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9/12/2021

अफ्रीका का विभाजन

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अफ्रीका का विभाजन 

africa ka vibhajan;अफ्रीका का विभाजन यूरोपीय साम्राज्‍यवाद के प्रसार में सबसे शर्मनाक और असाधारण घटना थी। सन् 1880 ई. तक यूरोप अफ्रीका के बारे में बहुत कम जानता था। उत्तरी अफ्रीका के कुछ भागों को छोड़कर शेष अफ्रीका उनके लिए ‘अंधेरा महाद्वीप‘ था। 1850 ई. से 1880 ई. बीच कई खोजकर्त्ताओं ने अफ्रीका के अन्‍य भागों को खोज निकाला और अब अफ्रीका पर अधिकार करने की होड़ लग गई। 1850 ई. और 1880 ई. के बीच साहसी खोजकर्त्ताओं ने अनेक बाधाओं का सामना करते हुए अफ्रीका के अन्‍तःप्रदेश के विषय में पर्याप्‍त जानकारी प्राप्‍त कर ली। बार्थ, वोगेल, नाक्टिगाल, आदि ने सहारा और सूडान के भागों की खोज की और बेकर, स्‍पेक, ग्रान्‍ट ने बड़ी झीलों के आस-पास के क्षेत्र का पता लगाया। इसके साथ ही लिंविगस्‍टन ने जेम्बिसी की घाटी की खोज पूरी की। इसके पश्‍चात् हेनरी मार्टन ने 1857-76 में कांगो नदी की घाटी और सहायक नदियों के क्षेत्रों का अन्‍वेषण किया। स्‍टेनली की खोज महत्‍वपूर्ण थी। उसने अपने देशवासियों का ध्‍यान कांगो के प्रचुर  प्राकृतिक साधनों की ओर आकर्षित किया किन्‍तु इंग्‍लैण्‍ड़ उस समय पूर्वी समस्‍या में उलझे रहने के कारण इस ओर अधिक ध्‍यान नहीं दे सका, किन्‍तु खोजकर्ता द्वारा उपलब्‍ध जानकारी और विशेष रूप से स्‍टेनली की प्रसिद्ध पुस्‍तक ‘थू दि डार्क कान्‍टीनेन्‍ट‘ के प्रकाशन से यूरोप के राज्‍यों में अफ्रीका के सम्‍बन्‍ध में रूचि बढने लगी। 

अफ्रीका की खोज डेविट लिविंग्‍स्‍टोन ने की थी। उसकी खोज के विवरण, जब छपे तो सारे यूरोप में खलबली मच गयी और इसके बाद ही अफ्रीका पर कब्‍जा करने की होड़ लग गई। इस संबंध में डॉ. दीनानाथ वर्मा के अनुसार, ‘‘अफ्रीका के अन्‍धकारपूर्ण भूखण्‍ड़ का पता लगाने का काम किसी यूरोपीय सरकार का नहीं था। यह यूरोप के उन धार्मिक परोपकारियों का काम था। जो पथभ्रष्‍ट अफ्रीकियों को सुमार्ग दिखलाने के लिए उत्‍सुक थे।" 

जगत हितैषियों में डॉक्‍टर डेविट लिविंग्‍स्‍टोन नामक एक स्‍काच धर्म प्रचारक का नाम विशेष रूप से उल्‍लेखनीय है।  अफ्रीका का पता लगाने का श्रेय उसी को दिया जाता है। वह पांच साल तक मध्‍य अफ्रीका के विविध प्रदेशों का अवगाहन करता रहा। जब उसने अपनी अफ्रीका-यात्रा का वृतान्‍त प्रकाशित किया तो सारे यूरोप में खलबली मच गई। सब लोगों का ध्‍यान अफ्रीका की ओर आकृष्‍ट हुआ। यूरोप के लोग इस विशाल एंव अद्भूत भूखंड प्रदेश पाने के लिए आतुर हो उठे। इसके बाद अफ्रीका का इतिहास केवल दुःख और दर्द की कहानी है। यूरोप के प्रायः सभी राष्‍ट्र अफ्रीका के भू-भागों पर गिद्ध की तरह टूट पड़े। उनके बीच अफ्रीका की छीना-झपटी होने लगी। अफ्रीका की लूट में अपना-अपना हिस्‍सा प्राप्‍त करने के लिए वे उतावले हो उठे। जो अफ्रीका कुछ साल पहले तक अज्ञात था, वह अब भूखे साम्राज्‍यावादियों का शिकार बन गया। 1890 आते-आते यूरोप के तथाकथित सभ्‍य देश अफ्रीका के टुकड़े-टुकड़े कर उन्‍हें आपस में बांट लेने के लिए कटिबद्ध हो गए। विश्‍व राजनीति के रंगमंच पर नवीन साम्राज्‍यवाद अपने नग्‍न रूप में आ खड़ा हुआ।‘‘

