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7/09/2021

ग्रामीण नेतृत्व में उभरते/बदलते प्रतिमान

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ग्रामीण नेतृत्व में उभरते/बदलते प्रतिमान 

gramin netritva ke ubharte pratiman;स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में नवीन जागृति उत्पन्न हुई आजादी के थोड़े समय बाद ही ग्राम विकास का एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया गया इससे ग्रामीणों में खुद पहल करने, अपनी उन्नति के लिए काम करने तथा आपस में सहयोग से काम करने की भावना जागृत हुई है।

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इस संपूर्ण प्रक्रिया के प्रभाव से भारत में ग्रामीण नेतृत्व के अंतर्गत अनेक ऐसे प्रतिमान विकसित होना आरंभ हो गये है, जिनका भारतीय परंपरागत ग्रामीण नेतृत्व में पूर्ण रूप से अभाव था। ग्रामीण नेतृत्व के यह नवोदित प्रतिमान ग्रामीण शक्ति संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, ग्रामीण नेतृत्व के उभरते नवोदित प्रतिमान निम्नलिखित है--

1. प्रजातान्त्रिक नेतृत्व का प्रादुर्भाव 

भारतवर्ष में परंपरागत नेतृत्व निरंकुश और एकात्मक था। पंचायती राज्य के द्वारा सत्ता का विकेंद्रीकरण किए जाने के फलस्वरूप गांवों में अब प्रजातांत्रिक नेतृत्व का उदय हुआ है। इसके अनुसार व्यक्ति की अनुवांशिक स्थिति भू-स्वामित्व तथा जातिगत सदस्यता का विशेष महत्व नहीं रहा। अब गांव का नेतृत्व उन सामान्य व्यक्तियों के हाथ में है जो वहां के सामान्य व्यक्तियों द्वारा निर्वाचित होते हैं। या यूं कहिए कि जिन्हें बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है। इस प्रकार के प्रजातांत्रिक नेतृत्व में नेता तथा उसके अनुयायियों में शक्ति तथा प्रतिष्ठा के अनुसार स्पष्ट विभेद नहीं होता है। यह सही है कि उसके प्रभाव से अन्य व्यक्ति जो उसके अनुयायी होते हैं प्रभावित होते हैं। परंतु यह भी सही है कि वह भी अपने अनुयायियों की आकांक्षाओं से प्रभावित होता है। अब नेतृत्व के अवसर किसी विशेष धर्म, जाति, व्यवसाय, रंग, लिंग तथा परिवार तक ही सीमित नहीं है अपितु सभी प्रकार के लोगों ग्रामीण नेतृत्व में दिखाई पड़ते है। गांव से संबंधित कोई भी निर्णय किसी एक व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं अपितु वहां की पंचायत के सदस्यों द्वारा सामूहिक रूप से लिया जाता है। इन पंचायतों में विभिन्न वार्डों के, विभिन्न जातियों के तथा लिंग के व्यक्ति होते हैं। नेता की शक्ति की व्याख्या किसी धर्मशास्त्र, परंपरागत विचारों के आधार पर नहीं होती बल्कि जन आकांक्षाओं एवं राजकीय नीतियों के आधार पर होती है। ग्रामीण नेतृत्व के इस परिवर्तित प्रतिमान ने संपूर्ण ग्रामीण शक्ति संरचना को अत्यधिक प्रभावित किया है।

2. शिक्षा का महत्व 

अब से कुछ समय पहले तक ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक निरक्षरता होने के कारण नेतृत्व में भी शिक्षा का कोई विशेष महत्व नहीं था। परंतु नवीन परिस्थितियों में शिक्षा का महत्व अधिक बढ़ गया है। आज ग्रामीण नेता पहले की तरह कम पढ़े लिखे अथवा अनपढ़ के स्थान पर पढ़े-लिखे मिलने लगे हैं। यह सही है कि शिक्षित व्यक्ति सरकारी कामकाज को दक्षिता पूर्वक कर सकते हैं। इसलिए आज अशिक्षिकों की तुलना में नेतृत्व का लाभ शिक्षिकों को अधिक मिलता है। नए नियमों के अंतर्गत राज्य की ओर से भी ऐसे निर्देश दिए जाने लगे हैं कि गांवों में औपचारिक पदों पर कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति ही आसीन होगा। जैसे-- सरपंच पद के लिए यह आवश्यक है कि वह पढ़ा लिखा ही हो अनपढ़ नहीं।

