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1/15/2020

नि:शस्त्रीकरण क्या हैं? प्रकार और आवश्यकता के कारण

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नमस्कार दोस्तो स्वागत है आप सभी का kailash Education में आज के इस लेख मे हम निशस्त्रीकरण पर चर्चा करने जा रहें है जिसमे हम जानेंगे निशस्त्रीकरण क्या हैं? नि:शस्त्रीकरण का अर्थ, नि:शस्त्रीकरण के प्रकारों के बारें में और नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता के कारण भी जानेंगे।

नि:शस्त्रीकरण क्या हैं? (nishastrikaran kya hai) निशस्त्रीकरण का अर्थ 

नि:शस्त्रीकरण (निशस्त्रीकरण) एक कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य हथियारों के अस्तित्व और उनकी प्रकृति से उत्पन्न कुछ विशिष्ट खतरों को कम करना हैं। नि:शस्त्रीकरण से हथियारों की सीमा निर्धारित करने व उन पर नियंत्रण करने की ध्वनि निकलती है।
निरस्त्रीकरण
नि:शस्त्रीकरण (निशस्त्रीकरण) का लक्ष्य आवश्यकत रूप से नि:शस्त्र कर देना नहीं वरन् इस समय जो हथियार पाये जाते हैं उनके प्रभाव को घटा देना हैं। नि:शस्त्रीकरण कार्यक्रम को कुछ विचारकों द्वारा "शस्त्र नियंत्रण" की संज्ञा दी गई हैं। उनका मत है कि नि:शस्त्रीकरण की जगह यह शब्द ज्यादा उपर्युक्त है, क्योंकि नि:शस्त्रीकरण के अनुसार किसी भी राष्ट्र के पास किसी भी प्रकार के हथियारों का न होना हैं। पूर्ण नि:शस्त्रीकरण वर्तमान में कोई भी राष्ट्र नहीं चाहता हैं क्योंकि आत्मरक्षा, आन्तरिक व्यवस्था तथा उस प्रत्याशित बाह्रा आक्रमण से रक्षा के लिये अपने दायित्व पूर्ति हेतु कुछ सैन्य बल तो आवश्यक हैं।

नि:शस्त्रीकरण (निशस्त्रीकरण) के प्रकार (nishastrikaran ke prakar)

द्वितीय विश्वयुद्ध मे अपार जनहानि के बाद विश्व के प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा सताए जा रही हैं। यही अतः नि:शस्त्रीकरण को महत्व दिया जा रहा हैं। स्वरूप की दृष्टि निशस्त्रीकरण के प्रकार  निम्न हैं---
1. सामान्य नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण में सभी राष्ट्र या कम से कम सभी बड़ी शस्तियाँ सहभागी होती हैं।
2. परिमाणात्मक नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण में सभी या अधिकांश प्रकार के हथियारों मे कमी लायी जाती है। 
3. परम्परागत नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण के अन्तर्गत परम्परागत हथियारों पर रोक या प्रतिबन्ध लगाया जाता है। 
4. परमाणु नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण के तहत् परमाणु हथियारों को कम या समाप्त किया जाता हैं।
5. गुणात्मक नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण में कुछ खास प्रकार के आक्रामक हथियारों को कम या समाप्त किया जाता है। 
6. समग्र नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण मे सभी श्रेणी के सभी प्रकार से हाथियारों को प्रतिबन्धित कर दिया जाता हैं। इसे  पूर्ण नि:शस्त्रीकरण कहा जाता हैं।

नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता के कारण (nishastrikaran ki avashyakta)

