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10/04/2020

ब्रह्म समाज के सिद्धांत एवं उपलब्धियां

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ब्रह्म समाज 

राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त 1828 को ब्रह्म समाज की स्थापना की, जो 1830 मे ब्रह्म समाज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मा समाज ने किसी उत्कीर्ण मूर्ति, तराशी मूर्ति, प्रतिमा शिल्पी मूर्ति, तेलचित्र या किसी प्रत्याकृति की पूजा की अनुमति नही दी।

समाज का लक्ष्य था-दानशीलता, दयालुता, सदाचार को प्रोत्साहित करना और सभी संप्रदायों व भिन्न-भिन्न धर्मावलंबियों और जातियों के बीच बंधुत्व की भावना मजबूत करना। 

ब्रह्म समाज के सिद्धांत 

ब्रह्म समाज के प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार है--

1. ईश्वर एक है, वह सर्वशक्तिमान है, अजर है, अमर है और अनश्वर है।

2. ईश्वर की दृष्टि मे नस्ल, वर्ण, जाति आदि का कोई भेदभाव नही है। ईश्वर की कृपा से मोक्ष संभव है। अतः सबको ईश्वर की आराधना करनी चाहिए।

3. कर्म प्रधान है। मनुष्य कर्म के अनुसार ही फल पाता है।

4. बाल-विवाह, बहुविवाह आदि प्रथाएँ अनुचित है और विधवा विवाह उचित है।

5. मूर्ति पूजा और कर्मकांड का त्याग कर देना चाहिए और ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए।

उन्होंने वेदों और पाँच मुख्य उपनिषदों को बाँग्ला मे अनूदित करवाया। यह सब एकेश्वरवाद के समर्थन के लिए किया।

आरंभ मे बंगाल के हिन्दुओं ने ब्रह्म समाजियों का विरोध किया, लेकिन शिक्षा के प्रसार के कारण वे भी अनुभव करने लगे कि पुरानी रूढ़ियों तथा सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए ब्रह्म समाज के उपदेश बुरे नही है, विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा आदि सामाजिक उन्नति के लिए उपयोगी है। उसके बाद ब्रह्म समाज की लोकप्रियता बढ़ने लगी।

ब्रह्म समाज की उपलब्धियां 

ब्रह्म समाज के प्रभाव के परिणामस्वरूप बंगाल मे ईसाई धर्म मे दीक्षित होने वालो की संख्या कम हो गई। इसने भारतीय समाज को आधुनिकता का पाठ पढ़ाया। यह सत्य है कि इस पर ईसाई धर्म का प्रभाव था। लेकिन इसकी उत्प्रेरणा के स्त्रोत प्राचीन हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ थे। इसने हिन्दू समाज को सुधारने की कोशिश की। इस समाज मे जो बुराइयां घुस आई उन सबको दूर करने की कोशिश की जैसे-- सती प्रथा, बहुविवाह, अनमेल विवाह, स्त्री, शिक्षा, नशाखोरी आदि। विधवा विवाह एवं स्त्री शिक्षा का इसने समर्थन किया। सामाजिक बुराइयों के विरोध का परिणाम यह हुआ कि इसने एक ऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि सभी का ध्यान समाज मे घुसे हुए उन दोषों पर गया। अपनी शिक्षाओं के प्रसार के लिए इसने कई उपाय लिए जैसे-- इसने कई संस्थाओं की स्थापना की, समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू किया जिससे लोगों को इन सामाजिक बुराइयों का पता चल सके। इसके सदस्यों ने चारों तरफ घूम-घूमकर ब्रह्रा समाज के सिद्धांतों एवं आदर्शों का प्रचार शुरू किया। इसके सदस्यों ने कई शिक्षण-संस्थाएं स्थापित की। इसके सदस्यों ने किसानो की दुरावस्था को सुधारने के लिए तथा समाचार-पत्रों की स्वाधीनता के लिए भी आंदोलन किया। किसानों की स्थिति सुधारने के लिए राजस्व विभाग मे भारतीयों की नियुक्ति, भू राजस्व को कम करना तथा भू राजस्व को निश्चित करना आदि कार्यों के लिए आंदोलन उन्होंने किसान और जमीदार के अनुरोध पर किया। उन लोगो ने भारत की प्राचीन संस्कृति का गुणगान भी किया। ब्रह्मा समाज ने भारतीय समाज का आधुनिकीकरण करने की भी कोशिश की। परोक्ष रूप से ब्रह्म समाज ने भारतीय जनता को राष्ट्र की भावना से परिचित कराने की कोशिश की।

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