10/06/2020

लार्ड विलियम बैंटिक के सुधार

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लार्ड विलियम बैंटिंक (1828 से 1835 तक) के प्रशासनिक, सामाजिक, न्यायिक, आर्थिक और शिक्षा सम्बन्धी सुधार 

इंग्लैंड मे संसदीय सुधारों की प्रेरणा इंग्लैंड मे जनकल्याण की भावना थी। विलियम बैण्टिक ने 1828 ई. मे भारत का गवर्नर जनरल बनने पर इसी प्रेरणा के अनुसार कार्य करने का निश्चय किया। उसने कहा कि " भारतीय जनता का कल्याण भारत स्थित अंग्रेजों का मुख्य कर्तव्य है। " उसने ब्रिटिश स्वतंत्रता की भावना का भारत मे विकास करने का प्रयत्न किया। डाॅ. आशीर्वादीलाल ने विलियम बैंटिंक की महानता के बारे मे कहा कि ," बैंटिक भारत का प्रथम गवर्नर था, जिसने भारत के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। वह नवीनवादी विचारधार से प्रभावित था।" 

लार्ड विलियम बैंटिक के प्रशासनिक सुधार

रेयतवाड़ी व्यवस्था को उसने लागू किया, जिसके द्वारा किसानों का सरकार से सीधा संबंध स्थापित हो गया।

1. राजकीय नौकरियों मे भारतीयों को स्थान

बैंटिक ने कार्लवालिस की नीति को बदल दिया। भारतीयों को प्रशासन से अलग रखने की शरारतपूर्ण नीति को समाप्त कर दिया। बैंटिक ने भारतीयों को नौकरी मे रखा। कहा जाता है कि भारतीयों को 1857 से कंपनी की नौकरी मे रखा जाने लगा, जिससे प्रशासनिक व्यय मे कमी हुई तथा भारतीयों को जन सहयोग भी मिला। उसने भारतीयों को निम्न पदों पर रखने की नीति अपनाई। 1833 के अधिनियम मे कहा गया कि जाति अथवा रंग के आधार पर मतभेद नही किया जाएगा। इस प्रश्न का आर्थिक पहलू था। कंपनी का साम्राज्य बढ़ गया और बड़ी संख्या मे अधिकारी मिले। यह प्रशासनिक दृष्टि से काफी उपयोगी रहा।

2. आगरा प्रांत मे तीस साला बंदोबस्त 

आगरा प्रांत मे तीस साला बंदोबस्त शुरू किया गया। यह राज्य अवध के नवाब और सिन्धिया के राज्यों के कुछ भागों को मिलाकर बनाया गया। यह समय यह उत्तरी पश्चिमी प्रांत के नाम से पुकार जाता था। आजकल यह संयुक्त प्रान्त कहलाता है।

विलियम बैंटिक के आर्थिक सुधार

लाॅर्ड विलियम बैंटिंक को सर्वप्रथम आर्थिक सुधारों की ओर ध्यान देना पड़ा। उसने आर्थिक स्थिति मे सुधार हेतु सुझावों के लिए एक सैनिक व एक नागरिक मामलों के आयोग की नियुक्ति की तथा उनसे प्राप्त सुझावों के आधार पर निम्न कदम उठाए--

1. शासकीय अधिकारियों के वेतन एवं भर्ती मे कमी कर दी गई। कलकत्ते के छह सौ मील के घेरे मे नियुक्त अधिकारियों के भत्ते घटाकर आधे कर दिये गये। केवल इस कटौती से ही बैंटिक ने 20,000 पौंड प्रतिवर्ष की बचत कर ली। उसने अधिक संख्या मे भारतीयों को सेवा मे नियुक्त किया क्योंकि उन्हें कम वेतन दिया जा सकता था।

2. खर्च कम करने के लिए प्रान्तीय दौरा अदालतों को समाप्त कर दिया गया।

3. देशी शासकों द्वारा दान अथवा पुरस्कार के रूप मे कई लोगों को जमीन दी जाती थी। इन दान की गई जमीनों पर कोई कर नही नही लिया जाता था। बैंटिंक ने इन भूखण्डों के स्वामित्व के सत्यापन का आदेश दिया। जो लोग आवश्यक प्रमाण-पत्र, दान-पत्र आदि दस्तावेज प्रस्तुत नही कर सके, उनकी जमीनें जब्त कर ली गई तथा शेष को भू-राजस्व जमा करने को बाध्य किया गया। इस आदेश के कारण कई लोग बेघर हो गये किन्तु कंपनी की आय मे निश्चित वृद्धि हुई। 

