12/15/2021

मैकियावेली के राजनीतिक/राज्य संबंधी विचार

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प्रश्न; मैकियावेली के राजनीतिक विचारों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। 

अथवा" मैकियावली के राज्य संबंधी विचारों को समझाइए। 

अथवा" "मैकियावेली का दर्शन राज्य की सुरक्षा का दर्शन था, न कि राज्य का दर्शन।" इस कथन को स्पष्ट कर परीक्षण कीजिए। 

अथवा" मैकियावेली के राजनीतिक दर्शन की समीक्षा कीजिए।

अथवा" मैकियावली के राजनीतिक विचारों का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर--

मैकियावेली के राजनीतिक विचार 

machiavelli ke rajya sambandhi vichar;यद्यपि मेकियावेली एक राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्री नहीं हैं तथापि उसने अपनी व्यावहारिक राजनीति को पुष्ट करने के लिए सिद्धांतों का सहारा लिया हैं। अतः उनके द्वारा हम उसके राजनीतिक विचारों का परिचय पाते हैं। मैकियावेली प्रमुख राजनीतिक विचार निम्नलिखित हैं--

राज्य की उत्पत्ति एवं प्रकृति 

अरस्तू के विचारों के विपरीत मैकियावैली ने राज्य को प्राकृतिक संस्था के स्थान पर एक कृत्रिम संस्था के रूप में देखा है जिसे मनुष्य ने अपनी असुविधाओंको दूर करने के लिए बनाया है। वह राज्य के आविर्भाव का कारण मनुष्य का स्वार्थ मानता है और इसी कारण राज्य की मुख्य विशेषता उसका निरन्तर विस्तार है। मैकियावैली ने इस बारे में लिखा है," मनुष्य का स्वार्थ और शक्ति की आकांक्षा राज्य को जन्म देती है और इसीलिए राज्य को अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये मनुष्य की इन आकांक्षाओं की निरन्तर पूर्ति करते रहना चाहिए, अर्थात् उसकी शक्ति व स्वरूप में निरन्तर विस्तार होते रहना चाहिए जब सभी मानवीय व्यापार गतिशील हैं तो राज्य के लिए निश्चल खड़े रहना सम्भव नहीं है, या तो वह अपने आप का विस्तार करेगा और नहीं तो उसका विनाश अनिवार्य है।" 

मैकियावैली के अनुसार मनुष्य का स्वभाव स्वार्थी और नीच प्रवृत्ति का होता है। अतः राज्य की उत्पत्ति से पूर्व मनुष्य का जीवन अत्यन्त ही कलहपूर्ण और संघर्षपूर्ण था। किसी का भी जीवन और धन सुरक्षित नहीं था। इस अवस्था से तंग आकर लोगों ने किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति कर दी जो उसकी स्वार्थता और दुष्टता पर नियंत्रण रख सके। उसने राज्य की उत्पत्ति के कारणों में समाज हित की बातों को सबसे महत्त्वपूर्ण माना। मध्ययुगीन विचारधारा के कारण राज्य एक दैवी संस्था के अनुसार माना जाता था, परन्तु मैकियावैली ने यह कहकर कि राज्य एक कृत्रिम एवं मनुष्यकृत संस्था है, इन विचारों का खण्डन किया।

मैकियावैली का विचार है कि स्वार्थ और केवल स्वार्थ ही राज्य की उत्पत्ति का आधार है। अपनी सुविधा के लिए, अपने हित के लिए व्यक्तियों ने राजा को चुना। राजा ने राज्य की स्थापना की। राज्य की निरन्तरता का कारण प्रतिरक्षा की आवश्यकता है। 

अरस्तू की भाँति मैकियावैली ने भी राज्य को अन्य संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा श्रेष्ठ माना है। उसके अनुसार, अन्य संस्थाएं राज्य के आदेश का पालन करने के लिए बाध्य हैं, किन्तु राज्य किसी के आदेश का पालन के लिए बाध्य नहीं है।

