12/21/2021

बेंथम के राजनीतिक विचार

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प्रश्न; बैन्थम के राजनीतिक विचारों का वर्णन कीजिए। 

अथवा" कानून, न्याय व्यवस्था और जेल सुधार के संबंध में बेंथम के विचारों का वर्णन कीजिए। 

अथवा" बैंथम के राजनीतिक दर्शन की विवेचना कीजिए।

अथवा" बेंथम का राज्य संबंधी विचारों का विवेचन कीजिए। 

उत्तर--

बेंथम के राजनीतिक विचार 

jeremy bentham ke rajnitik vichar;इंग्लैंड का महान् दार्शनिक बैन्थम अपने जीवनकाल में एक वैचारिक मसीहा बन गया था। अपने उपयोगितावाद संबंधी विचारों के कारण, राज्य संबंधी विचारों के कारण, कानून तथा अन्य क्षेत्रों में सुधार संबंधी विचारों के कारण उसे उसके जीवनकाल में बहुत ख्याति मिल गयी थी। डाॅयल के शब्दों में," उसकी एक देवता के रूप में प्रतिष्ठा हुई।" 

बेंथम के राज्य संबंधी विचार 

बैन्थम को राज्य के साम्यवादी सिद्धान्त में कोई विश्वास नहीं था उसके अनुसार राज्य की उत्पत्ति किसी दैवी सिद्धांत अथवा सामाजिक समझौते के सिद्धांत के आधार पर नहीं हुई, बल्कि उसकी उत्पत्ति का स्त्रोत मानव समाज की आवश्यकताओं में निहित हैं। वह राज्य को एक साधन के रूप में मानता था। उसका ध्येय मानव समाज को अधिक से अधिक सुख पहुँचाना हैं। अपने इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु राज्य को ऐसी विधियों का निर्माण करना चाहिए जिनसे राज्य एवं जनता का ज्यादा हित हो सके। व्यक्ति का महत्व राज्य से अधिक है। राज्य सिर्फ एक कृत्रिम समुदाय हैं तथा उसका निर्माण व्यक्तियों द्वारा हुआ हैं। राज्य एक नैतिक समुदाय की बजाय एक वैधानिक निकाय अधिक हैं। 

राज्य तथा नागरिकों के संबंध कानून द्वारा स्‍थापित होते हैं। राज्य को यह अधिकार प्राप्त हैं कि वह व्यक्तियों को अधिकतम सुख के लिए कार्य करने हेतु पुरस्कृत या दंडित कर सकता हैं। व्यक्तिवादियों की भाँति बैन्थम राज्य को व्यक्ति की धरोहर मानता हैं। राज्य का निर्माण व्यक्ति से पहले नहीं हुआ। व्यक्तियों के समूह के अलावा समाज की कोई पृथक सत्ता नहीं हैं।

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धांत का खंडन 

बेंथम से पूर्व राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता सिद्धांत प्रतिष्ठित था। हॉब्स, लॉक और रूसो इसके संस्थापक और प्रबल समर्थक थे। सामाजिक समझौते के अनुसार तत्कालीन लोगों ने अपने बहुत से अधिकार राज्य को प्रदान कर दिये। उस समझौते की शर्तों के अनुसार ही हम राज्य के आदेशों का पालन करते हैं। बेंथम का राज्य के सामाजिक समझौता सिद्धांत में कोई विश्वास नहीं था। उसका मत था कि," मेरे लिए आज्ञा पालन जरूरी है, इसलिए नहीं कि मेरे प्रपितामह ने जॉर्ज तृतीय के प्रपितामह से कोई समझौता किया था, वरन् इसलिए कि विद्रोह से लाभ की अपेक्षा हानि अधिक है।" इसलिए बेंथम ने कहा कि राज्य की आज्ञा का पालन मनुष्य इसलिए करते हैं कि ऐसा करना उसके लिए लाभदायक और उपयोगी है। 

