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4/10/2021

जहांगीर का इतिहास, चरित्र, शासनकाल, घटनाएं

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जहांगीर का इतिहास 

jahangir ka itihas;जहांगीर के बचपन का नाम सलीम था और उसका जन्‍म 30 अगस्‍त 1569 में हिन्‍दू मां से हुआ था। उसकी मां आमेर के राजा भारमल की पुत्री थी और मुगल हरम में ‘मलिका-उ-जमानी‘ के नाम से प्रसिद्ध थी। फतहपुर सीकरी के शेख सलीम चिश्‍ती के आर्शीवाद से अकबर को प्रथम पुत्र की प्राप्ति हुई थी, इसलिए अकबर ने उसका नाम सलीम रखा। यही सलीम 1605 में जहांगीर के नाम से अकबर का उत्तराधिकारी बना। सामान्‍यतः अकबर के शासनकाल की नीतियां इस युग में  भी जारी रहीं। मेवाड़ के राणा अमरसिंह के सम्‍मान जनक संधि, नूरजहां से जहांगीर का विवाह एंव उसका राजनीतिक प्रभुत्‍व, शाहजहां और महावत खां के विद्रोह, अहमद नगर के मलिक अम्‍बर का संघर्ष तथा कंधार का मुगलों के हाथो से निकल जाना जहांगीर के शासनकाल की प्रमुख घटनांए हैं। चित्रकला में जहांगीर का काल स्‍वर्ण युग था। 1627 ई. में जहांगीर की मृत्‍यु हुई। जहांगीर का मकबरा लाहौर में है। 

सिंहासनारोहण के बाद 1605 से 1611 के बीच जहांगीर के राज्‍यकाल की प्रमुख घटनांए थी- दस्‍तुर-अल-अमल के नाम से प्रसिद्ध उसकी आदर्श बारह घोषणांए, बंगाल विजय, मेवाड़ विजय और सन्धि आदि। 1611 में नुरजहां के साथ उसके विवाह के पश्‍चात् जहांगीर का शासनकाल, नूरजहां का प्रभावकाल भी बन जाता है। 

जहांगीर का चरित्र एंव प्रमुख कार्य 

जहांगीर के चरित्र की प्रमुख विशेषतांए इस प्रकार है- 

1. कामुक व्‍यक्ति 

जहांगीर कामूकता का लोलूप व्‍यक्ति था। स्‍वंय की कामवासना की पूर्ति के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था। किशोरावस्‍था में जबकि उसका विवाह हो चुका था तब भी मेहरूनिस्‍सा की ओर आकर्षित हुआ, फिर सम्राट बनने के बाद उसके पति और स्‍वंय के मित्र शेर अफगान की हत्‍या करवाने में नही चुका। उसने राजपूत लड़कियों से दो राजनैतिक विवाह किए फिर भी उसने लगभग 300 से 400 रखैलें रखी।

2. मादक द्रव्‍यों का अतिशह प्रयोग 

जहांगीर बहुत ही शराबी, अफीमची और स्‍त्री व्‍यसनी व्‍यक्ति था। उसने स्‍वंय नूरजहां पर मोहित होकर राजसत्ता उसे सौपं दी थी और स्‍वंय कुछ मांस और शराब की अपेक्षा करता था। नूरजहां ने उसकी इस आदत का पूरा लाभ उठाया और सत्ता का अपने स्‍वार्थ की पूर्ति में उपयोग किया। 

3. विद्रोही

जहांगीर ने अकबर को विष देकर मारने का प्रयास किया था। उसने अकबर के खिलाफ विद्रोह किया तथा अबुल फजल की भी हत्‍या कर दी जिससे साम्राज्‍य की हानि हुई। 

4. अन्‍यायी 

कुछ इतिहासकार उसे न्‍यायप्रिय बताते है। पंरतु उसमें पक्षपात और अन्‍याय बहुत अधिक था। अबुल-फजल एंव शेर अफगान की हत्‍या इसके उदाहरण हैं। परंतु अपने विद्रोही पुत्र अमीर खुसरो को क्षमा करना और उसे मदद देने वाले सिक्‍ख गुरू अर्जुन देव की हत्‍या करवाना, गुरू हरगोविन्‍द को बंदी बनाना धर्मान्‍ध और पक्षपात पूर्ण स्‍वभाव आदि अन्‍याय के उदाहरण थे। 

