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2/25/2021

अनुबंध का अर्थ, परिभाषा, वैध अनुबंध के लक्षण

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अनुबंध का अर्थ (anubandh kya hai)

anubandh arth paribhasha lakshana;अनुबंध शब्द का सामान्य अर्थ है, दो या दो से अधिक व्यक्तियों का किसी ठहराव के लिये साथ मिलना। अनुबंध अंग्रेजी भाषा के "Contract" का हिन्दी रूपान्तरण है जिसकी उत्पति लेटिन भाषा के "Contractum" शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है साथ मिलाना या खींचना। इस प्रकार से किसी कार्य को करने या नही करने के लिये दो व्यक्तियों का मिलना या इस उद्देश्य से उनको खींचना अनुबंध कहलाता है। अनुबंध का और भी अच्छी तरह से सही अर्थ जानने के लिए विभिन्न विधि-ज्ञाताओं एवं विभिन्न न्यायाधीशों द्वारा समय-समय पर दी वाली परिभाषाओं पर दृष्टि जानना जरूरी है। 

अनुबंध की परिभाषा (anubandh ki paribhasha)

लीक के अनुसार," वैध अनुबंध के स्त्रोत के रूप मे ठहराव किसी एक पक्ष को कुछ कार्य करने हेतु बाधिक करता है, जबकि दूसरा उसे प्रवर्तनीय कराने के लिए वैधानिक अधिकार रखता है।"

सैलमण्ड के अनुसार," अनुबंध एक ऐसा ठहराव या समझौता है जो पक्षकारों के बीच दायित्व उत्पन्न करता है एवं उनकी व्याख्या करता है।"

सर फ्रेडरिक पोलक के अनुसार," राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होने वाला प्रत्येक ठहराव या वचन अनुबंध है।" 

सर विलियम एन्सन के अनुसार," अनुबंध दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच किया गया ऐसा समझौता होता है जिसको विधान के अंतर्गत प्रवर्तित कराया जा सकता एवं जिसके अंतर्गत एक या एक से अधिक पक्षकारों को दूसरे पक्षकार या पक्षकारों के विरूद्ध कुछ अधिकार प्राप्त हो जाते है।" 

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2 (H) मे अनुबंध को 'विधि द्वारा प्रवर्तनीय समझौता' बताया गया है।"

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम निष्कर्ष रूप मे यह कह सकते है कि," अनुबंध एक ऐसा ठहराव है जिसे विधि या राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय कराया जा सकता है तथा जो एक पक्षकार को दूसरे पक्षकार के विरूद्ध कुछ वैधानिक अधिकार उपलब्ध कराता है।" 

अनुबंध की शर्ते

ऊपर दी गई परिभाषाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अनुबंध मे निम्न तीन बातें या शर्तों का होना जरूरी है--

1. दो पक्षकार 

अनुबंध मे दो पक्षकारों का होना अनिवार्य है, पहला प्रस्ताव को रखने वाला और दूसरा पक्ष वह जो इसे स्वीकार करेंगा। एक पक्षकार कोई भी अनुबंध नही कर सकता इसलिए अनुबंध मे दो पक्षकारों का होना अनिवार्य है।

2. समझौता या ठहराव 

बिना समझौते के अनुबंध नही हो सकता इसलिए दोनों पक्षकारों के बीच कार्य को करने या नही करने के लिए समझौता होना जरूरी है। 

3. वैधानिक दायित्व 

अनुबंध के अंतर्गत जो भी समझौता हो वह वैधानिक होना चाहिए। नैतिक, सामाजिक या राजनैतिक समझौते किए गए है तो ऐसे ठहराव अनुबंध नही नही सकते है, क्योंकि पक्षकारों के बीच समझौते से वैधानिक दायित्व का सृजन होना चाहिए जिसे न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय कराया जा सके।

वैध अनुबंध के आवश्यक लक्षण/विशेषताएं (प्रकृति) 

