3/29/2021

उत्पाद विकास क्या है? परिभाषा, तत्व, सिद्धांत

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उत्पाद विकास क्या है? (utpad vikas ka arth)

utpad vikas arth paribhasha tatva siddhant;किसी उत्पाद के उत्पादन करने से पूर्व  सबसे पहले उस उत्पाद के बारे मे आवश्यक जानकारी प्राप्त करके उत्पाद नियोजन किया जाता है। उत्पाद के विकास से आशय उत्पाद के बारे मे यह पता लगाने से है कि उसका उत्पादन तांत्रिक एवं वाणिज्यीकरण के आधार पर हो सकता है अथवा नही अर्थात् उस उत्पाद का उत्पादन व्यावसायिक उपक्रम के लिए व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी है या नही। 

उत्पाद विकास की परिभाषा (utpad vikas ki paribhasha)

विलियम जे. स्टेन्टन के शब्दों मे," उत्पाद के संबंध मे अनुसंधान इंजीनियरिंग एवं डिजाइन से संबंधित क्रियाओं को करना ही उत्पाद विकास कहलाता है।" 

लिपसन एवं डालिंग के अनुसार," उत्पादन विकास के अंतर्गत सामान्यतः एक वर्ष की दी हुई अवधि मे उत्पाद पंक्ति मे नयी उत्पादें जोड़ी जाती है, चालू उत्पादें हटायी जाती है और संशोधित की जाती है।

संक्षेप मे यह यह कहा जा सकता है कि उत्पाद विकास से आशय उत्पाद पंक्ति मे नयी उत्पादों को जोड़ने चालू उत्पादों के आकार, डिजाइन, गुण, पैकिंग आदि मे सुधार करने एवं अलाभकारी उत्पादों के परित्याग से है।

उत्पाद विकास के मूल तत्व (utpad vikas ke tatva)

उत्पाद विकास के मूल तत्व इस प्रकार है--

1. उत्पाद के उत्पादन की व्यावसायिकता का पता लगाना

2. उत्पाद के गुण विकसित करना

3. उत्पाद के विभिन्न माॅडल अथवा डिजाइन बनाना, 

4. सर्वोत्तम माॅडल अथवा डिजाइन का चुनाव करना 

5. उत्पाद का पैकिंग निश्चित करना 

6. उत्पादो मे सुधार करना 

7. उत्पाद पंत्ति मे विस्तार अथवा संकुचन करना

8. अलाभकारी उत्पादों का परित्याग करना आदि।

उत्पाद विकास के सिद्धांत (utpad vikas ke siddhant)

उत्पाद विकास के तीन सिद्धांत प्रचलित है जिनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है--

1. प्रमापीकरण का सिद्धांत 

यह सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि उत्पादों के प्रमाण निश्चित होने चाहिए। ये प्रमाण उत्पादों के आकार, रंग-रूप किस्म, भौतिक एवं रासायनिक लक्षणों के रूप मे हो सकते है।

2. सरलीकरण का सिद्धांत 

यह सिद्धांत अनावश्यक उत्पाद भिन्नताओं, आकार-प्रकार, किस्म,डिजाइन आदि मे कमी, करने पर जोर देता है। इससे विपणन कार्यक्रमों को आसानी से क्रियान्वित किया जा सकता है, उत्पादन, भण्डारण एवं वितरण लागतों मे कमी होती है और उत्पाद का अप्रचलन देर से होता है। 

3. विशिष्टीकरण का सिद्धांत 

यह सिद्धांत उत्पाद विकास के क्षेत्र मे अनावश्यक उत्पाद विविधीकरण को समाप्त करने और विशिष्ट क्षेत्र मे नेतृत्व प्राप्त करने पर जोर देता है जिससे उपक्रम की कार्यकुशलता बढ़ती है, व्ययों मे मितव्ययिता होती है और ग्राहकों को अधिकतम सन्तुष्टि मिलती है।

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