5/25/2022

उदारीकरण का अर्थ, आवश्यकता

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प्रश्न; उदारीकरण का आशय स्पष्ट कीजिए तथा भारत में आर्थिक उदारीकरण की आवश्यकता बताइए।

अथवा" भारत में आर्थिक उदारीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर--

उदारीकरण का अर्थ (udarikaran kya hai)

उदारीकरण का आशय नियमों व प्रतिबंधों में ढील देने या उदारता बरतने से हैं। जब सरकार औद्योगिक नीति, श्रम नीति, आयात-निर्यात नीति, कर नीति आदि के माध्यम से अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विनियोग, उत्पादन तथा वितरण में प्रतिबन्धों को हटाती हैं तो इसे उदारीकरण की नीति कहा जाता हैं। उदारीकरण में निम्नलिखित बातें शामिल हैं-- 

1. आयात पर लगे प्रतिबन्धों में ढील देना। 

2. आयात शुल्क में कमी करना। 

3. विदेशी विनिमय के क्षेत्र में चालू खाते को पूर्ण परिवर्तनीय बनाना। 

4. उद्योगों की स्थापना के लिए लाइसेन्स प्रणाली समाप्त करना। 

5. बिना सरकारी अनुमति के औद्योगिक क्षमता का विस्तार करने की छूट देना। 

6. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों की संख्या कम कर देना तथा विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व निगमों को भारत में उद्योग स्थापित करने की अनुमति देना। 

7. 'गैट' नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का प्रस्ताव मानकर अमीर देशों को अपने पेटेण्ट करवाकर उनसे खेती के लिए बीज खरीदेने की नीति लागू करना। 

8. विदेशी निवेशकों को अपनी पूँजी को भारत में निवेश करने की अनुमति देना।

10. विदेशी तकनीक का लाभ उठाना।

भारत में आर्थिक उदारीकरण की आवश्यकता 

भारत द्वारा उदार आर्थिक नीतियों का अंगीकार देश के तत्कालीन संकटग्रस्त आर्थिक हालातों का परिणाम था। नयी आर्थिक नीति में उदारीकरण की आवश्यकता के मूलभूत कारणों को संक्षेप में निम्नानुसार जाना जा सकता हैं-- 

1. राजनीतिक अस्थिरता 

राष्ट्र की आर्थिक स्थिति तत्कालीन राजनीतिक अस्थिरता के फलस्वरूप निरन्तर डाँवा-डोल हो रही थी। अर्थव्यवस्था को सही दिशा प्रदान करने के लिए आर्थिक नीति में क्रान्तिकारी परिवर्तन अत्यावश्यक थे। 

2. बजट घाटे में निरन्तर वृद्धि

देश के बजट घाटे में निरन्तर वृद्धि होती जा रही थी। अतः बजट घाटे को कम करने एवं उसे निम्न स्तर पर लाने के लिए उदारीकृत आर्थिक नीति आवश्यक थी। 

3. सार्वजनिक उपक्रमों में घाटे की स्थिति

उत्पादन के क्षेत्र में सार्वजनिक उपक्रमों ने अच्छा कार्य नहीं किया। कुछ अपवादों को छोड़कर सार्वजनिक क्षेत्र अपने लिए संसाधन जुटाने, उचित वृद्धि दर बनाये रखने, उत्पादकता तथा कार्यकुशलता की दृष्टि से असफल सिद्ध हुआ। इनमें अनुसंधान और विकास हेतु उन्नत टेक्नोलॉजी को नही अपनाया गया और ये घाटे के उपक्रम बनते गये। 

4. मुद्रा स्फीति में वृद्धि 

घाटे की वित्त व्यवस्था अपनाने के कारण मुद्रा-स्फीति अपना विकराल रूप धारण कर द्वि-अंकीय बन चुकी थी, परिणामस्वरूप पूरा देश महँगाई की चपेट में आकर त्रस्त हो चुका था। 

5. औसत रहन-सहन के स्तर में कमी 

देश में बढ़ती हुई कीमतों के कारण औसत उपभोक्ता की क्रयशक्ति में कमी आ गयी और उपभोग व्यय में वृद्धि हो गयी। फलतः उपभोक्ता के औसत जीवन-स्तर में गिरावट आती जा रही थी। 