अफ्रीका में साम्राज्‍यावादी युग

वर्तमान राजनी‍‍तिक दृ‍श्‍य को समझने के लिए साम्राज्‍यवादी शासक के युग को समझना जरूरी हैं। क्‍योंकि यही शासन यहां की वर्तमान राजनीतिक व्‍यवस्‍था के लिए उत्तरदायी है। साम्राज्‍यवादी शासन एवं उसके अधिकृत क्षेत्रों का वर्णन प्रत्‍येक साम्राज्‍यवादी शक्ति के आधार पर किया गया हैं। उन लोगों ने अफ्रीका में क्षेत्रीय अधिकार की शुरूआत उस समय की जब उन्‍हें पूर्वी समुद्र के मार्ग में जहाजों के ठहरने के स्‍टेशन की आवश्‍यकता थी। उन्‍होंने 1652 में केप ऑफ गुड होप पर अधिकार किया। डच लोगों ने पुर्तगीज को अफ्रीका में समाप्‍त-सा कर दिया। लेकिन फिर भी उनके विशाल क्षेत्र की भी शीघ्र समाप्ति हो गई, 1814 ई. में केप कालोनी क्षेत्र ब्रिटेन को दिए गए। 1833 ई. में इन लोगों ने केप कालोनी को छोड़कर आरेन्‍ज फ्री स्‍टेट और नेटाल की स्‍थापना की। नेटाल पर ब्रिटेन ने 1845 ई. में अधिकार किया। 1867 ई. से 1884 तक यहां अंग्रेज आने लगे, जिसके फलस्‍वरूप बोअर युद्ध हुआ। इसमें ब्रिटेन की विजय हुई। इसके बाद अंग्रेजों और डचों ने दक्षिण अफ्रीका संघ की स्‍थापना की। अभी वहां डचों का कोई उपनिवेश नहीं हैं। 

ब्रिटेन की इस महाद्वीप में प्रमुख रूचि भारत की ओर जाने वाले व्‍यापारिक मार्ग की सुरक्षा दृष्टिकोण से थी। इसी उद्देश्‍य से उसने अनेक द्वीपों और बन्‍दरगाहों पर अधिकार किया। 1869 ई. में जब स्‍वेज नहर खुली तो अधिक मौका मिला। ब्रिटेन ने खासकर मिस्‍त्र, अदन, जंजीबार पर अधिकार किया। मिस्‍त्र के माध्‍यम से सूडान और युगाण्‍डा पर नियंत्रण किया। इसी क्रम में ब्रिटेन का अधिकार दक्षिण अफ्रीका पर हो गया। केवल रोडेशिया और विक्‍टोरिया के क्षेत्र उसके अधिकार में नही थे। ब्रिटेन के बाद अफ्रीका के क्षेत्रों पर अधिकार की दृष्टि से फ्रांस का द्वितीय स्‍थान है। फ्रांस जैसे ही 1870-1871 ई. में जर्मनी से पराजित हुआ, उसने अफ्रीका में साम्राज्‍य विस्‍तार शुरू किया। फ्रांस ने फ्रेंच पश्चिमी अफ्रीका, अल्‍जीरिया तथा ट्यूनिशिया के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार किया। मेडागास्‍कर पर भी पूर्णतया अधिकार किया। इस प्रकार फ्रांस ने सबसे अधिक क्षेत्र अफ्रीका में प्राप्‍त किए। हालांकि ये क्षेत्र ब्रिटेन या बेल्जियम के अधिकृत क्षेत्रों में समान सम्‍पन्‍न नहीं थे। स्‍पेन ने जिब्राल्‍टर जलडमरूमध्‍य को पार कर उत्तरी-पश्चिमी तटीय क्षेत्र पर अधिकार किया। ये स्‍पेनिश मोरक्‍कों कहलातें थे। इनके अन्‍तर्गत, मेलीला, चेउटा और अलहूकेमस द्वीप शामिल थे। उन्‍होंने एक अन्‍य क्षेत्र राया-डी-ओरी पर फ्रांस का विस्‍तार नियमित करने के लिए अधिकार किया। 

