10/03/2020

मराठों के पतन के कारण

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maratho ke patan ke karan;1800 ई. के बीच मराठों का पतन हो गया। भारत की यह महान् शक्ति, जिसने एक समय संपूर्ण भारत को अपने पैरों तले रौंद दिया था अंग्रेजों के एक ही प्रहार से लड़खड़ा गयी और तृतीय मराठा युद्ध से शक्तिशाली मराठा संघ बिखर गया और उन्होंने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। मराठों की इस अवनति के अनेक कारण थे।

मराठों के पतन के कारण 

मराठों के पतन या अवनति के कारण इस प्रकार से है--

1. पानीपत का तृतीय युद्ध 

1761 मे पानीपत के युद्ध मे अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजय से मराठों की शक्ति और प्रतिष्ठा को दूरगामी आघात लगा। इससे मराठों की आर्थिक क्षमता बहुत घट गई। मराठा राजा का प्रभाव घटा तथा पेशवा का प्रभाव और उस पद को पाने की प्रतियोगिता बढ़ गई इसके लिए लिये फूट, गुटबाजी, षड्यंत्र और अराजकता बढ़ गई। कुछ पेशवा विलासी निकले। बाद मे पेशवा पर मराठा नेताओं का नियंत्रण स्थापित हो गया तथा वह प्रत्येक सरदार को प्रसन्न रखने मे अयोग्य हो गये। 

2. मराठों की आंतरिक दुर्बलताएँ

मराठों की आंतरिक दुर्बलता भी मराठों के पतन का कारण थी। मराठों की सबसे बड़ी दुर्बलता उनमे एकता अनुशासन और राष्ट्र भक्ति का अभाव था। मराठा राज्य विशाल जरूर था लेकिन उसमे दृढ़ता नही थी। मराठा साम्राज्य एक संघ था जिसका मुखिया पेशवा था किन्तु उसका अन्य मराठा सरदारों पर नियंत्रण नही था। 

होल्कर, सिंधिया, भोंसले और गायकवाड़ ये सभी मराठा सरदार अपनी सीमाओं मे स्वतंत्र थे और आवश्यकता पड़ने पर ये सभी एक-दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र करते रहते थे।

2. राजनैतिक संगठन की शिथिलता 

कमजोर केन्द्रीय व्यवस्था तथा साम्राज्यवादी प्रथा के कारण मराठों की अवनति हुई। आपसी संघर्ष के कारण संघ का स्वरूप भी बदलने लगा था। मराठा साम्राज्य क्षेत्र के बढ़ते ही मराठा सामन्तों ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी और शासन तथा सुव्यवस्था पर मराठा सरदारों ने अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। ये चौथ तथा सरदेशमुखी वसूल करने लगे। जब तक पेशवा शक्तिशाली रहा तब तक मराठा राज्यों के संबंध ठीक रहे किन्तु उसके कमजोर पड़ते ही मराठा सरदार उस पर हाबी होने लगे।  जब होल्कर और सिंधिया का बाजीराव द्वितीय पर अधिकार करने के लिए संघर्ष होने लगा तो पेशवा ने अपनी सुरक्षा के लिए बेसीन की संधि कर ली और अंग्रेजी सेना की मदद से पुनः पूना का शासन प्रारंभ किया। मराठों के इस कदम से अवनति निश्चित थी।

3. आर्थिक कारण

निरन्तर युद्धों मे मराठों की आर्थिक दशा खराब होती गई तथा वह अपने राज्यों मे कृषि, उद्योग और व्यापार का विकास नही कर पाये। सहायक प्रथा ने और कंपनी ने मराठा राज्यों का दिवाला ही निकाल दिया जिसके कारण मराठे साधन-सम्पन्न नही हो पाये। मराठों ने न तो कभी अपने कोष की चिंता की और न ही कभी राज्य की आर्थिक व्यवस्था की ओर ध्यान दिया। पर्याप्त आय होने पर ही राज्य की सुरक्षा के लिए सेना रखी जा सकती है तथा प्रशासन को मजबत बनाया जा सकता है। इस कारण से मराठों को युद्ध मे पराजय का मुख देखना पड़ा।

4. मराठों की कूटनीतिक अयोग्यता 

मराठे अंग्रेजों की प्रवृत्ति, उद्देश्य, कूटनीति और युद्ध प्रणाली को नही समझ पाये। चाहे रघुनाथ राव हों अथवा महादजी सिन्धिया हो या होल्कर, इस दृष्टि से ये सभी अक्षम थे। 

