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2/08/2021

प्रबंधकीय लेखांकन की सीमाएं

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प्रबंधकीय लेखांकन (लेखाविधि) की सीमाएं 

prabandhkiya lekhankan ki simaye;प्रबन्धकों के लिए लेखांकन यद्यपि प्रबंध के लिए वरदान की तरह है, लेकिन इसके बाद भी प्रबन्धकीय लेखांकन की कुछ सीमायें है। अगर इस विषय की इन सीमाओं को ध्यान मे न रखा जाये, तो इसके लाभ प्राप्त नही होगा। प्रबन्धकीय लेखांकन की प्रमुख सीमाएं निम्न प्रकार है--

1. प्रबंधकीय निर्णय विभिन्न लेखों पर आधारित 

प्रबन्धकीय लेखाकर्म मे प्रयुक्त अधिकांश सूचनाएं वित्तीय लेखाकर्म, लागत लेखाकर्म और अन्य प्रलेखों से एकत्र की जाती है।

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2. प्रशान एवं प्रबंध का प्रतिस्थापन नही 

प्रबन्धकीय लेखांकन प्रशासन एवं प्रबंध का प्रतिस्थापन नही है। यह तो प्रशासन एवं प्रबंध का एक यंत्र है। जो भी निर्णय लिए जाते है, वे सब प्रबन्धकों द्वारा लिए जाते है, प्रबंध लेखापाल द्वारा नही। प्रबंध लेखापाल का कार्य सिर्फ प्रबंधकों को सूचनायें देना है-- उसे मानने या न मानने का अधिकार प्रबंधक को होता है।

3. व्यक्तिगत निर्णय का प्रभाव 

प्रबन्धकीय लेखाकर्म द्वारा जो भी सूचनाएं दी जाती है उनमे मानव निर्णय का तत्व सम्मिलित होता है। सूचनाओं के संकलन से लेकर निर्वचन तक जिन व्यक्तियों की सेवाये ली जाती है, उनके व्यक्तिगत चरित्र, भावना और विचार का थोड़ा प्रभाव इन सूचनाओं पर अवश्य पड़ता है।

4. व्यय की तुलना मे कम उपयोगी 

अनेक विद्वानों का ऐसा मत है कि प्रबन्धकीय लेखाकर्म की व्यवस्था के लिए जो भी खर्च किया जाता है उससे प्राप्त होने वाले लाभ अपेक्षाकृत कम होते है।

5. समय तत्व का प्रभाव 

प्रबन्धकीय लेखांकन से जो सूचनायें प्राप्त होती है वे भूतकालीन होती है। जब किसी योजना के संबंध मे पूर्वानुमान किया जाता है तब वर्तमान परिस्थितियां बदल चुकी होती है। इससे प्रबन्धकीय लेखाकर्म का महत्व कम हो जाता है।

6. मनोवैज्ञानिक विरोध 

प्रबन्धकीय लेखांकन पद्धति अपनाने का अर्थ संस्था मे प्रबन्धकों द्वारा अनिवार्य रूप से सुव्यवस्थित कार्य-प्रणाली मे बुनियादी परिवर्तन लाना होता है।

संभव है इस बुनियादी परिवर्तन के प्रारंभ मे स्वयं कई प्रबंधकों द्वारा विरोध किया जाए।

7.  विकासशील व्यवस्था 

प्रबन्धकीय लेखाकर्म की तकनीकें अभी भी विकासशील अवस्था मे है। इसकी तकनीकों मे समय-समय पर बहुत अधिक तथा जल्दी-जल्दी परिवर्तन होते रहते है जिसके कारण इसकी तकनीकों को अपनाने मे अभी अनिश्चितताएं बनी हुई है।

8. पक्षपात की संभावना 

प्रबन्धकीय लेखांकन प्रबंध को जो सूचनायें दी जाती है वो व्यक्तिगत निर्णयों से प्रभावित रहती है। जो व्यक्ति सूचनाएं देता है या उनका विश्लेषण करता है, उसके चरित्र, विचार, भावनाओं आदि का प्रभाव सूचनाओं पर निश्चित रूप से पड़ता है। ऐसे मे पक्षपात तथा हेरफेर होनी की संभावनाएं बढ़ जाती है।

शायद यह जानकारी आपके लिए काफी उपयोगी सिद्ध होंगी

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