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9/09/2021

शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्य, कार्य

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शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्य (shiksha manovigyan ke uddeshy)

शिक्षा-मनोविज्ञान के प्रमुख उद्देश्यों का उल्लेख इस प्रकार किया जा सकता हैं--

1. बालकों के प्रति निष्पक्ष तथा सहानु‍भूतिपूर्ण दृष्टिकोण का विकास करने मे सहायक होना। 

2. वांछित शिक्षण विधियों एवं शिक्षण सामग्री के चयन के लिए शिक्षक को सहायता प्रदान करना। 

3. शिक्षक को छात्रों के व्यवहार से संबंधित विभिन्न पक्षों के बारे में अवगत कराना। 

4. शिक्षण प्रक्रिया की सफलता एवू असफलता के संबंध में वांछित जानकारी प्रदान करना। 

5. शिक्षण तथा अधिगम से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त विधियों और युक्तियों की जानकरी प्रदान करना। 

6. सामाजिक संबंधों के स्वरूप एवं समायोजन की प्रक्रिया का बोध करना। 

7. वैयक्तिक भिन्नता के आधार पर विभिन्न तरह के बालकों के विकास में सहायक होना। 

8. शिक्षण के उद्देश्यों, युक्तियों, विधियों, प्रविधियों, व्यूह रचनाओं आदि के निर्धारण मे सहायता प्रदान करना। 

9. वांछित अधिगम की दिशा मे बालकों को अभिप्रेरित करने से संबंधित विधियों तथा युक्तियों की जानकारी प्रदान करना। 

10. बालकों की वृद्धि, विकास एवं उनके स्वभाव के बारे में ज्ञान प्रदान करना। 

11. अवांछित व्यवहारों का नियंत्रण एवं वांछित व्यवहारों का सही दिशा में मार्गान्तीकरण करने से संबंधित युक्तियों का बोध कराना। 

12. छात्रों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं के अनुरूप शिक्षिक व्यवस्था के संगठन तथा प्रशासन में सहायता प्रदान करना।

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शिक्षा मनोविज्ञान के कार्य (shiksha manovigyan ke kary

(अ) शिक्षा मनोविज्ञान के शिक्षण संबंधी कार्य 

1. विद्यार्थी को जानना 

अध्यापक को बच्चे की शक्तियों तथा योग्यताओं का पता होना अति आवश्यक है। इसके बिना वह अपने कार्य में बिल्कुल आगे नही बढ़ सकता। शिक्षा मनोविज्ञान बच्चे के बारे मे कुछ निम्न बातें जानने में मदद करता हैं-- 

(A) बच्चे के दृष्टिकोण, रूचियों, अभिरूचियों एवं अन्य अर्जित तथा जन्मजात योग्यताओं तथा शक्तियों का ज्ञान। 

(B) उसकी सामाजिक, संवेगात्मक, बौद्धिक, शारीरिक एवं सौन्दर्यात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उसके विकास के विभिन्न आयाम। 

(C) उसकी प्रगति करने की लालसा का स्तर। 

(D) उसका चेतन, अर्धचेतन तथा अचेतन व्यवहार। 

(E) उसका अभिप्रेरित व्यवहार।

(F) समूह के अंतर्गत उसके द्वारा किया जाने वाला व्यवहार। 

(G) इसका अपने परिवेश में समायोजन तथा उसके मानसिक स्वास्थ्य का स्तर। 

2. विषय-वस्तु या सीखने संबंधी अनुभवों का चयन एवं आयोजन 

बच्चे को जानने के बाद जब उसे शिक्षा देने हेतु रंगमंच कुछ तैयार हो जाता है तो कुछ निम्न तरह की समस्यायें सामने आती हैं-- 

(A) किस स्तर पर किस तरह के सीखने संबंधी अनुभव या सामग्री विद्यार्थियों को दी जानी चाहिए। 

(B) अनुभवों तथा सामग्री चयन करने के बाद उसका क्रमबद्ध आयोजन किस तरह किया जाना चाहिए? इस तरह की पाठ्यक्रम निर्माण संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए, न सिर्फ बच्चे के विकास की अवस्थाओं से संबंधित प्रमुख विशेषताओं से परिचित होना जरूरी है, बल्कि सीखने के नियमों, सिद्धांतों तथा सभी अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों का ज्ञान भी जरूरी हैं। इन सभी बातों को जानने में केवल शिक्षा-मनोविज्ञान ही अध्यापक की मदद कर सकता है।