राज्य के उद्देश्य तथा कार्य 

बेंथम के समकालीन राजनीतिक दार्शनिकों का यह विचार था कि राज्य का उद्देश्य मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करना है। फ्रांस की क्रांति के समय मानव अधिकारों की घोषणा में कहा गया था कि," प्रत्येक राजनीतिक समुदाय का उद्देश्य मनुष्य के प्राकृतिक तथा अलंघनीय अधिकारों का संरक्षण करना हैं। ये अधिकार हैं- स्वतंत्रता, सम्पत्ति, सुरक्षा तथा अत्याचार का विरोध करना। ये अधिकार मनुष्य को प्रकृति द्वारा मिले हुए हैं।" किसी भी सरकार के लिए इस बात पर काफी बल दिया कि राज्य का वही उद्देश्य है जो कि मनुष्य के जीवन में सुख अर्थात् उपयोगिता को अधिक से अधिक बढ़ाये। बेंथम ने एक स्थान पर लिखा है कि," दंड तथा पुरस्कार के द्वारा समाज के सुख की वृद्धि करना ही सरकार का मुख्य उद्देश्य है।" बेंथम ने इस बात पर अधिक बल दिया कि जो सरकार लोगों के अधिक से अधिक सुख की वृद्धि नहीं करती, उसे सत्तारूढ़ रहने का कोई अधिकार नहीं है। 

जेरेमी बेंथम ने जनता के जीवन के लिए चार चीजों को अनिवार्य समावेश किया है- आजीविका, प्रचुरता, समानता और सुरक्षा। राज्य को इन्हीं की वृद्धि करनी चाहिए। बेंथम स्वतंत्रता को इनमें सम्मिलित नहीं करता क्योंकि वह स्वतंत्रता को सुरक्षा की एक शाखा मानता है। उसका मत है कि लोगों को वहीं तक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए जहां तक इससे सुख में वृद्धि हो। लोगों की सुरक्षा खतरे में डालकर उनको स्वतंत्रता प्रदान नहीं की जा सकती है। राज्य का उद्देश्य अधिकतम सुख है न कि अधिकतम स्वतंत्रता। राज्य के कार्य के बारे में बेंथम का दृष्टिकोण निषेधात्मक है। इस बारे में उसने कहा है कि राज्य का व्यक्ति के कार्यों में जहां तक भी संभव हो सके, हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उसके शब्दों में," प्रत्येक कानून बुराई है क्योंकि प्रत्येक कानून से स्वतंत्रता का अतिक्रमण होता है, इसलिए सरकार को दो बुराइयों में से किसी एक को चुनना होगा। इस प्रकार का चुनाव करते समय कानून बनाने वाले का क्या उद्देश्य होना चाहिए? उसे अपने को दो चीजों के सम्बंध में संतुष्ट कर लेना चाहिए, प्रथम, वे चीजें जिन्हें वह रोकना चाहता है, हर हालत में बुरी हैं। दूसरे, ये बुराइयां उन बुराइयों से बड़ी हैं जिन्हें वह इनके दूर करने के प्रयोग में लाना चाहता है ।" बेंथम के अनुसार राज्य को व्यक्ति के आर्थिक क्षेत्र में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों को भली-भांति जानता है। इसलिए सभी व्यक्ति अपने साधनों के अनुरूप सुख प्राप्त कर सकते हैं। 