शासक का स्थान 

मेकियावेली ने अपने ग्रंथ 'प्रिंस' में विस्तार से यह बतलाया है कि शासक को किस समय क्या करना चाहिए? किस तरह उसे अपने राज्य का विस्तार करना चाहिए, किस तरह मनुष्यों से व्यवहार करना चाहिए? राजा को अपने पड़ोसी राजाओं को शत्रु समझना चाहिए एवं उनके प्रति सतर्क रहना चाहिए, उसे स्वयं भावनाओं से ऊपर रहना चाहिए लेकिन दूसरों की भावनाओं का लाभ उठाना चाहिए। उसे स्वयं को अच्छा दिखाने का केवल दिखावा मात्र करना चाहिए। राजा को स्वयं को चरित्रवान एवं आदर्श नैतिक नियमों को मानने वाला बना रहना चाहिए। साथ-ही-साथ जरूरत पड़ने पर छल-कपट, धोखा देना इत्यादि एक कुशल शासक के लिए जरूरी हैं। राजा को दिखाने के लिए ऐसा कठोर रूप धारण करना चाहिए कि जनता सदैव उसकी आज्ञाओं का पालन करती रहें। 

शासन पद्धति के विभिन्न प्रकार 

प्रायः मेकियावेली ने अरस्तु के अनुसार शासन का वर्गीकरण किया हैं। उसके अनुसार भी राज्य के तीन शुद्ध रूप हैं-- राजतंत्र, कुलीनतंत्र तथा प्रजातंत्र। पोलिबियस एवं सिसरो की तरह उसने भी मिश्रित शासन पद्धति को सर्वोत्तम शासन पद्धित माना हैं। उसने दो शासन प्रणालियों का विस्तार से वर्णन किया हैं।  

दो शासन प्रणालियों में पहली राजतंत्र की व्यवस्था हैं। उसके अनुसार इटली के लिए राजतंत्र व्यवस्था उचित है क्योंकि इटली की एकता राजतंत्र के द्वारा ही संभव हैं। 

शासन प्रणाली के दूसरे रूप गणतंत्र व्यवस्था का भी उसने विस्तारपूर्वक वर्णन किया हैं। जहाँ आर्थिक समानता हो, जहाँ के व्यक्ति गुणी, स्वतंत्र तथा मजबूत हों, वहीं के लिए गणतंत्र उत्तम शासन प्रणाली हैं। उसने गणतंत्र के पक्ष में निम्न तर्क भी दिये हैं-- 

1. "जनता का निर्णय ईश्वर का निर्णय होता हैं" अर्थात् जनता राजा से ज्यादा समझदार होती हैं। 

2. अधिकारियों का चुनाव करने तथा विद्वानों को आदर देने में जनता का निर्णय ज्यादा ठीक होता हैं। 

3. राजनीतिक एवं कानूनी संस्थाएं गणतंत्रों में ज्यादा सफल होती हैं। 

4. संधियों का पालन गणतंत्रों में अपेक्षाकृत ठीक तरह से होता हैं। 

5. गणतंत्र में सभी नागरिकों को शासन में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता हैं। अतएव गणतंत्र श्रेष्ठ हैं। 

6. गणतंत्र एकतंत्र की अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट होता हैं। 

7. गणतंत्र में स्थायित्व ज्यादा होता हैं। 

8. गणतंत्र के प्रति लोगों में ज्यादातर आस्था होती हैं। 

मैकियावेली ने गणतंत्र के दोषों पर भी प्रकाश डाला हैं। गणतंत्र प्रणाली के कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-- 

1. इस व्यवस्था में संकटकालीन परिस्थिति का सामना करने का सामर्थ्य नहीं हैं। 

2. इस व्यवस्था में प्रायः बड़े अधिकारी अन्यायी हो जाते हैं, कारण यह हैं कि उन पर किसी एक व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता। 

3. सिर्फ सत्तारूढ़ दल को ही विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त होती हैं। 

