शीत युद्ध का अर्थ और उत्पत्ति के कारण

शीत युद्ध क्या था?

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विश्व दो गूटों- पूँजीवादी गुट व साम्यवादी गुट मे बंट गया। पूँजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरीका व साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था। ये दो महाशक्तियों और उनके आपसी सम्बन्धों की अभिव्यक्ति का नाम शीत युद्ध था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दोनों महाशक्तियों में वैमनस्य और कटुता बढ़ती गई। दोनों महाशक्तियों में राजनीतिक प्रभुत्व के लिए राजनीतिक प्रचार का संग्राम छिड़ गया। यह एक ऐसा युद्ध था, जिसका रणक्षेत्र मानव मस्तिष्क था।
इस लेख मे हम शीत का अर्थ और शीत युद्ध के प्रारंभ (उत्पत्ति) होने के कारण जानेंगे।

शीत युद्ध का अर्थ (shit yudh ka arth)

एन.एन.धर के के मत में " शीत युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका एवं रूस के मध्य क्रमशः विकसित उन कटु सम्बन्धों को कहा जाता है जिनके कारण दोनों राष्ट्र परस्पर प्रतिद्वंदी बनकर तीसरे विश्व युद्ध के लिये सम्बध्द हो गये थे।
शीत युद्ध का रणक्षेत्र मानव मस्तिष्क था। वास्तव में शीत युद्ध, नरसंहार और उसके पड़ने वाले प्रभाव से बचने तथा युध्द के लक्ष्य को प्राप्त करने की नवीन कला थी जिसमें कागज के गोलों, पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों तथा रेडियो के प्रचार साधनों से लड़ा जाने वाला युद्ध था। शीत युद्ध सोवियत संघ-अमेरिका आपसी सम्बन्धों की वह स्थिति थी जिसमे दोनों पक्ष शान्तिपूर्ण राजनयिक सम्बन्ध रखते हुए भी परस्पर शत्रुभाव रखते थे तथा शस्त्र-युद्ध के अतिरिक्त अन्य सभी उपायों से एक-दूसरे की स्थिति और शक्ति को निरन्तर दुर्बल करने का प्रयत्न करते थे। वस्तुतः शीत-युद्ध एक प्रचारात्म युद्ध था जिसमें एक महाशक्ति दूसरे के खिलाफ घृणित प्रचार का सहारा लेती थी।

शीत-युद्ध की उत्पत्ति (उदय) के कारण (shit yudh ke karan)

द्वितीय विश्वयुद्ध मे अमेरिका, सोवियत संघ तथा ब्रिटेन एक साथ थे, लेकिन युद्ध के खत्म होने के पहले ही सोवियत संघ का अमेरीका और ब्रिटेन से मतभेद शुरू हो गया था।
शीत युद्ध के प्रारंभ होने के निम्न कारण इस प्रकार हैं----

1. अणुबम का अविष्कार 

शीत युद्ध प्रारंभ होने का एक एक बहुत बड़ा कारण अमेरिका द्वारा अणुबमों का निर्माण था जिसे उसने हिरोशिमा और नागासाकी पर विध्वंस  के लिए प्रयुक्त किया था। अमेरिका द्धारा अणुबम अनुसंधान बहुत समय पहले से ही चल रहा था। इसकी जानकारी उसने ब्रिटेन को तो दी थी, किन्तु सोवियत संघ से यह रहस्य छिपाकर रखा। इससे सोवियत संघ व पश्चिमी राष्ट्रों की मित्रता में दरार पड़ गई।

2. बर्लिन की नाकाबन्दी

सोवियत संघ द्वारा लंदन प्रोटोकोल का उल्लंघन करते हुए 1948 मे बर्लिन की नाकाबन्दी कर दी जिससे पश्चिम बर्लिन व पश्चिमी जर्मनी के बीच सभी यातायात के रास्ते (सड़क, जल और रेल) बन्द हो गये। पश्चिमी राष्ट्रों ने सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ की उपरोक्त कार्यवाही की शिकायत करते हुए इसे शांति के लिए खतरा बताया।

3. साम्यवादी आन्दोलन


शीत युद्ध की उत्पत्ति के कुछ विचारकों के मत मे सोवियत संघ की 1917 की साम्यवादी क्रांति रही।

4. हित संघर्ष

शीत युद्ध वस्तुतः राष्ट्रीय हितों का संघर्ष था। द्वितीय महायुद्ध के उपरांत अनेक मुद्दों पर सोवियत संघ और अमेरिका के स्वार्थ आपस मे टकराते थे।
5. पश्चिम द्वारा सोवियत विरोधी प्रचार अभियान
युध्दकाल मे ही पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा सोवियत संघ के विरोधी वक्तव्य दिये जा रहे थे। उसकी शासन व्यवस्था को तानाशाही सरकार का लेबल भी दे दिया गया जिससे सोवियत संघ के मन में वैमनस्य बढ़ता गया।

6. शक्ति संघर्ष

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति शक्ति-संघर्ष की राजनीति है। विश्व मे जो भी परम शक्तिशाली राष्ट्र है उनमें प्रधानता के लिए संघर्ष होना अनिवार्य होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ तथा अमेरिका ही दो शक्तिशाली राज्यों के रूप में उदय हुए, अतः इनमें विश्व-प्रभुत्व स्थापित करने के लिए आपसी संघर्ष होना अनिवार्य था।

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