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विश्व के दो भाग-साम्यवादी, गैर साम्यवादी या पश्चिमी शक्ति मे बँट गया और दोनों के बीच की प्रतिस्पद्धा ने नि:शस्त्रीकरण को आगे बढ़ाने से रोका। दोनों ही पक्ष एक दूसरे से अधिक शक्तिशाली होने, विश्व पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी होने तथा एक दूसरे को पीछे धकेलने के लिय परमाणु शस्त्रों को बढ़ाने की होड़ मे लग गए। महाशक्तियों की इस प्रतिस्पर्धा से भी नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता को बल मिला और अन्तर्राष्ट्रीय समाज में शस्त्रों को समाप्त करने या कम करने के प्रयास में लग गया। नि:शस्त्रीकरण की मुख्य रूप से आवश्यकता विश्व में शान्ति को बनाये रखने और युद्ध को रोकने के लिए आवश्यक हैं। लेकिन प्रश्न यह हैं कि नि:शस्त्रीकरण के लिये प्रयास क्यों कियें जायें? नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता के निम्न कारण स्पष्ट हैं।
1. आर्थिक एवं लोक कल्याणकारी कार्यों के लिये
शस्त्रों की होड़ करते हुए उनके निर्माण पर जो व्यय विभिन्न राष्ट्रों द्वारा किया जा रहा है, यदि वही व्यय समाज के आर्थिक एवं लोक कल्याणकारी कार्यों पर किया जाये तो शायद विश्व मे किसी मनुष्य को भूखा न सोना पड़े और न बिना वस्त्रों के कारण उसे ठण्ड से अपनी जान देना पड़े।
2. विश्व मे शांति स्थापना के लिये 
यह माना जाता है कि नि:शस्त्रीकरण की धारणा विश्व मे शांति स्थापना मे सहायक सिद्ध हो सकती हैं क्योंकि शस्त्रों का विकास देश को सैनिक दृष्टि देते हैं यह दृष्टि युद्ध की सम्भावना को बढ़ावा देती हैं। 
3. आणविक संकट से बचने के लिये
वर्तमान मे यदि आणविक युद्ध से विश्व को सुरक्षित रखना है तो नि:शस्त्रीकरण ही उसका एकमात्र रास्ता है। शस्त्रों पर रोक लगाने या कम करने से यद्यपि आक्रमणों को पूर्णतः समाप्त तो नही किया जा सकता पर उनको सीमित जरूर किया जा सकता हैं।
4. नैतिक वातावरण के लिए
नि:शस्त्रीकरण नैतिक वातावरण के लिए भी आवश्यक है। युद्ध के नैतिक अनौचित्य मे विश्वास रखने वाले विचारकों का मत है कि शस्त्र रखने का अर्थ है युध्द की मौन स्वीकृति और यह मौन स्वीकृति युध्द को बल देती है।
5. निरन्तर तनाव का वातावरण 
शस्त्रीकरण की बढ़ती हुई दौड़ के कारण सम्पूर्ण विश्व मे निरन्तर आतंक तथा तनाव का वातावरण बना हुआ है। इससे समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान मे बाधा पहुँचती है। शीत युद्ध मे अधिक उग्रता आती है।
6. शस्त्रों का परीक्षण 
सर्वोच्च शक्तियां जब शस्त्र बनाती है तो उन शस्त्रों का परीक्षण भी करना चाहती है। यह जानना चाहती है कि जो शस्त्र उन्होंने बनाए है, क्या वास्तव मे वह उतने ही मारक है, जितना उन्हें बनाया गया है। यह जानने के लिए वह संसार के विभिन्न भागों मे छोटे-मोटे युद्ध करती है।
7. शस्त्रीकरण मृत्यु का पैगाम 
शस्त्रीकरण के क्षेत्र मे होने वाली आश्चर्यजनक क्रांति ने सम्पूर्ण मानवता को जीवन और मृत्यु के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। तकनीकी आविष्कारों ने इतने भयानक शस्त्रों का निर्माण कर दिया है कि कुछ ही मिनटों मे सम्पूर्ण विश्व को नष्ट किया जा सकता है।
8. मनोविज्ञानिक दृष्टिकोण 
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से स्पष्ट है कि शस्त्रीकरण देश मे सैनिकीकरण को जन्म देता है। सैनिकों का होना इस बात का घोतक है कि किसी भी प्रकार से युद्ध मे विजय प्राप्त की जाय। इसी की उपस्थिति का अर्थ शक्ति का प्रदर्शन, धमकी, आक्रमण विरोध आदि को प्रोत्साहित करना है। ये इसी कारण मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अशान्त वातावरण उत्पन्न करते है।
9. उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद का अंत करने मे सहायक 
साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद ये सभी शक्ति को बढ़ाने के दूसरे रूप है। एक राष्ट्र का शक्ति व राष्ट्रो को बढ़ाना ही युद्ध को जन्म देना है। नि:शस्त्रीकरण मे साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का अंत होता है तथा राष्ट्रों के बीच शांति व्यवस्था की जा सकती है।
10. शस्त्रीकरण से अन्य देशों मे हस्तक्षेप 
शस्त्रीकरण दूसरे देशो द्वारा हस्तक्षेप करने का भी मार्ग प्रशस्त करता है। विश्व के छोटे राष्ट्र बड़े राष्ट्रों से शस्त्र तथा हथियारों की टेक्नोलॉजी का आयात करते है। आमतौर से यह देखा गया है कि बड़े राष्ट्र शस्त्र निर्यात और शस्त्र सहायता को राजनीतिक दबाव के साधन के रूप मे प्रयुक्त करते है ताकि परोक्ष रूप से प्राप्तकर्ता देश दाता देशों के चंगुल मे फंसे रहे। यही नही, शस्त्र सहायता तथा शस्त्र निर्यात के नाम पर बड़ी शक्तियाँ छोटे देशो की अर्थव्यवस्था मे घुसपैठ करती है।
11. गलती से युद्ध आरंभ होने का भय 
विश्व मे शस्त्रों का अपार भण्डार जमा होने से यह भय तो है ही कि जान-बूझ कर युद्ध आरंभ किया जा सकता है तथा इन शस्त्रों का प्रयोग किया जा सकता है। परन्तु यह आशंका भी लगातार बनी रहती है कि कहीं भूल से अथवा गलती से युद्ध आरंभ न हो जाए। युद्ध का निर्णय न होने पर भी, किसी गलतफहमी के कारण शस्त्रों का अपार भण्डार मानव जाति के लिए खतरा बन सकता है।

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