गणतंत्र की सफलता के लिए यह जरूरी हैं कि देश में एक ही जाति के व्यक्ति होने चाहिए, क्योंकि कई जातियों के कारण राज्य में भाषा, धर्म तथा संस्कृति संबंधी विवाद पैदा होते रहते हैं। 

कानून का विचार 

मैकियावेली मानवीय एवं दैवीय कानूनों में विश्वास नहीं करता। उसके अनुसार मानव का एक उद्देश्य हैं-- शक्ति प्राप्त करना। अतः वह दैवीय कानून में विश्वास नहीं करता। 

मैकियावेली के राजनीतिक दर्शन के दोष 

मेकियावेली के राजनीतिक विचारों में कुछ दोष हैं, जो निम्नलिखित हैं-- 

1. वह एक तरफ मानव स्वभाव को स्वार्थी कहता हैं, दूसरी तरफ समस्त जनता की आवाज को दैवीय कहता हैं। ये कथन परस्पर विरोधी हैं। 

2. मेकियावेली नैतिकता का भी दोहरि पक्ष लेकर चलता हैं। वह राज्य एवं नागरिक के लिए नैतिकता के भिन्न-भिन्न मापदंड रखता हैं। 

3. वह धर्म तथा नीतिशास्त्र की उपेक्षा करता हैं। 

4. मेकियावेली के राज्य संबंधी विचार भी दोषपूर्ण हैं। उसने उग्र शक्तिवाद का समर्थन किया हैं जिसके कारण व्यावहारिक दृष्टि में अनीति को आश्रय मिलता हैं। उसने शासक के बहुरूपियेपन का समर्थन किया हैं। इससे समाज में कपट, छट तथा मायावीपन को बढ़ावा मिल सकता हैं। वह राज्य विषयक मामलों में मौन हैं। उसने राज्य के स्वरूप, उद्देश्य एवं शासन के विभिन्न अंगों के पारस्परिक संबंधों पर कोई प्रकाश नहीं डाला। उसने युद्ध तथा साम्राज्यवाद का समर्थन किया हैं, जिसे कदापि भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।

मैकियावेली की आधुनिक राजनीतिक चिंतन को देना तथा उसका प्रभाव 

मेकियावेली को प्रथम आधुनिक विचारक माना जाता हैं। वस्तुतः उसके विचार आधुनिक विचारधारा की आधारशिला हैं। संक्षेप में उसकी राजनीतिक इतिहास को अग्र देन हैं-- 

1. धर्म तथा नीतिशास्त्र का राजनीतिक से संबंध विच्छेद 

मेकियावेली प्रथम आधुनिक विचारक हैं जिसने राजनीति से धर्म एवं नीतिशास्त्र का संबंध विच्छेद किया। 

अतः उसने ही सबसे पहले राजनीति को धर्म-निरपेक्ष स्वरूप प्रदान किया। 

2. नैतिकता का दोहरा स्वरूप 

मेकियावेली ने नैतिकता का दोहरा रूप प्रस्तुत किया हैं। जिस समय उसने राजनीति में प्रवेश किया उस समय यूरोप के विभिन्न देशों में अशांति फैली हुई थी। धर्म के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे। राजनीति में धर्म का बहुत हस्तक्षेप हुआ करता था। सबसे बुरी दशा इटली की थी। वहाँ पाँच छोटे-छोटे राज्य थे जो कि परस्‍पर लड़ते-झागड़तें रहते थे। इसलिए मेकियावेली ने इटली में एक शक्तिशाली संगठित प्रजातंत्र की स्थापना पर जोर दिया। उसने व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक नैतिकता में भेद माना हैं। जो कार्य व्यक्तिगत रूप से उसने गलत बताया हैं उसे राज्य की दृष्टि से न्यायपूर्ण कहा हैं। 

3. ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा 

मैकियावेली ने राज्य तथा समाज की उत्पत्ति को परिस्थितियों के वशीभूत माना हैं उसने परिस्थितियों के आधार पर ही अपने राजदर्शन के सिद्धांतों का निर्माण किया हैं। उसने ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा की। 