बेंथम के कानून संबंधी विचार 

बैंथम के काल में कई दार्शनिक प्राकृतिक कानून की धारणा में भी विश्वास रखते हैं। बेंथम ने इस धारणा का खंडन करते हुए कहा कि प्राकृतिक कानून नाम की कोई वस्तु नहीं है। प्रकृति किसी कानून को नहीं बनाती है। उस समय ईश्वरीय इच्छा पर भी बल दिया जाता था जबकि बेंथम ने इसे भी अस्वीकार करते हुए कहा कि ईश्वर प्रत्यक्ष रूप से अपनी इच्छा को प्रकट नहीं करता है इसलिए ईश्वरीय इच्छा का भी हमें ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिए कानून साधारण व्यक्ति की इच्छा न होकर विशिष्ट व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की इच्छा ही है। कानून के क्षेत्र में इसे लागू करने की वकालत करते हुए बेंथम ने कहा है कि अधिकतम लोगों का हित ही एक ऐसा सिद्धांत, जिसके अनुसार सही कानूनों का निर्माण किया जा सकता है, क्योंकि मानव प्रकृति के अनुकूल होने के कारण ऐसे कानून ही सार्वभौम और कालातीत हो सकते हैं और किसी भी समय किसी भी देश में उनको उपयोगी ढंग से लागू किया जा सकता है। बेंथम कानून के संदर्भ में परम्पराओं और रीति-रिवाजों को कोई विशेष महत्त्व नहीं देता। उसका मत था कि कोई वस्तु या कानून इसलिए उपयोगी और अच्छा नहीं माना जा सकता कि वह परम्पराओं पर आधारित है या प्राचीन समय में समाज में मान्य है। कानून के संबंध में अपने इन विचारों के कारण ही उसने इंग्लैंड में कानून सुधार के लिए बहुत बड़े आंदोलन को जन्म दिया, क्योंकि इंग्लैंड में अधिकांश कानून 'कॉमन लॉ' पर आधारित थे, जो कि पूर्णतः परम्पराओं पर आधारित था। बेंथम की उपयोगितावादी मान्यता के अनुसार उसे उचित नहीं समझा जा सकता था। 

कानून सुधार 

बेंथम के काल में जो कानून प्रचलित थे उनकी भाषा काफी कठिन थी। सामान्य पढ़े-लिखे व्यक्ति उन कानूनों को नहीं समझा पाते थे। उसके समय में कानून अव्यवस्थित थे। उसका सुझाव था कि पुराने तथा अनावश्यक कानूनों को रद्द कर कर दिया जाये तथा समस्त कानूनों को संगृहीत कर उनकी संहिता बना दी जाये। कानून की भाषा सरल हो जिससे साधारण व्यक्ति उसे समझ सके। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने स्वयं ही कानूनों की अंतर्राष्ट्री , दीवानी, फौजदारी और संवैधानिक संहिताएं तैयार कीं और विधिशास्त्र को राजनीति से पृथक करने का कार्य प्रारम्भ किया। कानून सुधार के क्षेत्र में बेंथम द्वारा किये गये सुधारों की ओर संकेत करते हुए हेनरी मेन ने कहा कि," हम बेंथम से लेकर आज तक होने वाले ऐसे किसी वैज्ञानिक सुधार को नहीं जानते जिस पर प्रभाव न पड़ा हो। बेंथम ने कानून के पारंपरिक दृष्टिकोण को उग्र विरोध किया। वह चाहता था कि उनका निर्माण अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के सिद्धांत के अनुसार किया जाए, क्योंकि उसकी मान्यता थी कि," अधिकतम सुख का सिद्धांत एक कुशल विधायक के हाथों में एक प्रकार का सार्वभौम साधन देता है जिसके द्वारा वह 'विवेक तथा विधि के हाथों सुख के वस्त्र' बना सकता है। बेंथम के अनुसार अच्छे कानून की कसौटी उपयोगिता है, क्योंकि उसके अनुसार कानून का सर्वप्रमुख कार्य, 'सर्वहित की भावना को इस प्रकार अनुशासित करना है जिससे वह अपनी इच्छा के विरुद्ध भी अधिकतम सुख प्राप्ति में योग दे सके।' बेंथम ने कानून की उपयोगिता का मूल्यांकन करते हुए इस प्रकार के मापदंड को प्रस्तुत किया है--

1. सुरक्षा 

पहला मापदंड यह है कि कानून राज्य के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा प्रदान करता है या नहीं। 

2. पर्याप्तता 

कानून से नागरिक को अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती हैं या नहीं। 

3. समानता 

कानून से प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के साथ समानता का अनुभव करता है या नहीं। 

4. आजीविका 

राज्य के द्वारा आजीविका के लिए परिस्थितियाँ कायम की जा सकती हैं। इसमें जो जिसके पास है उसी के पास रहे, यह अवधारणा शामिल है। अतः आजीविका के संदर्भ में कानून लोगों को श्रम तथा श्रम के फलस्वरूप सुरक्षा प्रदान कर सकता है। बेंथम ने कानून के चार प्रकारों का वर्णन किया है--

