12/20/2021

ग्रीन के स्वतंत्रता संबंधी विचार

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ग्रीन के स्वतंत्रता संबंधी विचार 

green ke swatantrata sambandhi vichar;ग्रीन के विचार में संपूर्ण ब्रह्मांड स्थायी हैं तथा उसके प्रत्येक प्राणी में चेतना पाई जाती हैं। आत्मचेतना से उसका तात्पर्य यह हैं कि मनुष्य अपनी आत्मा को पहचानने का प्रयत्न करता हैं तथा उसकी उन्नति करना चाहता हैं। आत्मा की पहली विशेषता यह हैं कि वह अन्य मनुष्यों के विषय में भी सोचती हैं, और उसकी भलाई में ही अपनी भलाई सोचती हैं। आत्मा की दूसरी विशेषता यह हैं कि वह स्वतंत्रता चाहती हैं। बिना स्वतंत्रता के मानव एक यन्त्र के तूल्य हो जाता हैं। यह स्वतंत्रता ही मानव में मानवता का प्रतीक हैं। यह स्वतंत्रता दो तरह की होती हैं-- 

1. आंतरिक स्वतंत्रता 

यह आचार शास्त्र का विषय हैं। इसका अर्थ हैं 'अपनी मनोवृत्तियों को वश में रखना तथा उनमें से किसी का दास न होना।' 

2. बाहरी स्वतंत्रता 

यह राजनीतिक शास्त्र का विषय हैं तथा उसका अर्थ उन बाह्रा परिस्थितियों से हैं जिनके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने वास्तविक हित के कार्य कर सके और उसे किसी बाधा का सामना न करना पड़े। इन्हीं परिस्थितियों के होने को अधिकार समझा जाता हैं। परन्तु अधिकारों के संरक्षण की जरूरत होती हैं। इसी संरक्षण के हेतु राज्य का जन्म होता हैं। 

अतः ग्रीन के राज्य दर्शन का यही सारांश हैं कि-- 

(अ) मानव चेतना स्वतंत्रता चाहती हैं। 

(ब) स्वतंत्रता के लिये अधिकार आवश्यक हैं। 

(स) अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य आवश्यक हैं। 

ग्रीन के कथन को समझने के लिये हमें स्वतंत्रता व अधिकारों का अर्थ समझना आवश्यक हैं।

ग्रीन के कथन को समझने के लिए हमें स्वतंत्रता व अधिकारों का अर्थ समझना आवश्यक हैं। 

स्वतंत्रता का अर्थ 

ग्रीन के अनुसार," वास्तविक स्वतंत्रता आदर्श उद्देश्यों की इच्छा करने की सुविधा को कहते हैं।" उसके विचार में व्यक्तिवादियों की स्वतंत्रता नकारात्मक हैं। उसके अनुसार बन्धनों का न होना वास्तविक स्वतंत्रता नहीं हैं। स्वतंत्रता का अर्थ अगर मनमानी करने की छूट से लिया जाये तो उसे 'स्वेच्छचारिता' कहेंगे। तब स्वतंत्र तथा उच्छृंखलता में कोई भेद न रहा जायेगा। अतः हमे कह सकते हैं कि बन्धनों का न होना स्वतंत्रता नहीं हैं। इस प्रकार ग्रीन का मत हैं कि," स्वतंत्रता सकारात्मक होती हैं। प्रो. बार्कर ने भी ग्रीन के मत का समर्थन किया हैं। ग्रीन के मतानुसार "Liberty is a positive power of doing or enjoying thing which are worth doing or enjoying." 

स्वतंत्रता का अर्थ उस दशा में हैं जिसके बिना अधिकारों का उपभोग संभव नहीं। दूसरे शब्दों में, स्वतंत्रता उन कार्यों को करने की शक्ति हैं जिनके बिना व्यक्तित्व का विकास संभव नहीं हैं। इसलिए स्वतंत्रता सकारात्मक हैं। स्वतंत्रता प्रत्येक तरह के कार्यों को करने की शक्ति नहीं हैं सिर्फ उन्हीं कार्यों को जो कि करने चाहिए अर्थात् वे कार्य जिनमें समाज हित निहित हैं। इससे यह सिद्ध होता हैं कि स्वतंत्रता अपने स्वभाव से ही सीमित हैं। इसका उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास हैं तथा इसी उद्देश्‍य से सीमित हैं। ग्रीन कहता हैं कि चोरी करने या जुआ खेलने की सुविधा को स्वतंत्रता नहीं कह सकते, क्योंकि इससे हमारी आत्मोन्नति में सहायता न मिलकर विघ्न होता हैं। 

स्वतंत्रता का इस तरह अर्थ लेने पर व्यक्ति तथा राज्य के कार्यों में कोई भेद नहीं रह जाता। अतः राज्य जब शिक्षा का प्रबंध, स्वास्थ्य प्रबन्ध तथा आर्थिक क्षेत्र में हस्तक्षेप करता हैं तो इससे व्यक्तियों की सुविधा में वृद्धि होती हैं। अतः राज्य वास्तविक स्वतंत्रता का शोषक न होकर उसका पोषक हैं। 