4. यथार्थवाद 

गैटिल के अनुसार मैकियावेली पहला यथार्थवादी हैं। उसका ग्रंथ 'प्रिंस' पूर्णतः यथार्थ की भूमिका पर स्थिति था। उसने वास्तविक घटनाओं का सहारा लिया हैं। 

5. मानव स्वभाव की दुष्टता 

मेकियावेली का मानव स्वभाव की दुष्टता का सिद्धान्त भी कई दृष्टियों से बड़ा महत्वपूर्ण हैं। हाॅब्स जैसे विचारकों ने इसके आधार पर कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले। 

6. राष्ट्रवाद 

वह आधुनिक राष्ट्रवाद का जन्मदाता हैं। वह फ्रांस एवं स्पेन का उदाहरण देते हुए इटली के एकीकरण को महत्व देता हैं। 

7. दर्शन में विरोधाभास 

मेकियावेली के राजदर्शन में पाए जाने वाले विरोधाभास निम्न तरह हैं-- 

(अ) मैकियावेली ने मनुष्य को स्वार्थी बताया हैं। साथ ही यह भी कहा हैं कि व्यक्ति को स्वार्थ छोड़कर समाज-कल्याण के हित में आना चाहिए। ये दोनों बातें परस्‍पर विरोधी हैं। 

(ब) एक तरफ एक निरंकुश शासनतंत्र का समर्थक हैं दूसरी तरफ उत्तम लोकतंत्र का पक्षपाती हैं। 

(स) मैकियावेली धर्म तथा नैतिकता से रहित शासन का समर्थक हैं साथ ही वह उसके कार्यों को अनैतिक भी नहीं ठहराता हैं। 

8. विभिन्न पद्धति 

मैकियावेली ने ऐतिहासिक पद्धित का अनुकरण किया हैं हालांकि यह ठीक हैं कि उसकी पद्धति पूर्णतः ऐतिहासिक नहीं हैं। वह निरीक्षणात्मक एवं वास्तविक दृष्टिकोण को लेकर चलता हैं। 

9. राज्य की सर्वोच्चता 

वह राज्य को सर्वोच्च स्थान देता हैं। उसने शासक के लिए मानव जीवन की सुरक्षा तथा धन की रक्षा को विशेष महत्व का विषय बतलाया हैं। यह श्रेय उसी को हैं कि उसने अपने स्वतंत्र विचारों के द्वारा सिद्ध किया कि समाज एवं राज्य मानव की बनाई संस्थाएं हैं न कि ईश्वर की बनाई हुई। 

10. सिविल कानून 

मेकियावेली सिविल कानून को बड़ा महत्व देता हैं। उसके अनुसार राज्यों द्वारा नियमों का पालन आवश्यक हैं। आज भी इन नियमों को बड़ा महत्व दिया जाता हैं। कानून संबंधी उसकी नीतियाँ काल्पनिक न होकर व्यावहारिक थीं। 

11. शासन की निरंकुशता तथा युद्ध पर विशेष बल 

मैकियावेली का प्रमुख उद्देश्य इटली को एक सबल तथा सुदृढ़ राष्ट्र बनाना था। अतः उसने शासन की निरंकुशता एवं युद्ध पर बल दिया। उसने शासन की निरंकुशता एवं व्यक्तियों के सैनिक  साहस पर ही साम्राज्य की सफलता स्वीकार की। उसने कहा कि सेना के बल के अलावा नैतिक बल भी साम्राज्य की दृढ़ता का कुशल साधन हैं। 

12. राज्य की चर्च से स्वतंत्रता 

वह राज्य को चर्च के अधीन नहीं मानता। इसके विपरीत वह राज्य को चर्च से पूर्ण स्वतंत्र रखता हैं। यह भी उसकी महत्वपूर्ण देन हैं। 

