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2/26/2021

स्वीकृति क्या है? वैधानिक नियम

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स्वीकृति का अर्थ (swikriti kya hai)

swikriti arth paribhasha niyam;साधारण शब्दों मे स्वीकृति किसी कार्य को करने के लिए सहमति को कहा जाता है। एक वैध ठहराव के लिए प्रस्ताव के साथ ही उसकी स्वीकृति भी जरूरी होती है। वह पक्षकार जिसके सामने प्रस्ताव रखा जाता है यदि वह उस पर मौखिक या लिखित सहमति प्रकट कर देता है तो यह मान लिया जाता है कि उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस प्रकार पक्षकारों के बीच एक ठहराव का जन्म हो जाता है। 

सर विलियम एन्सन ने कहा है कि," एक प्रस्ताव के लिए स्वीकृत का वही मतलब होता है, जो बारूद से भारी रेलगाड़ी के लिए एक जलती दियासलाई का।" जिस प्रकार जलती हुई दियासलाई बारूद से भारी रेलगाड़ी के संपर्क मे आते ही विस्फोट उत्पन्न कर देती है उसी तरह प्रस्ताव स्वीकृत होते ही वह ठहराव बन जाता है। 

भारतीय अनुबंध अधिनियम मे स्वीकृति शब्द को परिभाषित तो नही किया गया है लेकिन इसके अभिप्राय को जरूर स्पष्ट किया गया है। धारा 2 (B) के अनुसार," जब वह व्यक्ति जिसके सामने प्रस्ताव रखा जाता है, उस पर अपनी सहमति प्रकट कर देता है तो कहेंगे कि प्रस्ताव "स्वीकार" कर लिया गया है।" 

इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वीकृति से अभिप्राय किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के प्रस्ताव पर अपनी सहमति प्रकट करना है। अतः प्रस्ताव पर स्वीकारक की सहमति को "स्वीकृति" कहा जाता है।

स्वीकृति कौन दे सकता है? 

स्वीकृति केवल उसी व्यक्ति के द्वारा दी जा सकती है जिसके सामने प्रस्ताव किया गया हो। परन्तु, जब प्रस्ताव पूरी दुनिया को खुले प्रस्ताव के रूप मे किया गया हो तो प्रस्ताव की जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति प्रस्ताव को स्पष्ट अथवा गर्भित रूप से स्वीकार कर सकता है। प्रस्ताव की जानकारी बिना उसके लिये दी गई स्वीकृति के कारण ही किसी प्रकार से वैधानिक अनुबंध की स्थापना नही हो सकती।

स्वीकृति से संबंधित वैधानिक नियम 

स्वीकृति से संबंधित वैधानिक नियम इस प्रकार है--

1. पूर्ण तथा शर्त रहित 

स्वीकृति के संबंध मे वैधानिक अनिवार्यता है कि स्वीकृति पूर्ण तथा शर्त रहित होना चाहिए। शर्त सहित स्वीकृति एक प्रकार से प्रति प्रस्ताव होता है और उस समय तक लागू नही होता जब तक कि प्रस्तावक द्वारा शर्त की स्वीकृति नही दी जाती।

2. स्वीकृति प्रदान करने के योग्य व्यक्ति 

प्रस्ताव को स्वीकृति करने का अधिकार केवल उसी व्यक्ति को है जिसके सामने प्रस्ताव रखा गया है अन्य किसी व्यक्ति की स्वीकृति वैध नही होती। 

3. स्वीकृति प्रस्तावक द्वारा निश्चित किये हुए ढंग से होनी चाहिए 

स्वीकृति सामान्यता उचित ढंग से होनी चाहिए। यदि प्रस्तावक स्वीकृति किसी "नियत विधि" के अनुसार चाहता है तो उसकी स्वीकृति उसी नियत विधि के अनुसार होनी चाहिए।

4. स्पष्ट अथवा गर्भित स्वीकृति 

स्वीकृति स्पष्ट तभी कही जायेगी जब लिखित या मौखिक हो। जब इसके अतिरिक्त किसी अन्य ढंग से स्वीकृत को प्रकट किया जाये, तो यह गर्भित स्वीकृति कहलायेगी। गर्भित स्वीकृति मे स्वीकारक अपने व्यवहार से स्वीकृति देता है। 

5. स्वीकृति आचरण द्वारा भी हो सकती है

इस संबंध मे महत्वपूर्ण है कि केवल मानसिक स्वीकृति, जिसकी शब्दों या आचरण से पुष्टि न हो, सन्नियम की दृष्टि से स्वीकृत नही हो सकती। किसी प्रस्ताव पर मौन धारण करना स्वीकृति नही है क्योंकि मौन का अर्थ स्थिति या अस्वीकृति दोनों हो सकता है।

6. स्वीकृति का संवहन जरूर होना चाहिए 

वैध स्वीकृति के लिए जरूरी है कि प्रस्तावक के पास स्वीकृति की सूचना अवश्य पहुंच जानी चाहिए। स्वीकृत का संवहन स्वीकारक के विरूद्ध उस समय पूर्ण समझा जाता है जबकि उसका ज्ञान प्रस्तावक को हो जाता है। केवल मन मे स्वीकृति का निश्चय करना पर्याप्त नही है, उसको प्रकट करना जरूरी है।

7. प्रस्ताव की जानकारी के बिना स्वीकृति देने का कोई महत्व नही है

स्वीकारक को प्रस्ताव का ज्ञान होना आवश्यक है। यदि कोई कार्य प्रस्ताव की जानकारी के अभाव मे किया गया हो तो वह उस प्रस्ताव की स्वीकृति नही मानी जायेगी।

8. शर्तों का पालन एवं प्रतिफल पाने पर स्वीकृति 

यदि कोई स्वीकारक प्रस्ताव की शर्तों को पूरा करता है अथवा पारस्परिक वचन के लिए प्रस्ताव के साथ प्रस्तुत किये गये प्रतिफल को स्वीकार करता है तो यह प्रस्ताव स्वीकृत माना जाता है। 

8. शर्तों का पालन एवं प्रतिफल पाने पर स्वीकृति 

यदि कोई स्वीकारक प्रस्ताव की शर्तों को पूरा करता है अथवा पारस्परिक वचन के लिए प्रस्ताव के साथ प्रस्तुत किये गये प्रतिफल को स्वीकार करता है तो यह प्रस्ताव स्वीकृत माना जाता है।

9. अस्वीकृति प्रस्ताव की स्वीकृति 

यदि कोई प्रस्ताव एक बार अस्वीकृति कर दिया गया हो तो उस प्रस्ताव की स्वीकृति उस समय नही की जा सकती जब तक कि प्रस्तावक द्वारा उस प्रस्ताव को पुनः प्रस्ताव के रूप मे प्रस्तुत नही कर दिया जाता।

10. प्रस्ताव की स्वीकृति, प्रस्ताव का अंत या खंडन होने के पहले होनी चाहिए 

प्रस्ताव की स्वीकृति प्रस्ताव का खंडन होने से पूर्व हो जानी चाहिए। किसी प्रस्ताव का अंत होने या खंडन हो जाने पर उसकी वैध स्वीकृति नही हो सकती है।

शायद यह आपके लिए काफी उपयोगी जानकारी सिद्ध होगी

1 टिप्पणी:
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  1. Dhara _2 B Is Like When A Underground Water River A Jamuna , Want To His Wild Cat like Varsha Ka JAL Then We Should Know The Language Of Real Truth Like Jamnagar Gaya Paani Peene Panji Ki Dukaan Se...♥️

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