6. प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन

घरेलू कीमत स्तर में वृद्धि के परिणामस्वरूप आयातों को प्रोत्साहन मिला तथा निर्यात हतोत्साहित हुए। इससे देश का भुगतान सन्तुलन तेजी से प्रतिकूल होता जा रहा था। 

7. विनियोग ढाँचे पर प्रतिकूल प्रभाव 

मुद्रा-स्फीत बढ़ने के कारण विनियोग का प्रवाह प्रायः विलासिताओं की वस्तुओं के उत्पादन में बढ़ा, जबकि आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन उपेक्षित हुआ। इसके कारण विनियोग एवं उत्पादन के क्षेत्रों में असन्तुलन एवं विकृतियाँ उत्पन्न हो चुकी थीं। 

8. भारतीय उद्योगों को प्रतियोगी बनाना 

सरकार की संरक्षणवादी नीतियों का लाभ उठाकर भारतीय उद्योगों ने न तो गुणवत्ता में सुधार किया और न ही लागत को कम करने का प्रयास किया। भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप प्रतिस्पर्द्धात्मक बनाकर ही उत्पादन की गुणवत्ता एवं कीमत को प्रतियोगी बनाया जा सकता हैं, अतः उद्योगों को दिया गया संरक्षण समाप्त करना आवश्यक हो चुका था। 

9. विदेशी ॠणों का बढ़ता बोझ 

सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता के आधार पर विकसित करने की नीति के कारण अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं एवं विदेशी सरकार से बहुत बड़ी मात्रा में ॠण एवं आर्थिक सहायता प्राप्त की गयी। इन ॠणों से परियोजनाएं तो पूरी की गई, किन्तु ॠणों का भुगतान संबंधी दायित्व उन पर नहीं डाला गया। परिणामस्वरूप देश पर विदेशी ॠण एवं इनके ब्याज का बोझ बढ़ता ही गया। 

10. बंधित ॠण

भारत को प्राप्त विदेशी सहायता का लगभग दो-तिहाई भाग बन्धित ॠण के रूप में मिला है। ॠण की ऐसी राशि के स्वतंत्र विनियोग पर प्रतिबंध के कारण देश अपनी प्राथमिकताओं को पूरा नहीं कर सका, जिसका प्रतिकूल प्रभाव देश के विकास पर पड़ा।

संक्षेप में, देश में राजनीतिक राजकोषीय एवं बजटीय घाटा, द्वि-अंकीय मुद्रा-स्फीति, बढ़ती औद्योगिक रूग्णता, ऋणात्मक औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर दयनीय विदेशी मुद्रा भण्डार एवं भुगतान सन्तुलन को बढ़ती प्रतिकूलता जैसे अनेक आर्थिक संकटों ने देश की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थायें इस अस्थिर आर्थिक वातावरण में वित्तीय सहायता देने से कतरा रही थी, जिसका देश की औद्योगिक उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था। रूपये में पूर्ण परिवर्तनीयता के अभाव के कारण भी विदेशी मुद्रा को काफी क्षति पहुँच चुकी थी। ऐसे प्रतिकूल एवं अस्थिर आर्थिक वातावरण में संजीवनी के रूप में भारत सरकार ने अगस्त 1991 से अपनी नवीन आर्थिक नीति के तहत सुधारात्मक उपायों की एक श्रंखला आरंभ की। उदारीकरण पर आधारित यह आर्थिक श्रृंखला भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण, निजीकरण एवं विश्वव्यापीकरण का मार्ग प्रशस्त करती हैं। देश की नयी आर्थिक नीति के अन्तर्गत लाइसेंस, नियंत्रण, कोटा, प्रशुल्क एवं विदेशी निवेश आदि में उदारीकृत दृष्टिकोण अपनाकर अर्थव्यवस्था में उदारीकरण का दौर आरंभ किया गया।

उदारीकरण के उद्देश्य 

उदारीकरण की नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है-- 

1. घरेलू उत्पादन प्रणाली में सुधार तथा उत्पादन क्षमता का विकास करना। 

2. रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना। 

3. वस्तुओं तथा सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना। 

4. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में शामिल होना।

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