3. युवकों का बढ़ता हुआ प्रतिनिधित्व 

ग्रामीण नेतृत्व में अब अधिक आयु का महत्व घट गया है। पहले यह देखा जाता था कि गांव का नेता वयोवृद्ध पुरुष ही हो। क्योंकि यह धारणा बनी हुई थी की आयु के साथ ही व्यक्ति में परिपक्वता आती है। अब किसी व्यक्ति को नेता बनने के लिए अधिक आयु का होना जरूरी नहीं समझा जाता। अब ग्रामीण नेतृत्व में धीरे-धीरे अधिकतर युवा लोगों के हाथों में आता जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि कृषि से संबंधित नवचारों का प्रशिक्षण तथा ज्ञान प्राप्त करके जब युवा वर्ग गांव में आता है तो वह गांव का सलाहकार बन जाता है। तत्पश्चात धीरे-धीरे ग्राम वासियों का नेतृत्व ग्रहण कर लेता है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में भी युवा वर्ग की सहभागिता ही गांव में अधिक है। यह युवा नेता पुराने नेताओं की अपेक्षा अधिक क्रियाशील विचारों में उदार अलौकिक दृष्टिकोण से ओतप्रोत तथा परिवर्तन को स्वीकार करने वाले है। इनमें रूढ़िवादिता एवं कठोरता ना होने के कारण ही यह ग्राम विकास की नई-नई योजनाओं के वाहक है। उनकी यह विशेषताएं एक परिवर्तनशील समुदाय में नेतृत्व के लिए अधिक उपयोगी समझी जाती हैं।

4. नेतृत्व मे विशेषीकरण 

ग्रामीण नेतृत्व के क्षेत्र में विशेषीकरण की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। आज किसी एक नेता विशेष में ही गांव की संपूर्ण शक्ति केंद्रित नहीं होती बल्कि जीवन के प्रत्येक विशिष्ट पक्ष तथा विशिष्ट कार्यों से संबंध अलग-अलग व्यक्तियों को नेता के रूप में मान्यता दी जाने लगी है। परंपरागत ग्रामीण नेता के स्थान पर आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि सभी क्षेत्रों में भी नेता अलग-अलग होने लगे है। शिक्षा, कृषि, ग्राम विकास, सहकारी संगठन, परिवार नियोजन और महिला कार्यक्रमों के क्षेत्र में अलग-अलग नेता पाए जाते हैं। डॉक्टर बी. एन. सिंह ने अपने अध्ययन के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि ग्रामीण नेतृत्व की यह विविधता मूल रूप से सामुदायिक विकास योजनाओं के क्रियान्वयन का ही परिणाम है।

5. मध्यम वर्ग की प्रधानता 

भारतीय ग्रामों में नेतृत्व का परंपरागत स्वरूप मुख्य रूप से उस वर्ग से संबंद्ध था जो या तो बड़ी-बड़ी भूमियों का स्वामी था या जिसके पास धन की अतुल शक्ति थी। नवीन प्रजातांत्रिक व्यवस्था के पश्चात आज गांवों में एक ऐसे नेतृत्व का जन्म हुआ है जो प्रमुखतः साधारण किसानों पशुपालकों एवं कारीगरों से संबद्ध है। मध्य वर्ग के व्यक्तियों से सामान्य ग्रामीण शीघ्र ही अपनी अनुरूपता स्थापित कर लेते हैं। जिसके परिणामस्वरूप उन्हें नेतृत्व ग्रहण करने तथा किसी विशेष कार्य को करने का निर्देश के अधिक अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। यद्यपि धन का महत्व परोक्ष रूप से आज भी बना हुआ है क्योंकि धन के बल पर ही अधिकतर चुनाव जीते जाते हैं और नेतृत्व ग्रहण किया जाता है। परंतु फिर भी हम यह देखते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों के नेतृत्व में जो बहुमत के आधार पर मिलते हैं वे प्रायः सामान्य व्यक्तियों के हाथ में ही होते हैं क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर लोग धन हीन होते हैं।

6. नेतृत्व मे परिवर्तनशीलता 

परंपरागत की अपेक्षा वर्तमान ग्रामीण नेतृत्व परिवर्तन की विशेषता से युक्त है। अनुवांशिकता का सिद्धांत समाप्त हो जाने के कारण अब ग्रामीण लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप ग्रामीण नेतृत्व में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। एक समय में जो व्यक्ति नेता होता है वह कुछ समय बाद गांव वालों के आक्रोश का शिकार भी हो सकता है। इस प्रवृत्ति के कारण अब ग्रामीण नेता केवल अधिकार संपन्न व्यक्ति ही नहीं होता अब तो उसे अधिकारों की अपेक्षा ग्रामीणों के प्रति अपने कर्तव्यों के लिए सजग रहना पड़ता है। डॉ. सिंह ने लिखा है कि भारतीय ग्रामों में परंपरा से चले आने वाले निरंकुशता और एकधिकारवादी नेतृत्व अब इस दृष्टि से परिवर्तनशील बन गए हैं की ग्रामीणों को अब कभी भी अपने नेता को बदलने का अधिकार प्राप्त हो गया है।