धारा 2 (H) तथा धारा 10 के विश्लेषण के आधार पर एक वैध अनुबंध होने के लिए नीचे दिए गए  लक्षणों का होना अनिवार्य होता है। इन लक्षणों के आधार पर ही इसकी प्रकृति को समझा जा सकता है। यदि किसी ठहराव मे इन लक्षणों मे से किसी का भी अभाव होगा, तो वह एक वैध अनुबंध नही होगा।

1. ठहराव, प्रस्ताव तथा स्वीकृति 

इसका विवरण इस प्रकार है--

(अ) ठहराव

वैध अनुबंध के लिए सबसे पहला जरूरी लक्षण पक्षकारों के बीच ठहराव होना चाहिए। ठहराव, प्रस्ताव एवं स्वीकृति से मिलकर बनता है।

(ब) प्रस्ताव 

धारा 2 (A) के अनुसार, जब एक व्यक्ति किसी जरूरी दूसरे व्यक्ति से किसी कार्य को करने या न करने के विषय मे अपनी इच्छा इस उद्देश्य से प्रकट करता है कि उस व्यक्ति की सममति उस कार्य को करने या न करने के विषय मे प्राप्त हो, तो कहेंगे कि एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति के सामने प्रस्ताव रखा।' जो व्यक्ति प्रस्ताव रखता है उसे "वचनदाता" तथा जिसके सम्मुख प्रस्ताव रखा जाता है उसे "वचनगृहीता" कहते है।

(स) स्वीकृति 

धारा 2 (B) के अनुसार, जब किसी व्यक्ति के सामने प्रस्ताव रखा जाए व वह उस पर अपनी सहमति प्रकट कर देता है, तो कहेंगे कि प्रस्ताव "स्वीकार" कर लिया गया।

2. पक्षकारों मे अनुबंध करने की क्षमता 

धारा 11 के अनुसार अनुबंध करने की क्षमता से तात्पर्य उन व्यक्तियों से है जो अनुबंध करने की योग्यता रखते है, अतः अनुबंध करने के योग्य व्यक्ति मे निम्न तीनों गुणों का होना आवश्यक है--

1. उसे राजनियम के अनुसार "वयस्क" होना चाहिए।

2. उसे "स्वस्थ मस्तिष्क" का होना चाहिए।

3. उसे अन्य राजनियम द्वारा "अनुबंध करने के अयोग्य" घोषित न किया गया है। प्रायः विदेशी शत्रु, राजदूत अनुबंध नही कर सकते।

3. पक्षकारों की स्वतंत्र सहमति 

धारा 13 के अनुसार, दो या दो से ज्यादा व्यक्तियों की सहमति उस समय होती है जब वे एक ही बात पर एक ही भाव से सहमत होते है। सहमति स्वतंत्र उसी दशा मे कही जाती है जबकि वह निम्न तत्वों मे से किसी के कारण दी नही गई हो--

1. उत्पीड़न (धारा-15) 

2. अनुचित प्रभाव (धारा-16)

3. कपट (धारा-17) 

4. मिथ्यावर्णन (धारा-18) 

5. गलती (धारा-21) 

4. न्यायोचित प्रतिफल  

कुछ विशिष्ट परिस्थितियों को छोड़कर ठहराव को वैध अनुबंध का रूप देने के लिये न्यायोचित प्रतिफल का होना आवश्यक है। प्रतिफल वैध तथा वास्तविक होना चाहिए। लेकिन यह जरूरी नही है कि प्रतिफल नगद अथवा वस्तु के रूप मे ही हो। प्रतिफल कार्य अथवा किसी कार्य से अलग रहने के वचन के रूप मे भी हो सकता है। निम्न दशाओं को छोड़कर  अन्य दशाओं मे प्रतिफल न्यायोचित माना जाता है--