अंग्रेजों ने मराठों को अलग-अलग कर उनकी फूट का लाभ उठाकर उन्हें पराजित किया। उन्हें मैसूर से नही मिलने दिया। इस प्रकार मराठे अंग्रेजों की कूटनीति को समझने मे असफल रहे।

5. सैनिक दुर्बलताएँ 

राज्य की सुरक्षा के लिए तथा उसकी स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए प्रबल सैन्य शक्ति एक मूलभूत आवश्यकता है। मराठों ने तोपखाने और जल-शक्ति पर ध्यान नही दिया जिसके कारण वे अंग्रेजों को समुद्र मे नही रोक पाये तथा उनके तोपखानों का तथा बारूद का मुकाबला नही कर पाये। दूसरी सैनिक कमी यही थी कि टीपू के प्रयत्नों और शक्ति का मराठे साथ देते तो निश्चित ही इतिहास बदल जाता परन्तु लोभ ने उन्हें दोनों की सैनिक शक्तियों को मिलने नही दिया।

6. अंग्रेजों की श्रेष्ठ कुटनीतिज्ञता 

अंग्रेज सफल कूटनीतिज्ञ थे तथा मराठे उनके सामने बच्चे के सामन थे। अपनी कूटनीति के द्वारा अंग्रेजों ने सदैव मराठा सरदारों को एक दूसरे से अलग रखने मे सफलता पायी। 

7. आर्दश और राष्ट्रीय भावना का अभाव 

छत्रपति शिवाजी के व्यापक आदर्श और राष्ट्रीय उद्देश्य "हिन्दू पद पादशाही" आदि थे। इसके पश्चात योग्य पेशवा बाजीराव (1720), बालाजी बाजीराव आदि के उच्चदर्श बाजीराव द्वितीय ने छोड़ ही नही दिये बल्कि उन्हें भूला ही दिया जो सभी दृष्टियों से अनैतिक और आदर्श विहीन था। सम्पूर्ण मराठों मे भी यही स्थिति थी, इस कारण वे अपने मतभेद नही भूला सके।

8. मराठों के नेतृत्व की असामयिक मृत्यु 

मराठों के पतन के कारणों मू पेशवा माधवराव की मृत्यु थी जिसके उत्तराधिकार युद्ध चला। इसके पश्चात योग्य नेता नाना फड़नवीस की मृत्यु, रामशास्त्री की मृत्यु, महादजी तथा हरिवन्त और अहिल्या की मृत्यु आदि के कारण मराठे अपने को संभाल नही पाये। इस कारण उनमे अराजकता उत्पन्न हुई और उनकी पराजय हुई।

9. अंग्रेजों की श्रेष्ठ गुप्तचर व्यवस्था 

अंग्रेजों की श्रेष्ठ गुप्तचर व्यवस्था के द्वारा मराठों की शक्ति, सैन्य संचालन, उनके पारस्परिक संबंध तथा अन्य बातों की पर्याप्त जानकारी रहती थी इसके विपरीत मराठे अंग्रेजों की प्रत्येक गतिविधियों से अपरिचित रहते थे। यह भी उनकी पराजय का मुख्य कारण बनी।

10. देशी लड़ाकू जातियों से शत्रुता

वे भारत की शक्तिशाली जातियों मे से थे। अंग्रेजों को देश से बाहर करने के लिये उन्होंने जाट, सिख, राजपूतों से सहयोग नही लिया। चौथ और सरदेशमुख वसूल करने के कारण अन्य जातियाँ उनसे दूर रही। उन्होंने मराठों के संकट के समय उनकी सहायता नही की।

निष्कर्ष 

इन विशिष्ट कारणों के अलावा भी अनेक सहायक कारण थे जिससे मराठा राज्य का पतन हुआ। मराठों ने दक्षिण भारत मे सत्ता को संगठित करने का कोई प्रयत्न नही किया तथा उत्तर की राजनीति पर पर्याप्त ध्यान नही दिया। मराठों मे राष्ट्रीय भावना की बजाय क्षेत्रीय भावना की प्रधानता थी। सरकार एवं दत्त के शब्दों मे " मराठों की पराजय का कारण उनकी संघर्ष टालने की नीति थी। शुतुरमुर्ग की तरह उन्होंने भूलना चाहा कि शिकारी उनके पीछे था। पारस्परिक कलह तथा पड़ोसियों से कलह करने मे वे इतने व्यस्त रहे कि अंग्रेजों की ओर से खतरा था, उसे उन्होंने भूला दिया।" इस प्रकार उपर्युक्त अनेक कारणों से मराठा संघ का पतन हो गया।

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