स्वतंत्रता के लिये अधिकार आवश्यक हैं 

ग्रीन का कथन हैं कि स्वतंत्रता के लिए अधिकारों की जरूरत होती हैं। अतः अधिकारों का अर्थ समझना जरूरी हैं। ग्रीन का विश्वास हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने विश्वास के लिये कुछ सुविधा चाहता हैं तथा साथ ही साथ विवेक होने के कारण यह भी स्वीकार करता हैं कि उसी भाँति समाज में अन्य व्यक्तियों को भी ऐसी ही सुविधायें चाहिए। अतः इन सुविधाओं के पीछे समाज की स्वीकृत का संरक्षण तैयार हो जाता हैं। इस तरह अधिकार वह व्यक्तिगत माँग हैं, जिन्हें समाज स्वीकार कर ले तथा जिन्हें समाज का संरक्षण प्राप्त हो। जब इन माँगों को राज्य स्वीकार कर लेता हैं तो ये माँगें अधिकार बन जाती हैं। अतः इन अधिकारों के उपभोग के लिये राज्य की संरक्षणता जरूरी हैं। इस प्रकार राज्य एक नैतिक संस्था हैं। जिसका उद्देश्य व्यक्ति के जीवन में उन परिस्थितियों को पैदा करना हैं जिनके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्णतया विकास कर सके। 

ग्रीन का व्यक्तिवादियों से अधिकारों संबंधी मतभेद 

ग्रीन व्यक्तिवादियों की भाँति प्राकृतिक अधिकारों में विश्वास नहीं करता। लाॅक के अनुसार ये वे अधिकार हैं जो मनुष्य को मनुष्य होने के नाते समाज तथा राज्य की सृष्टि से पहले की दशा में जिसे वह प्राकृतिक अवस्था कहकर पुकारता हैं, प्राप्त थे। ग्रीन इसमें विश्वास नहीं करता। उसके अनुसार सामाजिक स्वीकृत के बिना अधिकारों का अस्तित्व ही असंभव हैं। अधिकार सिर्फ राज्य में ही संभव हैं। अधिकारों को केवल इस दृष्टि से प्राकृतिक कहा जा सकता हैं कि मनुष्य के पूर्ण विकास के लिये उनका होना अनिवार्य हैं। इनके बिना मनुष्य की पूर्ण उन्नति असंभव हैं। दूसरे, इन्हें इसलिए प्राकृतिक कहा जा सकता हैं कि वे मनुष्य की नैतिक प्रकृति की अनिवार्य माँगें हैं। अतः प्राकृतिक अधिकार नैतिक अधिकार हैं। इस तरह अधिकारों का संबंध एक तरफ कानून से तथा दूसरी ओर नैतिकता से हैं। 

अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य आवश्यक हैं 

राज्य अधिकारों का बलपूर्वक पालन करा सकता हैं। व्यक्ति को कर्त्तव्य पालन हेतु बाध्य करा सकता हैं। पालन न करने पर दण्ड भी दे सकता हैं। लेकिन नैतिकता आन्तरिक भाव हैं जिसका अधिकार की तरह आवश्यक रूप से पालन नहीं कराया जा सकता। भय दिखाकर किसी की मनोवृत्ति नहीं बदली जा सकती। अतः यह निष्कर्ष निकलता हैं कि अधिकारों की रक्षा की इच्छा या उद्देश्य से राज्य की सृष्टि होती हैं। अगर मनुष्यों में इतनी नैतिक भावना आ जाय कि वे अपने अधिकारों की भाँति ही दूसरे के अधिकारों का आदर करें तो राज्य की जरूरत न होती। परन्तु मनुष्य में बहुत सी दूसरे के अधिकारों का आदर करें तो राज्य की जरूरत न होती। परन्तु मनुष्य में बहुत सी कमजोरियाँ भी होती हैं जैसे क्रोध, घृणा तथा स्वार्थ आदि। इसके आवेश में आकर हम दूसरों के अधिकारों की परवाह नहीं करते। अतः यह सभी लोगों की सामान्य इच्छा हैं कि अधिकारों की सभी दशाओं में रक्षा करने वाली कोई संस्था होनी चाहिए। यह संस्था राज्य हैं। ग्रीन का कहना हैं कि राज्य जब बल का प्रयोग करता है तो वह हमारी सभी की इच्छा से ही करता है क्योंकि इसी कार्य के लिये राज्य की स्थापना की गई हैं। अतः ग्रीन ने कहा हैं कि," राज्य का वास्तविक आधार बल न होकर इच्छा हैं।" रूसो ने लिखा हैं कि," व्यक्ति के बल के विरूद्ध बल प्रयोग द्वारा ही राज्य व्यक्ति को स्वतंत्र होने के लिये बाध्य करता हैं।

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