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4/10/2021

शाहजहां का इतिहास, शासनकाल, घटनाएं

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शाहजहां का इतिहास  

shahjahan ka itihas;शाहजहां का जन्‍म 1592 ई. हिन्‍दू मां के गर्भ से हुआ था। उसका वास्‍तविक नाम खुर्रम था। दक्षिण में प्राप्‍त सैनिक सफलताओं के बाद जहांगीर ने उसे शाहजहां की उपाधि दी। फरवरी 1628 में वह शाही तख्‍त पर बैठा। शाहजहां के शासनकाल को मुगल काल का स्‍वर्ण युग कहने का रिवाज रहा है। यह केवल स्‍थापत्‍य कला एंव भवन निर्माण की दृष्टि से ही सही है। विश्‍व प्रसिद्ध ताजमहल उसी ने बनवाया था। दिल्‍ली का लाल किला, उसके अन्‍दर दीवाने आम, दीवाने खास तथा रंगमहल उसी ने बनवाया था। मोती मस्जिद तथा आगरा के किले में अनेक भव्‍य एंव सुन्‍दर भवनों का निर्माण शाहजहां ने ही करवाया था। स्‍थापत्‍य की दृष्टि से यह संगमरमरी स्‍वर्ण युग था। 

शाहजहां के शासनकाल में हुए प्रारंभिक विद्रोह, मध्‍य एशिया और कंधार को जीतने के असफल एंव कष्‍टदायी प्रयास, दक्षिण भारत में सैनिक सफलताएं, संपत्रता और चमक-धमक के साथ ही अकाल की भीषण छाया, विदेशी यात्रियों का भारत आना, अकबर की धार्मिक नीति से विमुखता का प्रारम्‍भ, शिवाजी का उदय आदि इस काल की खास-खास बातें है। 1657-58 में शाहजहां के चारों पुत्रों दाराशिकोह, मुराद, औरंगजेब और शुजा में उत्तराधिकार का खुनी यूद्ध हुआ। उसमें औरंगजेब की सफलता  इतिहास की धारा को बदलने वाली घटना सिद्ध हुई। 1658 से अपनी मृत्‍यु तक शाहजहां आगरा के किले में ही नजरबंद रहा। उसे उसकी प्रिय पत्‍नी मुमताज महल के करीब ही ताजमहल में दफनाया गया। 

अब हम शाहजहां की मध्‍य एशिया नीति, दक्षिण नीति तथा उत्तराधिकार का युद्ध 1657-58 की विवेचना कुछ विस्‍तार से करेगें। 

शाहजहां के शासनकाल की प्रमुख घटनाएं 

1. खानजहां लोदी का विद्रोह 

शाहजहां द्वारा दक्षिण से आगरा बुलवाए जाने पर खानजहां आगरा आ तो गया था लेकिन वह वहां रूका नही तथा वह अपने अफगान समर्थकों को लेकर दक्षिण भाग गया। शाही सेना ने उसका पीछा किया। अनेक स्‍थानों पर हुए युद्ध में खानजहां लोदी पराजित हुआ। इसके पश्‍चात् वह उत्तर की ओर भागा।  उसने मालवा पार किया। शाहनी सेना पीछा करती रही तथा वह इधर-उधर भागता रहा। अंत में 1631 में वह उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के ‘सिंहोदा‘ नामक स्‍थान पर पकड़ा गया तथा मार डाला गया। 

2. जुझारसिहं बुंदेला का विद्रोह 

बुंदेलखंड का शासक वीरसिंह सिंह बुंदेला जहांगीर का बड़ा स्‍वामिभक्‍त था। 1627 में उसकी मृत्‍यु हो गई तथा जुझारसिंह बुन्‍देला बुन्‍देलखण्‍ड का शासक बना। उसने शाहजहां के विरूद्ध विद्रोह कर दिया, पर शाही सेना के सामने उसे आत्‍म-समर्पण करना पड़ा। उसे मुगलों को बुंदेलखंड का बहुत बड़ा भाग देना बड़ा 1635 में शाहजहां की आज्ञा लिए बिना जुझार सिंह ने गोंडवाना को विजित किया। शाहजहां ने उसे आदेश दिया कि वह उसे तुरंत गोडंवाना सौंप दे। पर जुझारसिंह ने मना कर दिया। अतः शाहजहां ने उसके विरूद्ध सेना भेजी और जुझारसिंह को पराजित कर दिया गया। मुगलों तथा जुझारसिंह के मध्‍य संधि हो गई। संधि की शर्तो के अनुसार जुझारसिंह को 15 लाख रूपये एंव 1000 सोने की मोहरें मुगलों को देनी पड़ी। 