3. अध्यापक तथा सीखने की कला एवं तकनीक सुझाना 

बच्चे को जानने एवं उसे क्या सिखाया जाना हैं, यह तय करने के बाद सिखाया किस तरह जाये अथवा सीखा कैसे जायें? यह प्रश्न सामने आता है। इसका समाधान भी शिक्षा-मनोविज्ञान द्वारा मिलता है। शिक्षा-मनोविज्ञान सीखने की प्रक्रिया का विवेचन करते हुए आवश्यक नियमों तथा सिद्धांतों को सामने लाता हैं एवं किस तरह से अच्छी तरह सिखाया जाये अथवा सीखा जाये, इससे शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को ही अवगत कराता है। सीखने की प्रक्रिया से विद्यार्थी की रूचि कैसे जागृत की जा सकती है एवं उसके ध्यान को कैसे केन्द्रित किया जा सकता है आदि महत्वपूर्ण बातें शिक्षा-मनोविज्ञान द्वारा ही शिक्षक को मालूम पड़ती हैं। इस तरह से शिक्षा-मनोविज्ञान अध्यापक को यह बतलाने की चेष्टा करता हैं कि विद्यार्थी को किस तरह कुछ सिखाया जाये, दूसरे शब्दों में शिक्षा-मनोविज्ञान उचित शिक्षण विधियों को जन्म देता है। इसके द्वारा ही यह सुझाव मिलता है कि कोई एक विधि या तकनीक सभी परिस्थितियों में सभी तरह के विद्यार्थियों के लिए उचित नहीं ठहराई जा सकती है। परिस्थितियों को देखते हुए अध्यापक को अपनी विषय सामग्री एवं अपने विद्यार्थियों के अनुकूल उपयुक्त विधि का चुनाव करने का प्रयत्न करना चाहिए। 

4. सीखने के लिए उचित परिस्थितियों तथा वातावरण का आयोजन 

अध्यापन के समय उपलब्ध वातावरण तथा परिस्थितियों का भी शिक्षा प्रक्रिया में अपना एक विशेष महत्व है। शिक्षा-मनोविज्ञान हमें यह बताता है कि किस तरह के अध्यापन एवं अध्ययन के लिए किस तरह की परिस्थितियों एवं वातावरण की आवश्यकता है। किस समय व्यक्तिगत शिक्षण की आवश्यकता है तो किस समय सामूहिक की? सहायक सामग्रियों का प्रयोग कब तथा कैसे उचित वातावरण तैयार करने मे मददगार सिद्ध हो सकता हैं? किस प्रकार की परिस्थितियां विद्यार्थियों को सीखने तथा कार्य करने को अधिक से अधिक प्रेरित कर सकती हैं? इस तरह से शिक्षा मनोविज्ञान के ज्ञान द्वारा शिक्षक एवं विद्यार्थी दोनों ही उपलब्ध परिस्थितियों एवं वातावरण को नियन्त्रित कर उसे अपने अध्ययन तथा अध्यापन के अनुकूल ढालने का प्रयत्न करते हैं। 

5. उचित अनुशासन स्थापित करने में मदद करना 

शिक्षा-मनोविज्ञान अध्यापक को रचनात्मक अनुशासन स्थापित करने में बहुत सहायता करता है। अनुशासन संबंधी समस्यायें मूल रूप मे व्यवहार संबंधी समस्यायें ही होती हैं जो कि अध्यापक तथा विद्यार्थियों के असंतुलित व्यवहार और टूटते संबंधों के कारण पैदा होती है। शिक्षा-मनोविज्ञान विद्यार्थियों के व्यवहार के अध्ययन से अपना संबंध रखता है। अतः हमें विद्यार्थियों को निकट से जानने में बहुत मदद कर सकता है। उनकी आवश्यकताओं, व्यवहार तथा क्षमताओं से यह हमें परिचित कराता है। आपसी व्यवहार को ठीक रूप देने मे इससे बहुत सहायता मिलती है जिससे शिष्य एवं गुरू के बीच संबंधों में पर्याप्त मधुरता लाई जा सकती है तथा रचनात्मक अनुशासन बनाये रखा जा सकता है। 