जर्मनी ने 1861 ई. में गोल्‍ड कोस्‍ट के तट पर जर्मन राज्‍य ब्राडेनवर्ग की व्‍यापारिक केन्‍द्र के रूप में स्‍थापना की। इसके 20 वर्ष पश्‍चात् जर्मनी ने टोगोलैंड, केमरून, दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका और टांगनिका पर अधिकार किया। इसके बाद इन क्षेत्रों पर ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम ने बंटवारा किया। इस प्रकार यूरोपीय साम्राज्‍यवादी शक्तियों ने अफ्रीका महाद्वीप पर पूर्ण रूप से अधिकार किया। 19वीं शताब्‍दी के मिस्‍त्र के इतिहास को ‘आंग्‍ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वन्द्विता का इतिहास‘ भी कहा जाता है। 1869 ई. में स्‍वेज का उद्घाटन हुआ। इसे फ्रांसीसियों ने बनाया था। आर्थिक दृष्टि से यह एक सफल परियोजना थी। ब्रिटेन ने इसका सर्वाधिक उपयोग किया। आगे चलकर मिस्‍त्र ब्रिटेन के पास रहा जिससे ब्रिटेन और फ्रांस में मनमुटाव हो गया। सूडान पर ब्रिटेन और मिस्‍त्र का संयुक्‍त राज्‍य स्‍थापित हुआ। बाद में ब्रिटेन को प्रधान मान लिया गया। 

1. बर्लिन सम्‍मेलन और अफ्रीका का विभाजन

सम्राट लियोपोल्‍ड के लाभों को समझकर अन्‍य यूरोपीय राज्‍यों में ईर्ष्‍या की भावना जागृत हुई। फ्रांस और पुर्तगाल ने कहा - वे कांगो घाटी के दावेदार हैं। अनेक यूरोपीय देश यहां पहुंचे। अपना अलग क्षेत्र बांट दिया। यूरोपीय राज्‍यों ने अपनी कूटनीति और संधियों से अफ्रीका में अपने प्रभाव की रक्षा कर लेना जरूरी समझा बर्लिन 1884-85 में एक सम्‍मेलन बुलाया गया, जिसमें प्रधान क्षेत्रों के विभाजन को मान लिया गया। यह सम्‍मेलन तीन माह चला। यह भी तय हुआ कि जहां एक शक्ति का अधिकार हो वहां दूसरा नहीं जाएगा। यह भी तय हुआ कि भविष्‍य में यूरोपीय शक्तियां अफ्रीका में अपने विवादों का शांतिपूर्वक समाधान करेंगे। इस सम्‍मेलन के बाद विभाजन होता रहा। 1914 ई. तक पूरा अफ्रीका बंट गया। 1908 तक कांगों की घाटी पर लियोपोल्‍ड का अधिकार बना रहा। अफ्रीका के बंटवारे की कहानी शांतिपूर्ण जरूर थी, मगर कटुतापूर्ण थी। वहां छोटे-छोटे संघर्ष होते रहे। अफ्रीका में सबसे बड़ा भाग इंग्‍लैड़ को मिला था। 

2. फ्रांस और अफ्रीका

बर्लिन सम्मेलन के बाद यूरोप के सभी राज्‍यों ने अफ्रीका के विभिन्‍न क्षेत्रों पर अपना-अपना अधिकार करना प्रारंभ कर दिया। इस दिशा में फ्रांस ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। फ्रांस उत्तरी अफ्रीका के मिस्‍त्र, मोरक्‍कों और ट्यूनिश में अपनी साम्राज्‍यवादी गतिविधियां चलाना चाहता था। इन क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्‍थापित करने के प्रयत्‍न ने उसे ब्रिटेन इटली और जर्मनी के विरोध का सामना करना पड़ा। उसने सबसे पहले ट्यूनिश पर अपना अधिकार करने का प्रयत्‍न किया। ट्यूनिश का राजा वे अत्‍यन्‍त फिजूलखर्ची था जिसने ब्रिटेन, फ्रांस और इटली से कर्ज ले रखा था। इसके बाद तीनों देशों को अलग-अलग सुविधाएं मिल गई, परंतु बर्लिन सम्‍मेलन ने फ्रांस को वहां अधिकार करने की इजाजत दे  दी। इटली भी इस क्षेत्र को अपने अधिकार में लेना चाहता था। परंतु जब फ्रांस को इस क्षेत्र में अधिकार करने की इजाजत मिल गई तो इटली ने फ्रांस को रोकने की कोशिश की। इसके बाद फ्रांस ने अपनी सेनाएं ट्यूनिश भेज दीं तो वहां का राजा उसकी सैनिक शक्ति के सामने टिक नहीं सका और अन्‍ततः उसने बार्डो की संधि स्‍वीकार कर ली। इस संधि के द्वारा ट्यूनिश पर फ्रांस का अधिकार स्‍थापित हो गया। 