1. जब वह राजनियम द्वारा वर्जित हो, अथवा 

2. जब वह इस प्रकार का हो कि यदि अनुमति दे दी जाय तो वह किसी राजनियम की अवस्थाओं को निष्फल कर देगा, अथवा

3. जब वह कपटमय हो, अथवा

4. यदि उससे किसी अन्य व्यक्ति के शरीर या संपत्ति को हानि पहुंचती है।

5. यदि न्यायालय उसे अनैतिक एवं लोकमत के विरूद्ध समझता है।

5. न्यायोचित उद्देश्य का होना 

ठहराव का उद्देश्य न्यायोचित होना चाहिए अर्थात् अवैधानिक, किसी लेखबद्ध अधिनियम के आदेश के विरूद्ध अथवा लोकनीति के विरूद्ध नही होना चाहिए।

6. स्पष्ट रूप से व्यर्थ घोषित ठहराव 

वैध अनुबंध होने हेतु जरूरी है कि राजनियम द्वारा व्यर्थ घोषित नही हो। भारतीय अनुबंध अधिनियम के अनुसार निम्न ठहराव स्पष्ट रूप से व्यर्थ घोषित है--

1. अनुबंध करने के अयोग्य पक्षकारों द्वारा किया गया अनुबंध (धारा-11) 

2. दोनों पक्षकारों की गलती के आधार पर किया गया ठहराव (धारा-20) 

3. विवाह मे रूकावट डालने वाले ठहराव (धारा-26) 

4. व्यापार मे रूकावट डालने वाले ठहराव (धारा-27) 

5. वैधानिक कार्यवाही मे रूकावट डालने वाला ठहराव (धारा-28) 

6. ठहराव जिसमे अनिश्चितता है (धारा-29) 

7. बाजी लगाने के रूप मे किये गये ठहराव (धारा-30) 

8. असंभव कार्य करने के ठहराव (धारा-56) 

7. ठहराव का लिखित एवं रजिस्टर्ड होना 

किसी अनुबंध के वैध होने हेतु अंतिम जरूरी लक्षण यह है कि वह लिखित एवं साक्षी द्वारा प्रमाणित और रजिस्टर्ड हो, अगर भारत मे प्रचलित किसी विशेष अधिनियम द्वारा ऐसा होना अनिवार्य हो। जैसे, "ट्रांसफर ऑफ प्रापर्टी एक्ट" के अनुसार अचल संपत्ति के कुछ निश्चित मूल्य से ज्यादा के विक्रय अनुबंधों का लिखित तथा रजिस्टर्ड होना आवश्यक है।

8. वैधानिक औपचारिकताओं का पालन 

यदि किसी अनुबंध को न्यायालय मे प्रवर्तनीय कराने के लिये कुछ वैधानिक औपचारिकताओं का पूरा करना जरूरी हो तो इन्हें पूरा करना जरूरी होता है, जैसे ठहराव का लिखित एवं प्रमाणित होना, संबंधित नियमों की स्वीकृति प्राप्त करना इत्यादि।

9. ठहराव का निश्चित तथा संभव होना 

किया गया ठहराव किसी भी तरह से अनिश्चितत या अस्थिर नही होना चाहिए, यह पूरी तरह से निश्चित और स्पष्ट होना चाहिए। दूसरे, अनुबंध ऐसा भी नही होना चाहिए कि उसे करना या निष्पादन करना मुमकिन ही न हो, उदाहरण के लिये एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका से भावावेश मे आ कर यह कह दिया कि," मैं तेरे लिए आसमान से चांद तारें तोड़ लाऊंगा" अब प्रेमिका ने यह शर्त रख दी कि तुम मेरे लिये चांद तारे तोड़कर ला दो, और शादी कर लो। चांद तारे तोड़कर लाना असंभव है, अतः यह व्यर्थ है।

यह भी पढ़ें; अनुबंध और ठहराव मे अंतर

शायद यह आपके लिए काफी उपयोगी जानकारी सिद्ध होगी

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