4. पश्चिमोत्तर प्रान्तों मे सन् 1822 मे लागू भू-राजस्व प्रणाली कठोर एवं अव्यावहारिक थी। बैंटिंक ने मार्टिन बर्ड के साथ इस क्षेत्र मे एक नई प्रणाली का सूत्रपात किया। शायकीय भाग को घटाकर 80 से 60 या सम्पूर्ण लगान का दो तिहाई कर दिया गया। भू-राजस्व को प्रतिवर्ष की बजाय तीस वर्षों के लिए स्थायी कर दिया गया। यद्यपि यह व्यवस्था दोषमुक्त नही थी फिर भी पिछली व्यवस्था से बेहतर सिद्ध हुई। बैंटिंक ने बंगाल, बिहार, उड़ीसा मे भी लगान वसूली के तरीकों को बेहतर बनाने का प्रयास किया।

5. बैंटिक ने राजकीय कोश मे वृद्धि के लिए चीन के साथ अफीम व्यापार को प्रोत्साहित किया। व्यापारियों को उदारता से लाइसेंस बाँटे गये। अब अफीम को मालवा से कराची न भेजकर सीधे बम्बई ले जाकर निर्यात किया जाने लगा। इससे परिवहन खर्च मे भारी कमी आई।

बैंटिंक के आर्थिक सुधार सफल हुए। जब वह भारत आया था तो कंपनी एक करोड़ प्रतिवर्ष के घाटे मे चल रही थी किन्तु जब बेंटिंक भारत से गया तो कंपनी को प्रतिवर्ष दो करोड़ का लाभ हो रहा था।

विलियम बैंटिक के न्याय संबंधी सुधार 

यद्यपि न्याय व्यवस्था मे वारने हेस्टिंग्ज और लार्ड हेस्टिंग्स ने तथा कार्नवालिस ने सुधार किये थे परन्तु अभी भी न्याय व्यवस्था मे अधिक विलम्ब, अधिक व्यय तथा अनिश्चितता बनी रहती थी। अतः इन्हें समाप्त करने के लिये बैण्टिक ने न्याय  क्षेत्र मे निम्म कार्य किये--

1. बंगाल मे न्याय प्रशासन बैण्टिक ने प्रान्तीय न्यायालय और सर्किट अदालतें तोड़ दी तथा सम्पूर्ण बंगाल को 20 भागों मे बाँटकर प्रत्येक मे कमिश्नर नियुक्त किये। इन्हें पूर्व प्रान्तीय अपील अदालतों, सर्किट अदालतों तथा माल विभाग के कलेक्टर के अधिकार दिये गये। पुलिस के कार्यों का भी यही निरीक्षण करते थे। मुख्य निजामत अदालत और माल विभाग के बोर्ड का कमिश्नर पर नियंत्रण होता था।

2. मजिस्ट्रेटों के अधिकारों मे वृद्धि की गई उन्हे 2 वर्ष के कारावास का दण्ड सुनने का अधिकार दिया गया। इनके खिलाफ अपील कमिश्नर के यहाँ होती थी।

3. न्यान प्रणाली से यथासम्भव फारसी को हटाया गया तथा भारतीय भाषाओं को आरंभ किया गया।

इस प्रकार बैंटिक की व्यवस्था से भारतीयों का सम्मान बढ़ा तथा उनकी न्याय-क्षमता तथा उनमे न्याय की शिक्षा मे वृद्धि 

हुई जिससे कंपनी का आर्थिक एवं प्रशासनिक बोझ भी काफी कम हो गया।  

विलियम बैंटिक के सामाजिक सुधार 

बैंटिंक ने सामाजिक सुधार भी किए। कंपनी ने अभी तक भारतीय रीति-रिवाजों मे हस्तक्षेप नही किया था। बैंटिंक ने कंपनी की नीति बदली। बैंटिंक से सामाजिक क्षेत्र मे निम्म कार्य किये--

1. नर बलि पर रोक 

भारत के कुछ भागों मे देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मानव बलि देने का प्रचलन था। मद्रास मे अनार्य जातियाँ भू-देव को प्रसन्न करने के लिए जीवित मनुष्य की बलि देती थी। उड़ीसा के खोंद लोगों मे भी इस प्रथा का प्रचलन था। विलियम बैंटिक ने एक अधिनियम को लागू करके इस कुप्रथा को समाप्त कर दिया और मानव बलि पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया।