6. मापन तथा मूल्यांकन 

शिक्षा-मनोविज्ञान के अंतर्गत मापन तथा मूल्यांकन की महत्वपूर्ण विधियों और उपकरणों का ज्ञान भी सम्मिलित होता हैं। अतः इसके अध्ययन से शिक्षक को विद्यार्थियों की योग्यता और क्षमताओं के उचित मूल्यांकन में भी मदद मिलती है। 

7. मार्ग निर्देशन में मदद 

अध्यापक मापन तथा मूल्यांकन की विधियों से जितना अच्छी तरह परिचित हो सकता है, उतना शायद उसके माता-पिता भी नही हो सकते। विद्यार्थियों को ठीक तरह जानने के अतिरिक्त शिक्षा-मनोविज्ञान का ज्ञान अध्यापक को निर्देशन तथा परामर्श संबंधी सभी आवश्यक तथ्यों का अध्ययन करने का अवसर भी देता है। इस तरह शिक्षा-मनोविज्ञान विद्यार्थियों उचित मार्ग निर्देशन में अध्यापक की बहुत सहायता कर सकता है। 

8. समस्यात्मक बालकों की सहायता करना 

कुछ बच्चे अतिसाधारण होते हैं। वे या तो पढ़ाई में पिछड़े होते हैं या अपनी अधिक मेधावी शक्ति के कारण उन्हें कक्षा में अन्य बच्चों के साथ तथा कभी-कभी अध्यापकों के साथ अपनी पटरी बिठाने में कठिनाई होती हैं। कुछ के अंदर अपराधी प्रवृत्ति पायी जाती है। ऐसे सभी बच्चों के उचित समायोजन में तथा उनसे यथानुकूल व्यवहार कर उन्हें ठीक रास्ते पर लाने के कार्य में शिक्षा-मनोविज्ञान शिक्षक की काफी मदद करता हैं।

(ब) शिक्षा मनोविज्ञान के अधिगम संबंधी कार्य 

शिक्षा-मनोविज्ञान का प्रमुख कार्य बालक के व्यवहार मे परिवर्तन करना है। व्यवहार मे यह बदलाव ही अधिगम (सिखना) कहलाता है। शिक्षा की प्रक्रिया शिक्षण, अधिगम तथा अनुभवों के द्वारा सम्पन्न होती है। 

शिक्षा-मनोविज्ञान के द्वारा विद्यार्थियों को अधिगम की प्रक्रिया तथा उसके परिणामों की प्राप्ति के संदर्भ में विभिन्न तरह के कार्यों के संपादन द्वारा निम्न लाभों की प्राप्ति करता हैं-- 

1. उन्हें अपनी योग्यताओं तथा क्षमताओं को जानने और समझने में मदद मिल सकती है। इससे वे अपने आप से भली-भाँति परिचित हो सकते हैं। अपनी महत्वाकांक्षा के स्तर को अपनी योग्यता तथा क्षमता के स्तर के अनुकूल समायोजित कर सकते हैं। 

2. अभिप्रेरणा एवं अधिगम के सिद्धांतों एवं विधियों की जानकारी उन्हें सीखने हेतु अभिप्रेरित करने तथा सीखने में भली-भाँति मदद करने में मददगार बन सकती हैं। 

3. अवधान की प्रक्रिया एवं सहायक तत्वों का ज्ञान तथा व्यवधान संबंधी बातों की जानकारी उन्हें सीखने की प्रक्रिया में ध्यानरत रहने में भली-भाँति मदद कर सकती है। 

4. अधिगम और प्रशिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति में अपने-आप से एवं अपने वातावरण से समायोजन करने मे कितना लाभ हैं, यह जानकारी उन्हें जीवन मे सफल रहने की ओर अग्रसर कर सकती है। 

5. समूह गतिशास्त्र एवं समूह व्यवहार आदि से संबंधित बातों की जानकारी उन्हें अपने व्यवहार को कक्षा अथवा समूह व्यवहार एवं शिक्षण अधिगम परिस्थितियों के अनुकूल ढालने में मदद कर सकती हैं। 

