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12/20/2020

व्यष्टि अर्थशास्त्र का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, प्रकार

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व्यष्टि अर्थशास्त्र का अर्थ (vyasti arthashastra kya hai)

vyasti arthashastra arth paribhasha visheshtaye prakar;आधुनिक अर्थशास्त्री आर्थिक व्यवस्था का अध्ययन दो दृष्टिकोण- विशिष्ट विश्लेषण तथा व्यापक विश्लेषण से करते है। विश्लेषण की इन दोनों रीतियों के आधार पर ही अर्थशास्त्र को अब दो भागों मे विभाजित करने की प्रथा चल पड़ी है। इसे हम इस तरह भी कह सकते है कि, आधुनिक आर्थिक विश्लेषण की दो शाखायें है, जिन्हें--

1. व्यष्टि या विशिष्ट अथवा सूक्ष्य या व्यष्टिगत अर्थशास्त्र,

2. समष्टिगत अथवा व्यापक अर्थशास्त्र कहा जाता है।

व्यष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत किसी विशिष्ट व्यक्ति, विशिष्ट, फर्म, विशिष्ट उद्योग अथवा विशिष्ट मूल्य का अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों मे कहे तो व्यष्टि अर्थशास्त्र वैयक्तिक इकाइयों के अध्ययन से सम्बंधित है व्यष्टि अर्थशास्त्र मे वैयक्तिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है। 

व्यष्टि अर्थशास्त्र की परिभाषा (vyasti arthashastra ki paribhasha)

हैण्डरसन व क्वान्ट के अनुसार, " व्यष्टि अर्थशास्त्र मे व्यक्तियों तथा व्यक्तियों के ठीक से परिभाषित समूहों की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।

गार्डनर एक्ले के अनुसार," व्यष्टि अर्थशास्त्र, उद्योगों, उत्पादों और फर्मों मे कुल उत्पादन के विभाजन तथा प्रतिस्पर्धी उद्योगों के लिए साधनों के वितरण का अध्ययन है। यह आय वितरण की समस्या का अध्ययन करता है। यह विशेष वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य निर्धारण से सम्बंधित है।" 

प्रो. मेहता ने ," व्यष्टिगत अर्थशास्त्र को कूसो की अर्थव्यवस्था की संज्ञा दी है क्योंकि सम्बन्ध मुख्य रूप से वैयक्तिक इकाइयों से रहता है।

प्रो. चेम्बरलेन के शब्दों मे," व्यष्टिगत अर्थशास्त्र पूर्णतया व्यक्तिगत व्याख्या पर आधारित है तथा इसका संबंध अन्तर्वैंयक्तिक संबंधों से भी होता है।" 

व्यष्टि अर्थशास्त्र मे व्यक्तिगत इकाइयों व उनके समूहों का ही अध्ययन होता है, किन्तु यह समूह सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से सम्बंधित नही होते। यह समूह अर्थव्यवस्था का छोटा सा अंश होता है। संक्षिप्त मे हम कह सकते है कि व्यष्टि अर्थशास्त्र आर्थिक विश्लेषण की वह शाखा है जो विशिष्ट आर्थिक इकाइयों तथा अर्थव्यवस्था के छोटे भागों, उनके व्यवहार तथा उनके पारिवारिक सम्बन्धों का अध्ययन करती है। व्यष्टिगत आर्थिक इकाइयों और अर्थव्यवस्था के छोटे अंगों को "सूक्ष्म चरों" या "सूक्ष्य मात्राएं" भी कहते है। इस प्रकार से व्यष्टिगत अर्थशास्त्र सूक्ष्म मात्राओं व सूक्ष्म चरों के व्यवहार का अध्ययन करता है। 

कुछ अर्थशास्त्री व्यष्टि अर्थशास्त्र को " कीमत तथा उत्पादन का सिद्धांत" भी कहते है। इसे " कीमत सिद्धांत " भी कहा जाता है। व्यष्टि अर्थशास्त्र को कभी-कभी सन्तुलन विश्लेषण भी कहा जाता है।

व्यष्टि अर्थशास्त्र की विशेषताएं (vyasti arthashastra ki visheshta)