5. जहांगीर की कूटनीति 

जहांगीर जब सम्राट बना तो उसे धर्मान्‍ध राज्‍य के संकट दिखाई दिए अतः उसने हिन्‍दूओं के प्रति धर्मनिरपेक्षता की नीति का प्रयोग किया। अपने समर्थकों को उच्‍च पद देकर उसने अपनी शक्ति की वृद्धि की। जनता केा प्रदर्शित करने के लिए महल के बाहर जंजीर लगाकर न्‍यायप्रियता का प्रदर्शन किया। अपने ही विद्रोही पुत्र खुसरों को कूटनीति से मरवा दिया। अबुल फजल के पुत्र को मनसबदार बनाकर उसने पिता की हत्‍या का बदला लेने की उसकी भावना को समाप्‍त कर दिया। 

जहांगीर के शासनकाल कि प्रमुख विशेषतायें 

जहांगीर अकबर के समान वीर, शासन सहिष्‍णु तथा कूटनीति सम्राट नहीं था। उसके शासन मे निम्‍न घटनायें घटीं साम्राज्‍य का लाभ होने की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई। 

1. अमीर खुसरों का विद्रोह 

अमीर खुसरों जहांगीर और मानवाई का पुत्र था तथा अन्‍यों से आयु में सबसे बड़ा था उसने एक बार अकबर के काल में भी सम्राट बनने का प्रयत्‍न किया था तथा जहांगीर के सम्राट बनने के बाद उसने विद्रोह किया। जिसे 1622 ई. में खुसरों को खुर्रम के संरक्षण के लियें जहांगीर प्रमुख रूप से उत्तरदायी था।

2. कंधार में असफलता 

जब खुसरों ने विद्रोह किया तब फारस के शाह ने कंधार जीतनें का प्रयत्‍न किया परन्‍तु जहांगीर ने इस प्रयास को असफल कर दिया। अब फारसशाह ने उपहार आदि भेजकर और चाटुकारिता का प्रयोग किया। जब 1621 मे जब मुगलों में फूट फैली तो उसने पुनः कंधार पर आक्रमण करके अधिकार कर लिया। परन्‍तु खुर्रम के विद्रोह के कारण जहांगीर कंधार पर अधिकार नहीं कर पाया तथा उसके चार अभियान और औरंगजेब के प्रयत्‍न भी व्‍यर्थ हो गये। इससे राज्‍य का धन और सेना की भारी हानि हो गई। मुगलों में संघर्ष और विद्रोह होने लगे। 

3. विजय अभियान 

अकबर ने मेवाड़ पर लगातार आक्रमण करके उसे काफी हानि पहुंचाई थी। जहांगीर ने भी राजपूतों के गौरवशाली राज्‍य चित्तौड पर 1605 में आक्रमण किये। इसमें प्रमुख रूप से राजपूतों राजाओं ने सहयोग दिया। मुस्लिम सेनापति महावत खां भागकर लौट गया। अन्‍त में अकबर की नीति का पालन करते हुये जहांगीर ने अमरसिंह से मित्रतापूर्ण संधि कर ली। जिसमें अमरसिंह के सम्‍मान का पूरा ध्‍यान रखा गया। चित्तौड़ ने जहांगीर की अधीनता मान ली। 

4. अहमद नगर की विजय 

अहमद नगर का अभियान जहांगीर के लिये बहुत ही चुनौती पूर्ण रहा। मलिक अम्‍बर वहां का शासक था उसके खिलाफ रहीम, खान-ए-जहांलोदी, अब्‍दुल्‍ला खां और खुर्रम को भेजा। इस प्रकार 1608 से 1617 तक युद्ध चलता रहा। अन्‍त में मलिक अम्‍बर ने सन्धि कर ली। मुगलों ने उसके प्रदेश उसको लौटा दिये और 14 लाख की आमदनी का प्रदेश मुगलों को मिल गया। यद्यपि गोलकुण्‍डा ने भी समर्पण कर दिया। इससे शाहजादा खुर्रम की प्रतिष्‍ठा बढ़ गई और जहांगीर ने उसे ‘शाहजहां‘ की उपाधि दी तथा उसके द्वारा खुसरों की हत्‍या पर ध्‍यान नहीं दिया। विजय और धन पाकर वह नुरजहां का विरोधी हो गया तथा नूरजहां समर्थक एंव उसके भाई ने अपनी पुत्री का विवाह खुर्रम से कर दिया जिससे नूरजहां के गुट में फूट पड़ गई। 