6. मनोविज्ञान व्यवहार विज्ञान के रूप में विद्यार्थियों को दूसरों के व्यवहार को समझने, समायोजित होने एवं परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की क्षमता रखता है। क्षैक्षिक परिस्थितियों मे विद्यार्थियों द्वारा इस दिशा मे क्या किया जाना चाहिए, शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान और कौशल उनकी इस दिशा मे काफी मदद कर सकता है तथा परिणामस्वरूप उन्हें अधिगम में सजग रहकर ठीक तरह के परिणामों की प्राप्ति मे अनुकूल सहायता मिल सकती है। 

इस प्रकार विद्यार्थियों की अधिगम प्रक्रिया को उचित दिशा प्रदान कर वांछित उद्देश्यों की पूर्ति कराने मे शिक्षा-मनोविज्ञान का ज्ञान काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एक तरह से चाहे शिक्षकों द्वारा शिक्षण क्रियायें संपन्न होती हों या विद्यार्थियों द्वारा अधिगम मे रत होकर अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति करनी हो, ऐसे सभी प्रयत्नों में शिक्षा मनोविज्ञान (मनोविज्ञान का शिक्षा में व्यावहारिक अनुप्रयोग) का ज्ञान तथा कौशल बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है। यही कारण है कि मनोविज्ञान एवं शिक्षण अधिगम प्रक्रिया मे एक विशेष तरह का उपभोग सामग्री तथा उपभोक्ता जैसा गहरा संबंध पाया जाता है। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया से जुड़ी हुई सभी बातों, परिस्थितियों तथा व्यक्तियों को उनके अपने-अपने उद्देश्यों की प्राप्ति कराने में मनोविज्ञान की शैक्षणिक संदर्भ युक्त व्यावहारिक जानकारी अनेक तरह से बहुमूल्य सहयोग प्रदान करने में सदैव जुटी रहती है तथा इसी में सभी का वैयक्तिक और सामूहिक हित भी छुपा हुआ है। 

7. वंशानुकूल तथा वातावरण के संप्रत्यय, प्रक्रिया और अधिगम पर पड़ने वाले प्रभावों की सही जानकारी उन्हें व्यर्थ के दुष्प्रचार से बचा सकती है। विशेषकर वे बालक जो निम्न जाति, वंश, पिछड़े वर्ग, प्रदेश, अल्प बुद्धि तथा अपंग माता-पिता की संतान हैं, सही जानकारी प्राप्त कर हीनता एवं निराशा के भावों को तिलांजलि देने में कामयाब हो सकते हैं और अपने परिश्रम से वातावरण को अपने अनुकूल ढालने का प्रयत्न कर सकते हैं। 

8. अधिगम प्रक्रिया पर संसाधनों तथा सीखने संबंधी परिस्थितियों के प्रभाव की जानकारी उन्हें ऐसी परिस्थितियों में अधिगम ग्रहण करने को अग्रसर कर सकती हैं जिनसे अधिगम के अच्छे से अच्छे परिणामों की प्राप्ति हो सके। 

9. स्मृति संबंधी प्रक्रिया की जानकारी उन्हें ठीक तरह स्मरण करने, धारणा, शक्ति को बढ़ाने वाली उपयुक्त रूप से भण्डारण कर सकने एवं आवश्यकतानुसार स्मृति में संजोयी बातों का उपयोग कर सकने में मदद कर सकती है तथा इस तरह की क्षमता उनके अधिगम में काफी मददगार सिद्ध हो सकती है। 

10. सीखने एवं प्रशिक्षण का एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थति में स्थानांतरण उन्हें अधिगम प्रक्रिया में काफी सहयोगी सिद्ध हो सकता है। 

11. अच्छी आदतें कैसे सीखी जाती हैं एवं बूरी आदतों से किस तरह छुटकारा पाया जा सकता है, इस तरह का व्यवहार परिमार्जन तकनीकें उन्हें अधिगम द्वारा अच्छे परिणामों की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर कर सकती हैं। 

12. उचित व्यक्तित्व विकास हेतु सभी पक्षों का संतुलित तथा समन्वित विकास होना आवश्यक है। यह जानकारी उन्हें सभी आयामों-शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक, नैतिक, सौन्दर्यात्मक आदि के संतुलित विकास की ओर ध्यान दिलाकर अध्यापक और विद्यालय द्वारा इस ओर किये गये प्रयत्नों मे सफलता हासिल करने में सहायक हो सकती हैं।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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