3. पुर्तगालियों का दमन 

अकबर के शासनकाल के उत्तरार्द्ध में और जहांगीर के शासन काल में पुर्तगालियों को अनेक सुविधाएं प्रदान की थी। जिनका अब वे दुरुपयोग करने लगे थे। वे भारतीय जनता के साथ अच्‍छा व्‍यवहार नही करते थें एंव उन्‍हें बलात् ईसाई बना देते थे। वे बूढ़ों का अपहरण तथा गांवो में लूटपाट किया करते थे। अतः शाहजहां उन्‍हें दंडित करना चाहता था। 1631 में शाहजहां ने बंगाल के गवर्नर कासिम खां को आदेश दिया कि वह पुर्तगलियों का दमन करे। अतः कासिम खां ने जल तथा थल दोनों मार्गो से पुर्तगालियों पर आक्रमण कर दिया। तीन महीने तक दोनों पक्षो में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में पूर्तगालि  पराजित हुए। बाध्‍य होकर उन्‍हें आत्‍म-समर्पण करना पड़ा इस युद्ध में पुर्तगालियो की अपार क्षति हुई। युद्ध में 10000 पुर्तगाली सैनिक मारे गए एंव 440 बंदी बनाए गए। शाहजहां ने पुर्तगालियों को आदेश दिया कि या तो वे इस्‍लाम धर्म स्‍वीकार कर लें या फिर आजीवन कारावास का दंड। इस युद्ध में मुगलों की बहुत कम क्षति हुई। उनके करीब 1000 सैनिक वीरगति को प्राप्‍त हुए। 

4. भयंकर अकाल 

1630 के लगभग में गुजरात तथा खानदेश में भंयकर अकाल पड़ा। जिसमें बहुसंख्‍या में लोग मारे गए। अकाल इतना भीषण था कि सड़के लाशों से भर गयी। जिसमें शाहजहां ने इस भीषण परिस्थिति में पीड़ित प्रजा को भोजन प्रदान करने के लिए भोजनालय खुलवाए जिसमें लोगों को निःशुल्‍क भोजन देने की व्‍यवस्‍था की और मालगुजारी का 1/3 भाग माफ कर दिया। इस अकाल ने कई गांव के गांव को बर्वाद करके रख दिया। 

5. जुझारसिंह बुंदेला का पुनः विद्रोह 

1635 में जुझारसिंह बुंदेला ने एक बार पुनः शाहजहां के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का दमन करने हेतु शाहजहां ने अपने पुत्र औरंगजेब को भेजा। उसने जुझारसिंह के पुत्र विक्रमजीत का वध कर दिया गया। उसके दो अन्‍य पुत्रों को मुसलमान बना दिया गया। जुझारसिंह का वध कर उसके कटे हुए सर को दरबार में भेजा गया और इस प्रकार जुझारसिंह बुंदेला के विद्रोह का दमन कर दिया गया। 

6. चंपतराय और जगतसिंह का विद्रोह 

महोबा के राजा चंपतराय ने तथा नूरपूर के जगत सिंह ने शाहजहां के विरूद्ध विद्रोह किये जिन्‍हें शाहजहां ने दबा दिया। 

7. मुमताज महल की मृत्‍यु

शाहजहां की सर्वाधिक प्रिय मुमताजमहल की 7 जून 1631 को प्रसवपीड़ा से मृत्‍यु हो गई। 

अन्‍य घटनाएं 

भागीरथ भील, मारवी गोंड एंव अन्‍य छोटे सरदारों, रतनपूर के जमींदार बाबू लक्ष्‍मण के विरूद्ध भी अभियान किये गये। ऐसा भी पता चलता है कि शाहजहां ने गढ़वाल जीतने का प्रयास किया था और असम के विरूद्ध भी सेना भेजी थी। 