13. राज्य विस्तार की भावना 

मेकियावेली का राज्य-विस्तार संबंधी दृष्टिकोण बड़ा महत्व रखता हैं। साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद की आधारशिला वास्तव में यही राज्य विस्तार की भावना हैं। 

14. राज्य शब्द का आधुनिक प्रयोग 

मेकियावेली ने सर्वप्रथम राज्य शब्द का प्रयोग आधुनिक अर्थ में किया, जिसके अनुसार राज्य को निश्चित भूमि, जनसंख्या, सरकार एवं प्रभुसत्ता के अर्थ में लिया जाता हैं।

15. तानाशाही का समर्थन 

मेकियावेली ने आधुनिक युग में सर्वप्रथम तानाशाही के विचार का प्रतिपादन किया। 

16. भौतिक आवश्यकताओं का महत्व 

उसने भौतिक आवश्यकताओं को दैवीय आवश्यकताओं से ज्यादा महत्व दिया हैं। इस अर्थ में उसे कार्ल मार्क्स का प्रेरक कहा जा सकता हैं। अतः विभिन्न क्षेत्रों में मैकियावेली की महत्वपूर्ण देन दिखलाई पड़ती हैं। 

मैकियावेली का स्थान तथा प्रभाव

मेकियावेली को राजनीतिक चिंतन के इतिहास में प्रथम आधुनिक विचारक मानते हैं। उसने ऐसे सिद्धांत अपनाये जो मध्यकाल से सर्वथा भिन्न हैं। 

प्रो. गैटिल के अनुसार," मेकियावेली प्रथम आधुनिक राजनीतिक दार्शनिक था, जिसने एक राष्ट्रीय, एकतंत्रीय तथा निरपेक्ष एवं पृथक राज्य का प्रतिपादन किया। वह यथार्थवादी विचारक भी था, जिसने घोषित किया कि राज्य को अपने लिए, अपनी सुरक्षा तथा लाभ के लिए उपयुक्त रूप से जीवित रहना चाहिए।" 

मेकियावेली का ग्रंथ मध्यकाल एवं आधुनिक काल में बड़ा महत्वपूर्ण माना गया हैं। मध्यकाल के राजा 'प्रिंस' को बड़ी तत्परता से पढ़ते थे। चार्ल्स पंचम, फ्रांस का हेनरी तृतीय एवं हेनरी चतुर्थ इसे चाव से पढ़ते थे। 

एच. जी. वेल्स ने अपने एक उपन्यास का नाम भी "The new Machiavelli' रखा। सोवियत सरकार ने मेकियावेली पर एक संस्करण प्रकाशित किया। मुसोलिनी ने इसका अध्ययन किया। हिटलर इस ग्रंथ को बड़ा महत्व देता था। फ्रेडरिक महान, नेपोलियन, बिस्मार्क, लेनिन, स्टालिन सभी ने इस ग्रंथ से बड़ी प्रेरणा ली थी। 

जीन्स ने कहा हैं," यह बात निश्चित से सत्य है कि विभिन्न राज्य परस्‍पर एक-दूसरे के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा मैकियावेली ने वर्णन किया हैं।" 

मेकियावेली पर यह आरोप लगाया जाता हैं कि उसने राजनीति का धर्म तथा नैतिकता में संबंध विच्छेद करके उसे भ्रष्ट कर दिया। मरे ने इस संबंध में लिखा हैं," मेकियावेली स्पष्टदर्शी थे, दूरदर्शी नहीं थे। उन्होंने चालाकी को राजनीतिक की कला मान लेने की भूल की हैं। व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाये तो मेकियावेली पर लगाया गया यह आरोप उचित नही लगता। राजनीति तो उनसे पहले ही भ्रष्ट हो चुकी थी, उन्होंने तो एक ज्वलंत सत्य को उजागर कर दिया। 

इस संबंध में डनिंग ने ठीक ही लिखा हैं," मैकियावेली अनैतिक नहीं, नैतिकता विरोधी था, अधार्मिक नहीं, धर्मनिरपेक्ष था।"

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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