5. नूरजहां से विवाह 

जहांगीर ने अपना आखिरी विवाह शेर अफगान की हत्‍या कर उसकी पत्‍नी से किया। जो दिखने में अति सुन्‍दर थी। इस विवाह से जहांगीर की राजनैतिक शक्ति और शासन नूरजहां के हाथ में चले गये तथा जहांगीर और अधिक शराबी बन गया। सम्‍पूर्ण साम्राज्‍य देा गुटों में बंट गया जिसके कारण हत्‍यायें, षडयन्‍त्र, विद्रोह और परस्‍पर युद्ध होने लगे। 1611 से 1622 में प्रथम गुट में नूरजहां , असमत बेगम माता और एतमाद्दुदौला पिता खुर्रम और भाई थे तथा खुसरो और उसके समर्थक नूरजहां गुट के विरोधी थे। 1622 ई. के पश्‍चात् नूरजहां विरोधी गुट में खुर्रम, नूरजहां का भाई, रहीम आदि थे नूरजहां के साथ शहरयार आदि थे। अब नूरजहां के कारण खुर्रम ने विद्रोह किया और दक्षिण से मलिक अम्‍बर से सहायता प्राप्‍तकी। इस प्रकार जहांगीर की उपस्थिति में इतनी बडी घटना घटी परन्‍तु उसने हस्‍तक्षेप नहीं किया। 

6. महावत खां 

सत्ता की राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता है। शाहजहां का विद्रोह समाप्‍त होते ही महावत खां का नूरजहां से विरोध शुरू हो गया। शाहजहां के विद्रोह को दबाने महावत खां को जो यश और प्रतिष्‍ठा मिली, वह नूरजहां की आंखो की किरकिरी बन गई। साथ ही शाहजादा परवेज और महावत खां की बढ़ती घनिष्‍ठता भी नूरजहां को खटकने लगी। 

उल्‍लेखनीय है कि जहांगीर के चार पुत्र थे-खुसरों, शाहजहां, परवेज और शहरयार। खुसरों को पहले ही मारा जा चुका था। शाहजहां के विद्रोह के समय परवेज और महावत खां की निकटता बढ़ी। हालांकि परवेज की सामान्‍य इमेज एक विलासी, शराबी और निकम्‍पे राजकुमार के रूप में थी, फिर भी नूरजहां को यह शंका थी कि परवेज को कठपुतली बनाकर महावत खां उसे सिहांसन तक पहुचा सकता है। ऐसा होने का अर्थ था नूरजहां के प्रभुत्‍व की समाप्ति। इस मामले में आसफ खां भी नूरजहां के साथ था। 

महावत खां की प्रतिष्‍ठा कम करने के लिए उस पर यह आरोप लगाया गया कि शाहजहां के विद्रोह के समय बंगाल से जो धन और हाथी उसने प्राप्‍त किए थे, वह सम्राट को नहीं भेजे एक गए है। महावत खां इन सभी आरोपों और अपमान का अर्थ समझता था। 

7. खुर्रम का विद्रोह 

खुर्रम उस समय विद्रोही बना जब नूरजहां ने शहरयार को सम्राट बनाने का निश्‍चय किया। सन्  1623 में खुर्रम अपनी सेना के साथ उत्तर की ओर गया और दिल्‍ली के निकट सम्राट और खुर्रम की सेनाओं में युद्ध हुआ। खुर्रम पराजित होकर मांडु पहुंचा ओर वहां से दक्षिण में मलिक अंबर के पास पहुंचा तथा उसकी सहायता से पुनः युद्ध के लिए आया परंतु पराजित हुआ। जहांगीर ने उसे क्षमा किया। इससे राज्‍य का विनाश हुआ। 

जहांगीर मृत्‍यु

शराब, अफीम और कामुकता के लोलूपपन के कारण 1627 ई. में जहांगीर की मृत्‍यु हो गई। इसके साथ ही उत्तराधिकारी का संघर्ष आंरभ हो गया। अफजल खां ने शहरयार को बंदी बनाकर अंधा कर दिया ओर खुर्रम शाहजहां के नाम से सम्राट बना। अतः नूरजहां ने राजनीति से सन्‍यास ले लिया और 1645 में उसकी मृत्‍यु हो गई।

जहांगीर का शासन 

जो प्रणाली अकबर के काल में स्‍थापित थी उसे प्रणाली से जहांगीर ने शासन संचालन किया। अतः सार्वजनिक रूप से जहांगीर शासन सहिष्‍णु, न्‍यायप्रिय, लोकहितवादी रहा। उसकी केन्‍द्रीय, प्रांतीय और राजस्‍व व्‍यवस्‍था में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। जहांगीर के शासन में शिक्षा, साहित्‍य विशेषकर चित्रकला का बहुत विकास हुआ। हिन्‍दी, फारसी आदि भाषाओं की भी उन्‍नति हुई। स्‍थापत्‍य में उसकी रूचि कम थी। 

निष्‍कर्ष 

जहांगीर के काल की घटनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि वह अकबर के समान किसी भी क्षेत्र में कुशल नहीं था। उसमें अनके दोष थे जिससे साम्राज्‍य में गृहयुद्ध हुए, विदेशों में असफलता मिली। फिर भी उसने मुगल साम्राज्‍य केा सुरक्षित रखा और शाहजहां को सौपां।

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