2. दासों की स्थिति मे सुधार

1833 ई. के चार्टर एक्ट मे यह प्रावधान था कि दासों की स्थिति सुधारने के लिए समुचित कदम उठाये जायें। तदनुसार बैंटिक ने भी दास प्रथा की समाप्ति के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

3. सरकारी सेवाओं मे भेदभाव का अंत 

सरकारी सेवाओं मे लार्ड कार्नवालिस के काल से चली आ रही भेदभाव की नीति को बैंटिंक ने समाप्त कर दिया। 1833 के चार्टर एक्ट की धारा 87 के अनुसार योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार की गई तथा कंपनी के अधीनस्थ किसी भी भारतीय नागरिक को उसके धर्म, जन्मस्थान, जाति अथवा रंग" के आधार पर किसी पद से वंचित नही रखा जा सकेगा। विश्वास किया जाता है कि यह धारा बैंटिंक के आग्रह पर ही इस चार्टर मे सम्मिलित की गई थी। यद्यपि इसका तात्कालिक प्रभाव बहुत कम हुआ परन्तु सिद्धांत रूप मे इसका बहुत महत्व था।

4. बाल हत्या को रोकना

बैंटिक ने बाल हत्या जो कि एक क्रूर और भयानक कृत्य था, उत्तर भारत, मध्य भारत, राजस्थान मे प्रचलित था, इसे रोकने का प्रयास किया।

5. प्रेस की स्वतंत्रता 

बैंटिंक ने प्रेस प्रतिबंधों को 1835 मे समाप्त कर दिया।

6. सती प्रथा का अंत 

राजा राममोहन राय के सहयोग से विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को अवैध घोषित किया। 1833 मे यह कानून पारित किया। 

7. ठगों का दमन 

सामाजिक क्षेत्र बैंटिक का दूसरा सुधार ठगों का दमन था। यह कार्य करने के लिए कर्नल स्लीमेन को कहा गया। बड़ी चतुराई से एक के बाद एक दूसरे गिरोह पकड़े गए। ठग समाज के लिए अभिशाप थे। बैंटिंक ने भारत से ठगों का विनाश किया।

8. नई शिक्षा नीति 

बैंटिंक उपयोगितावादी विचारधार का व्यक्ति था। उसे विश्वास था कि भारत मे सांस्कृतिक परिवर्तन लाने के लिए एकमात्र कुंजी अंग्रेजी भाषा थी। इस भाषा के प्रचार के लिए उसने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी। उसके समय मे मैकाले के  विचार का समर्थन हुआ और 1835 मे कंपनी ने शिक्षा नीति की घोषणा की। यूरोपीय साहित्य और विज्ञान की शिक्षा के लिए भारतीयों को प्रोत्साहित किया गया। शिक्षा क्षेत्र मे एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

लार्ड विलियम बैंटिक का मूल्यांकन 

लार्ड विलियम बैंटिक अपने समय का सच्चा सुधारवादी था। उसके शासनकाल मे भारत मे एक नवीन युग का सूत्रपात हुआ। उसका सात वर्षों का शासनकाल दो उग्र तथा महँगे युद्ध कालों के मध्य मे शांति, आर्थिक स्थिरता एवं सामाजिक नवोन्मेश का युग था। उसने उस प्रशासन को पुनर्गठित किया जिसे लाॅर्ड काॅर्नवालिस द्वारा नवविजित प्रदेशों शीघ्रता मे स्थापित कर दिया गया। वह शांति, छँटनी, सुधार, खुली प्रतियोगिता, मुक्त व्यापार तथा अति सीमित सरकारी हस्तक्षेप मे विश्वास करता था। बैंटिंक ने वित्त, न्याय तथा शिक्षा के क्षेत्र मे युगान्तकारी नीतियों का सूत्रपात किया। वह प्रथम गवर्नर जनरल था जो मानता था कि भारत मे अंग्रेजों का प्रथम कर्तव्य भारतीय प्रजा का हितसाधन होना चाहिए।

मार्शमैन के अनुसार " लार्ड विलियम बैंटिक के कार्यकाल को भारतीय सुधारों के इतिहास मे प्रमुख स्थान प्राप्त है। लार्ड रियन के जैसे उसकी सफलताएँ शांति के क्षेत्र मे थी।

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