1. अंतर्राष्ट्रीय कानून, 

2. संवैधानिक कानून, 

3. नागरिक कानून, 

4. फौजदारी कानून।

बैन्थम के सम्प्रभुता संबंधी विचार 

बेंथम ने उसे व्यक्ति अथवा समूह को संप्रभु के रूप में देखा जिसकी इच्छा का पालन जनता स्वभाव से करती है। इस दृष्टि से बेंथम राज्य को सम्प्रभु मानता है क्योंकि उसकी इच्छा का सभी व्यक्ति पालन करते हैं राज्य की सम्प्रभुता को बेंथम असीमित मानता है। लेकिन वह उपयोगिता के आधार पर उस पर प्रतिबंध भी लगाता है । उसके मतानुसार सम्प्रभुता पर जनता के हितों और स्वार्थों पर प्रतिबंध लगाता है। उसके अनुसार यदि," विशाल जनमत किसी विधि का विरोध करता है तो सम्प्रभु का कर्तव्य है कि वह उसे कानून का रूप कदापि प्रदान न करे।" बेंथम ने व्यक्ति को संप्रभु की आज्ञा का पालन और कानूनों का अनुसरण उसी सीमा तक करने को कहा है जहाँ तक उससे उसकी उपयोगिता लक्ष्य सिद्ध हो अर्थात् यथेष्ट लाभ प्राप्त हो। इसलिए साधारणतः बेंथम जनता को सम्प्रभु के आदेशों का पालन कर्तव्य के रूप में करने के लिए कहता है परंतु वह यह भी मानता है कि यदि सम्प्रभु के आदेश की अवज्ञा करना उसके आदेश पालन करने की तुलना में अधिक उपयोगी और आनंददायक हो तो जनता का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह सम्प्रभु का विरोध करे। 

बेंथम के शब्दों में," अवज्ञा की उपयोगिता आज्ञापा से अधिक हो तो ऐसे सम्प्रभु की अवज्ञा प्रत्येक नागरिक का नैतिक अधिकार और कर्तव्य है।" इस प्रकार बेंथम ने उपयोगिता के आधार पर जनता को संप्रभु के विरोध का अधिकार दिया है। बेंथम की यह मान्यता है कि राज्य से बड़ी कोई शक्ति नहीं जो उसे किसी अधिकार को मानने के लिए विवश करे। 

बेंथम के शब्दों में," सर्वोच्च प्रशासक की सत्ता, जिसे तब तक अनंत नहीं कहा जा सकता जब तक कि परम्पराओं द्वारा स्पष्ट रूप से सीमित न कर दी गयी हो, मेरे विचार में अवश्य ही अनिश्चित मान ली जानी चाहिए।" बेंथम ने सम्प्रभु को असीमित तथा अनिश्चित अधिकार देते हुए भी उस पर प्रतियोगिता का प्रतिबंध लगाकर उसे सीमित करने का प्रयत्न किया है।

बेन्थम के शासन संबंधी विचार 

बैन्थम प्रजातंत्र का समर्थक था। वह प्रजातंत्र को अन्य सभी शासन प्रणालियों से श्रेष्ठ मानता था। उसका विश्वास था कि इंग्लैंड की संसदीय प्रजातंत्र की व्यवस्था एक सुन्दर व्यवस्था हैं। वह चाहता था कि इस व्यवस्था के कुछ दोषों को दूर कर इसे और अधिक अच्छा बनाया जाये। 

शासन के स्वरूप के संबंध में भी उसका दृष्टिकोण उपयोगितावादी था। सबसे अच्छा शासन वह होता हैं, जो अधिकतम व्यक्तियों को अधिकतम सुख प्रदान करे। अन्य किसी शासन प्रणाली की उपेक्षा यह प्रजातंत्र में ही अधिक संभव हैं। बेंथम के अनुसार, एक अच्छे शासन में बुद्धिमत्ता, भलाई और शक्ति ये तीन महान् गुण होने चाहिए। उसमें इस बात की बुद्धि हो कि वे समुदाय के वास्तविक हितों को समझ सकें, उनमें इतनी भलाई हो कि वास्तविक हितों की प्राप्ति के लिए हमेशा प्रयत्न करते रहें और उनमें इतनी शक्ति हो कि वे अपने ज्ञान को वास्तविक रूप में परिणित कर सकें। प्रजातंत्र में भलाई की भावना होती हैं, कुलीन तंत्र में भलाई की बुद्धि होती हैं और राजतंत्र में शक्ति होती हैं, परन्तु राजतंत्र और कुलीन तंत्र अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम हित का प्रयास नहीं करते। इसलिए प्रजातंत्र ही इनकी तुलना में एक श्रेष्ठ प्रणाली हैं। 