7. सामूहिक नेतृत्व का विकास 

गांव में आज नेतृत्व एक सीमित स्तर से हटकर सामूहिक स्वरूप ग्रहण कर रहा है अर्थात परंपरागत रूप से जहां प्रत्येक परिवार जाति तथा समूह के नेता अलग-अलग होते थे और उनकी स्थिति अनुवांशिक रूप से स्थापित होती थी वही आज एक ऐसे नेतृत्व का प्रदुर्भाव हुआ है जिसमें सभी जातियां तथा परिवार मिलकर सामूहिक नेतृत्व से संबंद्ध हो गए हैं। यह सच है कि सामूहिक नेतृत्व भी प्रायः उच्च जातियों में बटा हुआ है, लेकिन ऐसे विभाजन की दृढ़ता अब बहुत हद तक कमजोर पड़ती जा रही है।

8. नेतृत्व राजनीति से सम्बद्ध 

अब ग्रामीण नेतृत्व गांव में सामाजिक सुधार की ओर इतना ध्यान नहीं देता जितना कि राजनीतिक दलों की गतिविधियों की ओर देता है। स्वतंत्रता के बाद से भारत का प्रत्येक गांव धीरे-धीरे किसी न किसी राजनीतिक दल का केंद्र बन गया है। पहले ग्रामीण नेतृत्व का किसी राजनीतिक विचारधारा से कोई विशेष संबंध नहीं होता था। गांव के प्रभावशाली व्यक्ति जिस दल के पक्ष में होते थे उसी को सारे गांव का समर्थन प्राप्त हो जाता था। दूसरी ओर आज प्रत्येक राजनीतिक दल गांव की जातिगत संरचना को ध्यान में रखते हुए वहां अपनी गतिविधियों का संचालन करता है। जिसके कारण एक ही ग्राम अनेक राजनीतिक दलों से संबंद्ध  होकर विभिन्न प्रकार के नेतृत्व से जुड़ जाता है।  लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के संदर्भ में मेहता कमेटी की रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था," कि गांव से लेकर जनपद स्तर तक के सभी चुनावों में राजनीतिक दलों को भाग लेना चाहिए।" 

इस सुझाव का स्पष्ट रूप अब ग्रामीण जीवन में दृष्टिगोचर होने लगा है इसी के फलस्वरूप ग्रामीण नेतृत्व का सामाजिक स्वरूप अब राजनीतिक स्वरूप में बदलता जा रहा है।

9. भू-स्वामित्व, परिवार तथा जाति के प्रभाव का ह्रास 

परंपरागत रूप से ग्रामीण नेतृत्व केवल उन्हीं व्यक्तियों में केंद्रित था जो भूमि के स्वामी थे, प्रतिष्ठित परिवारों से संबद्ध थे तथा उच्च जाति के सदस्य थे। वर्तमान युग में ग्रामीण नेतृत्व का एक ऐसा प्रतिमान विकसित हुआ है जिसमें इन आधारों का कोई विशेष महत्व नहीं है। जनतांत्रिक चुनाव पद्धति में नेतृत्व का निर्धारण अब किसी समूह की संख्या शक्ति के आधार पर होने लगा है। इसी का परिणाम है कि आज ग्रामीण नेतृत्व में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। पंचायत राज्य व्यवस्था के प्रत्येक स्तर पर अनुसूचित जातियों जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों के लिए स्थान सुरक्षित होने के कारण भी ग्रामीण नेतृत्व में इन जातियों की सहभागिता में काफी वृद्धि हुई है। भू- स्वामित्व परिवार तथा जाति का प्रभाव नगण्य हो गया है।

