मे बांध कर नही रखा जा सकता। अतः प्रशासन को मानव उन्मुखी होना चाहिए तथा उसका दृष्टिकोण मूल्य पर आधारित हो। इस प्रकार नवीन लोक प्रशासन के माध्यम से नवीन विचार लोक प्रशासन मे आये। आज के समाज के समक्ष जो नयी चुनौतियां खड़ी हो गयी है, उनके समाधान की दिशा मे नवीन लोक प्रशासन कार्यरत् है।

नवीन लोक प्रशासन के विद्वानों का स्पष्ट मत था कि मूल्यों की आधारशिला पर ही ज्ञान की इमारत खड़ी की जा सकती है तथा अगर मूल्यों को ज्ञान की प्रेरक शक्ति न माना जाये तो हमेशा ही यह खतरा रहता है कि ज्ञान को गलत उद्देश्यों हेतु काम मे लाया जायेगा। ज्ञान का उपयोग अगर सही उद्देश्यों हेतु करना है तो मूल्यों को उनकी केन्द्रीय स्थिति पर फिर से स्थापित करना जरूरी होगा। 

नवीन लोक प्रशासन के लक्ष्य या उद्देश्य (navin lok prashasan ke uddeshya)

नवीन लोक प्रशासन के लक्ष्य इस प्रकार है--

1. प्रासंगिकता 

परंपरागत लोक प्रशासन के लक्ष्य थे; कार्यकुशलता तथा मितव्ययिता जबकि नवीन लोक प्रशासन का लक्ष्य है प्रासंगिकता। अर्थात् संबद्ध सामाजिक समस्याओं के प्रति इसकी गहरी चिंता है। इसका मूल मंतव्य है-- लोक प्रशासन का ज्ञान तथा शोध समाज की आवश्यकता के संदर्भ मे " प्रासंगिक " एवं " संगतिपूर्ण " होने चाहिए।

अब लोक प्रशासन सिर्फ पोस्डकोर्ब तकनीक से ही संबद्ध नही रहा बल्कि लोक प्रशासन के अध्ययनकर्ताओं को समाज की मूलभूत चिंताओं मे प्रत्यक्ष भागीदारी का अवसर मिला है। ड्वाइट वाल्डो ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि लोक प्रशासन उन मुद्दों से अछूता नही रह सकता जिनका सामना समाज को करना है।

2. मूल्य 

नवीन लोक प्रशासन स्पष्ट रूप से आदर्शात्मक है। यह परंपरावादी लोक प्रशासन के मूल्यों को छिपाने के व्यवहार एवं प्रक्रियात्मक तटस्थता को अस्वीकार करता है। मिन्नोब्रुक सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने यह स्पष्टतः कहा कि मूल्य के प्रति तटस्थ लोक प्रशासन असंभव है। बुद्धिजीवियों के स्तर पर, अमरीका मे हाल के कुछ लेखों मे लोक प्रशासन मे नैतिकता के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। चूंकि लोक प्रशासन के कार्यों का विस्तार हो रहा है इसलिए यह जरूरी है कि सार्वजनिक पदाधिकारियों के क्रियाकलापों मे नैतिकता के प्रति चेतना लायी जाये। नैतिक मूल्यों के प्रति फिर से जोर देने के कारण कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आये है जिनका लोक प्रशासन के अध्ययन पर प्रत्यक्ष तथा महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। इससे लोक प्रशासन मे उत्तरदायित्व तथा नियंत्रण की भावना के प्रति फिर से रूचि बढ़ाने मे मदद मिली है।

3. सामाजिक समता 

परंपरागत लोक प्रशासन यथास्थितिवादी स्वरूप का था जबकि नवीन लोक प्रशासन सामाजिक समता के सिद्धांत पर बल देता है। यह समाज के कमजोर वर्गों-मसलन महिलाओं, बच्चों एवं दलितों को सामाजिक न्याय प्रदान करने हेतु संवेदनशील रहता है। नवीन लोक प्रशासन का उद्देश्य विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का अंत कर सामाजिक समता पर बल देना है। 