व्यष्टि अर्थशास्त्र की विशेषताएं इस प्रकार से हैं-- 

1. व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन 

व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत आय, व्यक्तिगत उत्पादन और व्यक्तिगत उपभोग की व्याख्या मे सहायता करता है। इसका संबंध समूहों या व्यापारिक स्थितियों से नही है।

2. सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव का अभाव 

व्यष्टि अर्थशास्त्र मे एक इकाई का रूप इतना छोटा होता है कि इसके द्वारा किये गये परिवर्तन का सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ता है।

3. कीमत का सिद्धांत 

व्यष्टि अर्थशास्त्र को कीमत या मूल्य का सिद्धांत भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत मांग एवं पूर्ति द्वारा विभिन्न वस्तुओं के व्यक्तिगत मूल्य निर्धारित किये जाते है। इस संदर्भ मे हम मांग एवं पूर्ति की घटनाओं का भी अध्ययन करते है। 

4. छोटे-छोटे चरों का अध्ययन 

व्यष्टि अर्थशास्त्र मे छोटे-छोटे चरों का अध्ययन किया जाता है, इन चरों का प्रभाव इतना कम होता है इनके परिवर्तनों का प्रभाव सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर नही पड़ पाता। 

5. सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को स्थिर मान लेना 

व्यष्टि अर्थशास्त्र मे किसी एक इकाई के आर्थिक व्यवहार की जांच और विश्लेषण करते समय देश की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से सम्बंधित बातों, जैसे-- राष्ट्रीय आय, कीमतों का स्तर, देश का कुल पूंजी विनियोग, कुल बचत तथा सरकार की आर्थिक नीति आदि को स्थिर मान लिया जाता है।

व्यष्टि अर्थशास्त्र के प्रकार (vyasti arthashastra ke prakar)

1. व्यष्टिगत स्थैतिक 

व्यष्टिगत स्थैतिक यह मानते हुए कि समय समय विशेष मे साम्य की स्थिति रहती है, एक दिये हुए समय पर व्यष्टिगत चरों के सम्बन्धो का साम्य की स्थिति मे अध्ययन करता है। उदाहरण के लिए, किसी वस्तु की कीमत एक बाजार मे उस वस्तु की मांग और पूर्ति के साम्य द्वारा निर्धारित होती है। व्यष्टिगत स्थैतिक दिये हुए समय पर इस वस्तु की साम्य या सन्तुलन कीमत का अध्ययन करेगी और पूर्ति की शक्तियों को स्थिर मान लेगी। संक्षेप मे, व्यष्टिगत स्थैतिक केवल विशिष्ट चरों के सम्बन्ध के " स्थिर या शांत चित्रों " का अध्ययन करती है। यह रीति आंशिक साम्य विश्लेषण से सम्बंधित होती है।

2. तुलनात्मक व्यष्टिगत स्थैतिक 

तुलनात्मक व्यष्टिगत स्थैतिक व्यष्टिगत चरों के सम्बन्धो की साम्य स्थितियों की तुलना करती है। विश्लेषण की यह विधि सन्तुलन की दो स्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन करती है परन्तु इस तथ्य पर प्रकाश नही डालती कि व्यष्टिगत सन्तुलन की एक स्थिति से दूसरी स्थिति तक किस प्रकार पहुंचा गया है।

3. व्यष्टिगत प्रावैगित 

व्यष्टिगत प्रावैगित विश्लेषण उस समायोजन की प्रक्रिया का अध्ययन करती है जिसके द्वारा विशिष्ट चरों के सम्बन्धों की एक सन्तुलन स्थिति से दूसरी सन्तुलन की स्थिति तक पहुंचा जाता है। उदाहरण के लिए, एक बाजार मे एक वस्तु की कीमत मांग और पूर्ति के सन्तुलन का परिणाम है। यदि मांग मे वृद्धि हो जाती है तो उस वस्तु के बाजार मे असन्तुलन उत्पन्न हो जायेगा और असन्तुलनों की एक श्रृंखला द्वारा उस वस्तु के बाजार मे कीमत की अंतिम सन्तुलन स्थिति मे पहुंचा जायेगा। व्यष्टिगत प्रावैगिक समायोजना की इसी प्रक्रिया का अध्ययन करता है अर्थात् अंतिम सन्तुलन की स्थिति तक पहुंचने के लिए असन्तुलनों की श्रृंखलाओं का अध्ययन करता है।

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