शाहजहां की दक्षिण नीति 

शाहजहां के समय अधिक सशक्‍त और आक्रामक दक्षिण नीति देखने को मिलती है।  उसने दक्षिण भारत पर अपना प्रभुत्‍व स्‍थापित करने के दृढ़ प्रयास किये। वह स्‍वंय अच्‍छा सेनापति थाः दक्षिण भारत की स्थिति और राजनीति का उसे अच्‍छा अनुभव था। 

1.अहमदनगर की समाप्ति 

मलिक अम्बर की मृत्‍यु 1626 के बाद उसका पुत्र फतह खां राज्य का वजीर बना। वह ‘अयोग्‍य‘,‘स्‍वार्थी‘ और धूर्त था। उसने ‘मुर्तजानिजाम शाह‘ द्वितीय की हत्‍या करवा दी। वह अपने स्‍वामी अथवा निजाम शाही वंश के प्रति वफादर नहीं था। उसने 10 वर्षीय शाहजादें ‘हुसैन शाह‘ को गद्दी पर बिठाया परन्‍तु उसके प्रति भी वह वफादर न रहा। उसने शाहजहां से भारी रिश्‍वत लेकर ‘दौलतावाद‘ पतन करवा दिया। इसका अर्थ था- अहमदनगर की समाप्ति। हुसैन शाह को ग्‍वालियर के किले में बन्‍द कर दिया गया। फतह खां को उच्‍च पद और वेतन का पुरस्‍कार मिला। अहमदनगर राज्‍य को मुगल साम्राज्‍य में सम्मिलित कर लिया गया 

2. गोलकुंडा की विजय 

गोलकुंडा के शासक अल्‍पायु होने तथा सरदारों की आपसी कलह के कारण इस समय गोलकुंडा की हालत दुर्बल हो रही थी। शाहजहां ने जब मुगलों की अधीनता स्‍वीकारने हेतु दबाव देते हुए पत्र भेजा तो 1636 में गोलकुंडा ने मुगलों की अधीनता स्‍वीकार कर ली। 

3. बीजापुर की विजय 

बीजापुर में इस समय मुहम्‍मद आदिल शाह सुल्‍तान था। 1631 में मुगलों का आक्रमण विफल रहा। 1636 में मुगलों ने पुनः आक्रमण किया। बीजापुर को अधीनता के लिए विवश किया गया। 

मध्‍य एशियाई नीति

शाहजहां ने अपने पूर्वजों की तरह एशिया में अपना अधिकार स्‍थापित करना चाहा। 1645 में उसने बल्‍ख तथा बदख्‍शों को राजनीतिक संदेश भेजे। पर जब इसका कोई असर नहीं हुआ तो शाहजहां ने मुराद के नेतुत्‍व में एक सेना भेजी। 1646 में मुराद ने बल्‍ख पर अधिकार कर लिया। मुराद यहां रहना नहीं चाहता था इसलिए वह शीध्र ही वापस भारत आ गया। अ‍ब औरगंजेब को बल्‍ख भेजा गया। उसने अनेक कठिनाईयों का सामना करने के पश्‍चात् बल्‍ख में प्रवेश किया। औरंगजेब का वहां अब्‍दुल अजीज की उज्‍बेग सेना के साथ भंयकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुगलों की अपार क्षति हुई। मजबूरन औरंगजेब को पीछे हटना पड़ा। वह बहुत ही मुश्किल से काबुल पहुचं । इस युद्ध में हुई मुगलों की हानि के विषय में यदूनाथ सरकार ने लिखा है, ‘‘देश की समृद्धि से शाहजहां का सिर फिर गया। हिन्‍दूकुश पर्वत के आगे एक अपरिचित स्‍थान में भारतीय सेनाओं को ले जाना गलत था। इसमें असफलता ही मिलनी थी। शुत्र प्रदेश की 1 इंच भूमि भी मुगल साम्राज्‍य में न मिलाई जा सकी और न ही बल्‍ख का राजवंश ही बदला जा सका।‘‘

इस तरह शाहजहां अपनी मध्‍य एशिया की नीति में पूर्णतः असफल रहा।

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