4. परिवर्तन 

सामाजिक समता की प्राप्ति हेतु नवीय लोक प्रशासन परिवर्तन पर बल देता है। यह समाज मे यथास्थितिवाद, शोषण, सामाजिक तथा आर्थिक विषमता को समाप्त कर समतायुक्त और शोषणविहीन नये समाज की स्थापना करता है। नवीन लोक प्रशासन समाज मे परिवर्तन लाने के औजार के रूप मे कार्य करता है।

यदि समाज का वर्तमान संकट गंभीर सामाजिक संघर्षों का परिणाम है तो यह जरूरी हो जाता है कि उन संघर्षों को समाप्त करने का प्रयास किया जाये। इन संघर्षों को दूर करने के लिए अगर वर्तमान राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था को तोड़ना जरूरी हो तो लोक प्रशासन के विशेषज्ञ को साहस के साथ उसकी मांग करनी चाहिए तथा उसे सिर्फ सुधारों के अथवा आवश्यक हो तो क्रांति के संबंध मे सुझाव देकर ही संतुष्ट नही हो जाना चाहिए, लेकिन इस दृष्टि से समाज का पुनर्निर्माण करने के प्रयासों मे भी योग देना चाहिए कि वह अभीप्सित लक्ष्यों को प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित कर सके।

संक्षेप मे, नवीन लोक प्रशासन आचारशास्त्र, मूल्यों अभिनव परिवर्तन एवं सामाजिक समानता पर बल देता है। इसके अनुसार मूल्यों की आधारशिला पर ही लोक प्रशासन की इमारत खड़ी की जा सकती है। लोक प्रशासन का औचित्य उसी स्थिति मे सर्वमान्य होगा, जबकि समाज मे व्याप्त विषमताओं, संघर्षों, आकांक्षाओं, संदर्भों तथा चिंताओं के उचित समाधान किये जायें। 

नवीन लोक प्रशासन की विशेषताएं (navin lok prashasan ki visheshta)

नवीन लोक प्रशासन की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. जब विश्व मे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, तकनीक परिवेश तेजी से बदल रहे है तब प्रशासकीय संगठनों को भी अपने मे बदलाव लाना होगा ताकि न केवल संगठन प्रभावी ढंग से कार्य कर सके अपितु उसके कार्यों की प्रभावशीलता तथा प्रासंगिकता को अंका जा सके।

2. प्रशासन मे नागरिकों की अधिक से अधिक भागीदारी होनी चाहिए। अर्थात् नीति निर्माण एवं निर्णय निर्माण मे जन प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए।

3. प्रशासन के संगठनात्मक संरचना मे बदलाव आना चाहिए। परम्परागत पद सोपान केन्द्रीयकरण नियंत्रण का क्षेत्र जैसी संरचनाओं मे परिवर्तन लाया जाना चाहिए तथा इनके स्थान पर पारम्परिक सहयोग, विकेन्द्रीकरण आदि को अपनाया जाना श्रेयस्कर होगा।

4. परंपरागत प्रशासन के बजाए इसमे व्यावसायिक (प्रोफेसनल लिज्म स्प्रिट) की भावना का समावेश होना चाहिए ताकि न केवल कार्य सही हो अपितु शीघ्र होकर तथा अधिक प्रभावशाली हो। इस हेतु प्रबंधकीय शैली को अपनाना होगा।

5. मानव स्वभाव का उपरिलिखित दृष्टिकोण (जो 'संभव होना' या 'विकास होना' पर बल देता हैं। संस्थानों की सार्थकता के प्रश्नों को सामने लाता हैं। विलबम (Willberm) का कथन है कि ", नये लोक प्रशासन की अनिवार्य विशेषता यह है कि यह प्रशासनिक यत्नों की प्रक्रियाओं और ढाँचों तथा उनके ध्येयों और लक्ष्यों के पारस्परिक संबंधों पर अधिक स्पष्ट और सच्चा चिन्तन करता है। साथ ही यह उन लक्ष्यों का नैतिक आधार पर चयन अधिक सचेत और सूझ-बूझ द्वारा करता हैं।" यह व्यक्तिगत तथा संगठनात्मक मूल्यों या नैतिकता की केन्द्रीय भूमिका पर भी बल देता हैं। 