10. अधिशासी नेतृत्व पर बल 

ग्रामों में आज नवीन विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के कारण एक ऐसे नेतृत्व का प्रदुर्भाव हुआ है। जिसे अपनी प्रकृति से लोकशाही अथवा अधिशाही कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए समुदायिक विकास कार्यक्रमों के फलस्वरुप गांवों में ग्राम सेवक की भूमि का अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई है। डाॅ. एस. सी. दूबे ने इसे नवीन नेता के नाम से संबोधित किया है। आपके विचार अनुसार ग्राम सेवक से एक राजकीय अधिकारी के सामान कार्य करने की आशा नहीं की जाती। लेकिन फिर भी ग्रामीण निर्णयों को प्रभावित करने तथा विकास योजनाओं में सहवाग देने के क्षेत्र में उसकी भूमिका निरंतर महत्वपूर्ण बनती जा रही है। इसी प्रकार विकासखंड अधिकारी, नियोजन अधिकारी तथा नियोजन से संबद्ध अन्य कार्यकर्ताओं ने भी गांव में नेतृत्व के नवीन स्वरूप को प्रोत्साहन दिया है।

11. अधिकारों की सुरक्षा 

परंपरागत ग्रामीण नेतृत्व में व्यक्ति  के केवल अधिकारों पर ही जोर दिया जाता था। परंतु आज ग्रामीण नेतृत्व लोगों के अधिकारों की सुरक्षा करता है। साथ ही कर्तव्य पालन के लिए भी प्रेरित करता है क्योंकि बिना कर्तव्य पालन के आज चुनावों में विजय प्राप्त कर सकना संदिग्ध है।

12. स्त्रियों को ग्रामीण नेतृत्व 

परंपरागत नेतृत्व पुरुष प्रधान था। नेतृत्व पुरुषों के हाथ में ही होता था। परंतु आज प्रजातांत्रिक व्यवस्था होने के कारण स्त्री पुरुषों को सामान अधिकार प्राप्त हैं और इसीलिए स्त्रियां भी ग्रामीण नेतृत्व ग्रहण करने लगी है। पंचायतों के न्याय पंचायत विभाग में (यदि पंचायत मे कोई स्त्री पंच नही है तो) दो स्त्रियों को सहवृत सदस्य बनाया जाना आवश्यक किया हुआ है। आज देश में अनेक बड़े-बड़े पदों जैसे-- प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राजपाल आदि पर महिलाएं नेतृत्व ग्रहण किए हुए हैं।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ग्रामीण जीवन में नेतृत्व के केवल नवीन प्रतिमान ही विकसित नहीं हुए हैं अपितु उन परिस्थितियों में भी परिवर्तन आया है जो नेतृत्व के एक विशेष स्वरुप का निर्धारण करती हैं। उदाहरण स्वरूप

(अ) संयुक्त परिवारों के स्थानों पर एकांकी परिवारों की संख्या बढ़ जाने के कारण नेतृत्व के निर्धारण में परिवार का महत्व बहुत कम हो गया है।

(ब) समाजवादी मूल्यों का प्रसार होने से गांव के छोटे-छोटे कृषक उनके अधिकारों की मांग करना आरंभ कर दिया है। जिनकी कुछ समय पहले तक कोई संभावना नहीं कही जा सकती थी।

(स) भू स्वामित्व के नए नए कानूनों के कारण परंपरागत जमीदारों तथा बड़े-बड़े भू स्वामियों की स्थितियों में अत्यधिक ह्रास हुआ है।

(द) शिक्षा प्राप्त नवयुवक जो नगरों से गांवों में आकर रहने लगे वे ऐसे विचारों का प्रचार व प्रसार कर रहे है जिनके अंतर्गत नेतृत्व का परम्परागत स्वरूप स्थिर नही रह सकता।

आज यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि ग्रामीण शक्ति परंपरागत नेताओं के हाथ से निकल कर नए लोकप्रिय नेताओं के हाथ में आती जा रही है। नये ग्रामीण नेताओं ने ग्रामीणों की समूह भक्ति का उपयोग करना सीख लिया है वे अपने दैनिक जीवन में पूर्ण व्यवहारवादी है। वे लोग अपनी शक्ति के सभी स्त्रोतों को भली-भांति जानते हैं साथ ही इतने चतुर है कि अपने पद का प्रयोग शक्ति में बने रहने के लिए करते हैं। कदापि अब भी गांव के परंपरागत मुखिया बदलती हुई परिस्थितियों में भी अपने प्रभाव को बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं परंतु उनको इसमें तनिक भी सफलता नहीं मिल रही है। अंत में रंगनाथ के शब्दों यह कहा जा सकता है," कि इस प्रकार से ग्रामीण नेतृत्व का उदीयमान प्रतिमान नई प्रगति और परंपरागत तत्वों का एक मिश्रित चलचित्र प्रस्तुत करता है।" यद्यपि यह स्पष्ट है कि पुरानी शक्तियां एक हारा हुआ युद्ध लड़ रही है।