3. मिस्‍त्र में फ्रांस और ब्रिटेन 

मिस्‍त्र में 1882 ई. में अराबी विद्रोह हुआ। इसके पहले वहां फ्रांस और ब्रिटेन का संयुक्‍त आधिपत्‍य था अतः दोनों ने वहां विद्रोह को दबाने के‍ लिए सैनिक शक्ति का इस्‍तेमाल करने का निश्‍चत किया, पंरतु फ्रांस ने ब्रिटेन का सहयोग नही किया तो ब्रिटेन ने अकेले ही विद्रोह का दमन कर दिया और अब मिस्‍त्र पर उसका अधिकार हो गया। जर्मनी के चासन्‍लर ने ब्रिटेन का समर्थन किया, पंरतु फ्रांस ने ब्रिटेन के अधिकार को चुनौती दी और इस तरह वहां फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संघर्ष की स्थिति उत्‍पन्‍न हो गई। 

4. मोरक्‍को में फ्रांस 

1880 ई. में मोरक्‍को के संबंध में मैड्रिड में यूरोपीय राज्‍यों सम्‍मेलन हुआ। जर्मनी ने फ्रांस को बताया कि उसकी मोरक्‍कों में कोई रूचि नहीं है अतः वह वहां फ्रांस का समर्थन करेगा। फ्रांस इसके पहले ट्यूनिश और गेम्बिया पर अधिकार कर चुका था और मोरक्‍कों  इनके बीच में स्थित था अतः वह उसे भी अपने अधिकार क्षेत्र में लाना चाहता था और अन्‍ततः फ्रांस का अधिकार मोरक्‍को पर हो गया। 

5. जर्मनी का अफ्रीका में प्रवेश 

1890 ई. के बाद जर्मनी का ध्‍यान इस ओर गया पूर्वी अफ्रीका का बड़ा भाग जर्मनी के हाथ लगा। टेंगोनिका का प्रदेश जर्मनी के हाथ लगा। दक्षिण और अफ्रीका में टोगोलैंड और केमोरून के प्रदेश जर्मनी के अधिकार में आया। 

6. इंग्‍लैंण्‍ड का अधिकार 

अफ्रीका में सन् 1806 ई. में केप ऑफ गुड होप और सेंट हेलीन द्वीप पर इंग्‍लैण्‍ड का कब्‍जा हो गया। 

7. दक्षिण अफ्रीका 

1652 ई. में डचों ने केप कालोनी पर अपने उपनिवेश की स्‍थापना की। डच बोअर कहलाते थे, धार्मिक मामलों के कट्टर थे तथा अंग्रेजों को पसंद नहीं करते थे। 1815 में अग्रेंजों ने बसना शुरू किया। 1879 ई. में अग्रेंजों ने ट्रांसवाल जीत लिया। 1881 ई. में अंग्रेजों और बोअरों के बीच युद्ध हुआ। मजआ पहाड़ी के युद्ध में अग्रेंज हार गए। अंत में उन्‍होंने बोअरों की स्‍वतंत्रता स्‍वीकार कर ली। 

1881 ई. के ट्रांसवाल के रेंड प्रदेश में सोने की खानों का पता चला। अंग्रेज वहां जाकर बस गए। उनकी संख्‍या बोअरों से अधिक हो गई। वे विदेशियों से नफरत करते थे। विदेशियों का नेता सेंसिल रोडस था। उसका जन्‍म एक अंग्रेज पादरी के घर हुआ था। वह दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्‍य की स्‍थापना को महत्‍व देता था। उसी के नाम पर रोडेसिया कहलाया। उसकी प्रेरणा से जेम्‍मन ने ट्रांसवाल पर आक्रमण किया, पंरतु बोअरों से हार गए। अग्रेंजों की ट्रांसवाल में कटुता बड़ी। जर्मनी से भी अंग्रेजों के संबंध खराब हुए। बोअरों, की सफलता पर जर्मन सम्राट ने ट्रांसवाल के राष्‍ट्रपति को तार भेजकर बधाई दी। 1899 ई. में अंग्रेजों से ट्रांसवाल तथा ओरेंज स्‍टेट में युद्ध हुआ। बोअरों को सफलता मिली, पंरतु अधिक समय तक नहीं। अग्रेंजों से टक्‍कर लेना कठिन था। 1902 ई. में संधि हो गई। अंत में 1909 ई. में केप कॉलोनी, नाटाल, ट्रांसवाल तथा ओरेंज फ्री स्‍टेट को मिलाकर यूनियन साउथ अफ्रीका की स्‍थापना की गई।

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