6. नवीन लोक प्रशासन का यह मानना है कि मानव-जाति में संपूर्ण बनने की समर्थता हैं। यह उस दृष्टिकोण के विपरीत है जो मनुष्यों को उत्पादन का कमोवेश गतिहीन या स्थिर तत्व मानता हैं। 

7. नया लोक प्रशासन निश्चित रूप से संबन्धात्मक है। यह ग्राहक-केंद्रति दृष्टिकोण पर बल देता है। न केवल यह ग्राहकों अथवा नागरिकों की आवश्यकताओं को सेवा और सामान द्वारा पूरा करने पर बल देता हैं, अपितु यह इस बात पर भी बल देता है कि नागरिकों को यह बताने का अधिकार होना चाहिए कि उनको क्या, किस प्रकार और कब चाहिए? 

नीग्रों और नीग्रों के शब्दों में," लोकसेवाओं के अधिक प्रभावशाली तथा मानवीय वितरण के हित में वे इस बात की सिफारिश करते है कि ग्राहक-केन्द्रित प्रशासन के साथ-साथ प्रशासनिक प्रक्रिया में विकेंद्रीकरण लोकतांत्रिक ढंग से निर्णय करना और नौकरशाही प्रवृत्ति को दूर करना भी होना चाहिए।" 

नवीन लोक प्रशासन के संबंधात्मक दबाव का अभिप्राय प्रशासनिक अध्ययन और व्यवहार को एक बड़ा मोड़ प्रदान करना है। यह प्रशासनिक कार्य के परिणामों की और ध्यान आकर्षित करता है कि नागरिकों के व्यवहार और चरित्र पर इसका क्या प्रभाव पड़ता हैं। 

गोलमब्यूस्की का कहना है कि," इसका अर्थ यदि समूचे तौर पर नही, तो केन्द्रीय विषय की दृष्टि से लोक प्रशासन को सिर के बल खड़ा कर देना होगा कि प्रशासन महत्वपूर्ण मार्गों में राजनीति को बदल सकता हैं, न कि राजनीति प्रशासन को।"

 नवीन लोक प्रशासन का मूल्यांकन 

संक्षेप मे नवीन लोक प्रशासन की धारणा ने नए क्षेत्रों तथा नए विचारों को जन्म देकर लोक प्रशासन की विषय वस्तु तथा अध्ययन क्षेत्र को व्यापक आधार दिया है।

अपनी नवीन अवधारणा के तहत उसका समाज से सीधा संबंध स्थापित हुआ है। उसका नवीन एजेंडा है लोक-हित या जनहित। नवीन लोक प्रशासन को आज समाज मे फैली विसंगतियों को समाप्त करने के लिए अधिक उत्साही सुधारक सजग नीति निर्माता,सामाजिक परिवर्तन का अभिकर्ता, राजनीतिक आंदोलनकर्ता, आशावादी नेता तथा सहजता से उपलब्ध कार्यकर्ता की भांति जनहित मे काम करने की भावना वाले गुणधारी प्रशासन की आवश्यकता है। ऐसा प्रशासन नौकरशाही के जाल से निकलकर एक कुशल प्रबंधक के रूप मे सामने आएगा जहाँ वह मानवीय समस्याओं के निराकरण पर जोर देकर समरसता एवं सामाजिक समता जैसे गुणों को अंगीकार करेगा।

यद्यपि नवीन लोक प्रशासन विशुद्ध रूप से अमिरिकी धारणा है। भारत मे अभी नवीन लोक प्रशासन की जड़ें पूरी तरह से जमी नही है।

शायद यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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