ग्रामीण नेतृत्व के परम्परागत प्रतिमान 

भारतीय ग्रामीण समाज परंपरात्मक रहा है अतः वहां पर नेताओं का स्थान परंपराओं के आधार पर निश्चित होता रहा है। प्राचीन काल से ही ग्राम का प्रशासन जमीदारी प्रथा के अंतर्गत रहा था। जमीदार एक तो भूस्वामी होता है साथ ही आर्थिक दृष्टि से संपन्न होता है। अतः उसका समुदाय पर नियंत्रण भी रहता था। जमीदारी व्यवस्था ने ग्रामीण नेतृत्व, जाति व्यवस्था तथा परंपरागत पंचायतों को प्रभावित किया। ग्राम में ब्राह्मण तथा जमीदारों को पर्याप्त सम्मान मिलता रहा है। परंतु अब नई चेतना के कारण ग्राम समाज पर इसका उतना अधिक प्रभाव नहीं रहा। ग्राम काम पटवारी भी परंपरात्मक नेता की श्रेणी में आता है। वह कृषक की भूमि के लगान आदि का हिसाब किताब रखता था। इस कारण पटवारी ग्राम वासियों पर अपना प्रभुत्व रखता था। परंपरागत नेता की श्रेणी में पुरोहित का उल्लेख भी किया जा सकता है।  यह शक्ति के प्रतिनिधि पुजारी होते हैं ऐसा ग्रामवासी मानते हैं।

ग्रामीण नेतृत्व के परम्परागत आधार 

ग्रामीण नेतृत्व के परम्परागत आधार निम्न है--

1. जातिगत स्तरीकरण 

परम्परागत रूप से गाँव मे केवल उच्च जाति के लोग ही नेतृत्व करते थे। निम्न जाति के व्यक्ति को नेता के रूप मे स्वीकार नही किया जाता था।

2. परिवार का बड़ा आकार तथा प्रतिष्ठा 

परिवार मे सदस्यों की संख्या अधिक होने से उसके सदस्यों को नेतृत्व के लिए काफी समय मिल जाता है। नेता प्रतिष्ठित परिवार से है तो सामान्य रूप से उसकी प्रभुता को स्वीकार कर लेते है।

3. शिक्षा 

ग्रामीण क्षेत्रों मे शिक्षा का अत्यधिक अभाव रहा है। अतः यदि कोई व्यक्ति शिक्षित होता है तो उसका प्रभाव इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि वह अशिक्षित ग्रामीणों को लिखने-पढ़ने में सरकारी कामकाज तथा हिसाब-किताब समझने मे सहयोग प्रदान करता है। 

4. प्रशासकीय कर्मचारियों से संपर्क

सामान्यतया गाँव वालों का संपर्क प्रशासकीय कर्मचारियों से नही होता है। अतः लोग ऐसे व्यक्ति को अधिक सम्मान की दृष्टि से देखते है जिसके संबंध प्रशासकीय अधिकारीयों से होते है।

5. न्यायालय संबंधी मामलों का ज्ञान 

गाँव मे अनेक प्रकार के लड़ाई-झगड़े सम्पति, जमीन, स्त्री आदि के आधार पर चलते रहते है। ऐसी स्थिति मे जो व्यक्ति न्यायालय के लोगों और वकील आदि से संबंध एवं संपर्क रखता है, वह नेतृत्व स्वतः ही प्राप्त कर लेता है।

6. बहुमुखीय व्यक्तित्व 

ग्रामीण नेतृत्व के निर्धारण मे व्यक्ति की वैयक्तिक विशेषताओं का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।

7. आयु 

गाँवों मे वृद्धजनों को अनुभवी एवं सम्मानित समझा जाता है। किसी भी निर्णय मे उनके विचारों को जानना आवश्यक समझा जाता है।

8. आर्थिक स्थिति

व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का भी ग्रामीण नेतृत्व के निर्धारण मे महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

ग्राम पंचायत तथा नेतृत्व 

भारत मे प्रचानी समय से किसी न किसी रूप मे पंचायतें पायी जाती थी। ये पंचायतें दीवानी, फौजदारी और भूमि संबंधी गाँव के झगड़े सुनती थी। इनके निर्णय राज्य भी मान्य होते थे। ग्राम पंचायत के सदस्यों को अत्यंत सम्मान के साथ देखा जाता था। अंग्रेजों के आगमन के पूर्व तक ग्राम पंचायतों मे शक्ति निहित रही।

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