साथ ही बेंथम यह भी मानता था कि कोई भी शासन एकदम पूर्ण और सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता। शासन का कार्यक्षेत्र जटिल हो गया हैं। केवल शांति और व्यवस्था बनाये रखना ही शासन का कार्य नहीं हैं, उसे जनहित के अनेक सूक्ष्म कार्य करने हैं। इसलिए शासन को शोध के कार्यों पर तथा विभिन्न समस्याओं और उनके समाधान के संबंध में अध्ययन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 

बैन्थम के शासन संबंधी विचार उसकी पुस्तक 'Fragments of Government' में वर्णित हैं। इस पुस्तक में बेंथम ने उस जमाने में स्थापित विद्वान ब्लैकस्टोन के विचारों पर तीव्र प्रहार किये थे और कहा था कि ब्रिटिश शासन पद्धित में बहुत सुधारों की सख्त गुंजाइश हैं। शासन के संबंध में बेंथम के ये विचार एकपक्षीय होते हुए भी महत्वपूर्ण हैं।

दंड सुधार 

बेन्थम के काल में दण्ड व्यवस्था का स्वरूप कठोर था। छोटे-छोटे अपराधों के लिए भी मृत्युदंड दिया जाता था। उसने उपयोगिता के सिद्धांत के अनुसार इस क्षेत्र में भी सुधार का बहुत प्रयत्न किया। उसके शब्दों में," सभी प्रकार का दण्ड अपने आप में बुराई है। यदि उपयोगिता सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए दंड देना आवश्यक हो तो उसका वहीं तक प्रयोग करना चाहिए जहां तक कि वह उससे भी बड़ी बुराई को दूर करने में समर्थ हो सके।" 

बेंथम ने दंड देने के कुछ सुनिश्चित नियमों को सामने रखा हैं--

1. दंड की मात्रा अपराध से होने वाले लाभ अथवा हानि के अनुसार कम या अधिक हो। 

3. दंड सम होना चाहिए जिससे इसके द्वारा अनावश्यक दुःख न हो। 3. दंड उदाहरण स्वरूप हो जिससे अपराधियों तथा अन्य लोगों को भविष्य के लिए शिक्षा मिले। 

4. दंड उसी प्रकार के अपराध में दिये गये अन्य दंड के समान हो।

5. दंड में कष्ट की मात्रा अनावश्यक न हो, उतना ही कष्ट दिया जाये जितना कि अपराधी को सबक सिखाने तथा भविष्य में अपराध के विषय में हतोत्साहित करने के लिए पर्याप्त हो। 

6.दंड न्यायोचित हो अर्थात् जनता उसे उचित माने। 

7. दंड हमेशा ऐसा हो कि भूल का पता लगने पर उसे रद्द किया जा सके तथा घटाया बढ़ाया जा सके। 

8. अपराधी को इस बात के लिए बाध्य किया जाये कि वह हानि पहुंचाने वाले व्यक्ति की हानि की पूर्ति करे। 

9. दंड इस प्रकार का हो कि जो अपराधी को भविष्य में अपराध करने के अयोग्य बना दे, आदि। 

बेंथम ने बहुत जरूरी दशा में जब समाज की सुरक्षा का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो मृत्यु दंड को लागू करने की वकालत की। उसका यह भी सुझाव था कि दंड जहां तक हो सके सार्वजनिक रूप से दिया जाये। इस बारे में उसकी समझ थी कि अपराधी को दंड पाते हुए देखकर लोग भयभीत होंगे तथा अपराध से दूर रहेंगे। 

बेंथम ने दण्ड निर्धारण की प्रक्रिया में कई बातों का ध्यान रखने का निर्देश दिया जैसे इस बात का ध्यान रखा जाये कि अपराधी छोटा है या बड़ा, उसने किन परिस्थितियों में अपराध किया है, अपराधी का उद्देश्य क्या था तथा पीड़ित व्यक्ति को कितनी हानि पहुंची है। 

बेंथम के शब्दों में," सभी प्रकार के दंड स्वयं में एक बुराई है। यदि उपयोगिता के हित में इसको प्रयोग में लाया जाए तो यह तभी लाया जाए जब इसके द्वारा किसी बुराई का निराकरण होता हो।" 

जेल सुधार 

बेंथम के समय में जेलों की दशा काफी खराब थी। उनमें अंधेरा रहता था और गंदे तहखाने बने हुए थे। कैदियों के साथ पशुवत् व्यवहार किया जाता था। उनको खराब खाना दिया जाता था। छोटे-बड़े, नये पुराने साधारण और घोर अपराधी बन जाते थे। बेंथम ने जेलों की इन दुःपरिस्थितियों में सुधार की चर्चा की। इसके लिए उसने एक योजना प्रस्तुत की। उसने एक गोलाकार जेल बनाने का सुझाव दिया। जिसे अंग्रेजी में पेन आप्टिकॉन कहा जाता था Pan अर्थात् सर्व और Opticion अर्थात् दृष्टा अर्थात् सर्वदृष्टा जेल। इसमें एक गोलाकार जेल होती, जिसमें कैदियों के कमरे होते, जिनकी छत शीशे की होती और बीच में एक मीनार होती, जिसमें ऊपर निरीक्षक का शीशे का कमरा होता, जिसमें से बैठा हुआ निरीक्षक सभी जेलियों को शीशे की छत से देखता रहता और जिस कैदी को सुधारने की जैसी उपचार की आवश्यकता होती उसके लिए वैसी व्यवस्था कर दी जाती। अपनी योजना को क्रियान्वित करने के लिए बेंथम ऐसी किसी जेल का निरीक्षक बनना चाहता था लेकिन वह निरीक्षक नहीं बन पाया। 

बेंथम का विश्वास था कि जेल में अधिकारियों को कैदियों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए ताकि उनके जीवन में सुधार आ सके। उसका मत था कैदियों को कोई काम सिखाया जाये जिससे वे जेल से बाहर आकर अपनी आजीविका कमा सकें। बेंथम का यह भी विचार था कि कैदियों को धार्मिक और नैतिक शिक्षा भी दी जाये और उनका चरित्र उन्नत किया जाये। जेल से छूटने के बाद कैदियों को तुरंत काम दिलाने की व्यवस्था हो जिससे वे पुनः अपराध करना शुरू न कर दें।

शिक्षा संबंध विचार 

बैंथम शिक्षा के महत्व से अच्छी तरह परिचित था। अंत में वह इस क्षेत्र में क्रान्तिकारी प्रयास करने का इच्छुक था। शिक्षा हेतु उसने जिस सुधार योजना का निर्माण किया उसके द्वारा वह मानव जीवन मे सुधार करना चाहता था। इसके मन में शिक्षा, आनन्द तथा ज्ञान का प्रमुख साधन हैं। उसने शिक्षा को दो प्रमुख साधनों में विभक्त किया-- 

(अ) निर्धन बच्चों के लिए तथा

(ब) धनी बच्चों के लिए। 

उसका कहना था कि अमीर गरीबों को उनके प्रत्येक विकास से वंचित रखते हैं। अतः सरकार को गरीबों की शिक्षा के प्रति विशेष ध्यान रखना चाहिए। निम्न वर्ग हेतु ऐसी शिक्षा का प्रबंध हो जिससे उनके चरित्र का विकास हो सके, साथ ही उन्हें व्यावसायिक शिक्षा भी मिल सके जिससे वे जीविकोपार्जन भी कर सकें। उच्च वर्ग के लिए बैंथम ने बौद्धिक शिक्षा का सुझाव दिया जिससे वे विज्ञान के महत्व को समझ सकें। शिक्षा का प्रबंध सरकार को करना चाहिए तथा निर्धन बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाये। वह इंग्लैंड के दरिद्र नियम में सुधार करना चाहता था। बैन्थम विद्यार्थियों को शरीरिक दंड देने का पक्षपाती नहीं था।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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