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2/25/2021

ठहराव का अर्थ, परिभाषा, प्रकार

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ठहराव का अर्थ (thahrav kya hai)

thahrav arth paribhasha prakar;भारतीय अनुबंध अधिनियम के अनुसार, प्रत्येक वचन और वचनों का प्रत्येक समूह जो एक-दूसरे के लिए प्रतिफल हो, ठहराव कहलाता है।

जब दो मस्तिष्कों का किसी सामान्य उद्देश्य के लिए मिलन होता है उस समय ठहराव होता है अर्थात् जब दो व्यक्ति एक ही बात या अर्थ से सहमत होते है तब ठहराव का निर्माण होता है। 

दूसरे शब्दों मे कहे तो," जब एक पक्षकार दूसरे पक्षकार के समाने किसी प्रस्ताव को प्रस्तुत करता है और दूसरा पक्षकार उसे स्वीकार कर लेता है, तो इसे ठहराव कहते है। 

ठहराव की परिभाषा (thahrav ki paribhasha)

चैरी के अनुसार," एक प्रस्ताव जब उचित रूप से स्वीकृत हो जाता है, तो ठहराव कहलाता है।" 

चेट्टी के अनुसार," एक स्वीकृत प्रस्ताव ठहराव का निर्माण करता है।" 

लीक के अनुसार," ठहराव से अभिप्राय ऐसे दो व्यक्तियों के बीच सहमति से है, जो किसी निश्चित किये गये विषय पर एकमत हो।" 

पोलक के अनुसार," ठहराव एक या एक से अधिक पक्षकारों के द्वारा, अन्य पक्षकार या पक्षकारों के लिये किये जाने वाले किसी कार्य को करने का गहन चिंतन है।" 

ठहराव के लक्षण 

ठहराव के लक्षण इस प्रकार है--

1. ठहराव के लिए कम-से-कम दो पक्षकारों का होना जरूरी होता है। क्योंकि एक व्यक्ति स्वयं के साथ किसी भी प्रकार का ठहराव नही कर सकता है।

2. दोनों पक्षकारों का एक बात पर एक ही रूप मे सहमत होना जरूरी है, अगर ऐसा न हो तो उनके बीच कोई ठहराव नही होगा। पक्षकारों मे मानसिक एकात्मता का होना जरूरी है।

3. ठहराव के लिए यह जरूरी है कि पक्षकारों का उद्देश्य आपस मे वैधानिक दायित्वों को उत्पन्न करना होना चाहिए।

4. पक्षकार अपना अभिप्राय एक-दूसरे को स्पष्ट करें। 

5. ठहराव मे संबंधित संबंधित पक्षकार ही आपस मे प्रभावित होने चाहिए कोई और अन्य पक्ष नही।

ठहराव के प्रकार (thahrav ke prakar)

ठहराव के प्रकार निम्नलिखित है--

(A) प्रवर्तनीयता के आधार पर 

1. ठहराव: अनुबंध के रूप मे 

प्रत्येक ऐसा ठहराव जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होता है, अनुबंध कहलाता है। इसके लिए वैध अनुबंध का होना जरूरी है।

2. व्यर्थ ठहराव 

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धार 2 (9) के अनुसार," वह ठहराव जो कि राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय नही किये जा सकते है, व्युर्थ ठहराव कहलाते है।

(B) वैधानिक ठहराव 

1. वैध ठहराव 

ठहराव जिसे वैधानिक रूप मे कार्यन्वित किया जा सकता है, वैधानिक ठहराव कहलाता है। यह वह ठहराव होता है, जिसमे एक वैध ठहराव के सभी लक्षण विद्यमान होते है।

2. अवैध ठहराव

यू. वी. देसाई के अनुसार," एक अवैध ठहराव वह है, जिसमे समस्त समानांतर ठहराव भी व्यर्थ होते है।" समस्त अवैध ठहराव आवश्यक रूप मे व्यर्थ होते है।

(C) निर्णाण की विधि के आधार पर 

1. स्पष्ट ठहराव 

जब ठहराव करने के उद्देश्य से एक पक्षकार दूसरे पक्षकार के सामने स्पष्ट रूप मे प्रस्ताव प्रस्तुत करता है और दूसरा पक्षकार स्पष्ट रूप मे प्रस्तुत प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति प्रदान करता है तो उसे स्पष्ट ठहराव का निर्माण कहते है। स्पष्ट ठहराव लिखित अथवा मौखिक हो सकता है।

2. गर्भित ठहराव 

गर्भित ठहराव मे पक्षकार ठहराव को लिखित अथवा मौखिक रूप से प्रस्तुत नही करते है, बल्कि ठहराव की शर्ते, पक्षकार के विचार करने के ढंग, व्यापारिक रीति-रिवाज एवं परिस्थितियों आदि को भी ध्यान मे रखना पड़ता है।

(D) निष्पादन के आधार पर ठहराव 

1. निष्पादित ठहराव 

जब ठहराव के सभी पक्षकार अपने-अपने दायित्वों को पूरा कर चुके होते है और इसके बाद उन्हें कुछ भी करना शेष नही है तो यह निष्पादित ठहराव कहलाता है।

2. निष्पादकीय ठहराव 

जब ठहराव के एक पक्षकार अथवा दोनों पक्षकारों ने अपने-अपने दायित्वों का निर्वाह पूरी तरह नही किया हो तथा वह भविष्य मे अपना दायित्व पूरा करेंगे तो इसे निष्पादकीय ठहराव कहेंगे।

(E) परिपूर्ण के आधार पर 

1. प्रवर्तनीय ठहराव 

प्रवर्तनीय ठहराव वह ठहराव है, जिसमे किसी भी प्रकार की कोई कमी नही पाई जाती है। अर्थात् यह ठहराव राजनियम द्वारा अनुबंध की तरह प्रवर्तनीय कराये जा सकते है। इसमे एक वैध अनुबंध के सभी लक्षण होते है।

2. अप्रवर्तनीय ठहराव 

अप्रवर्तनीय ठहराव वे ठहराव होते है, जो ऐसे अधिकारों और दायित्वों की सृष्टि करते है, जिन्हे राजनियम तो मान्यता देता है, किन्तु कुछ तकनीकी दोषों के कारण वे न्यायालय द्वारा लागू नही हो सकते है।

शायद यह आपके लिए काफी उपयोगी जानकारी सिद्ध होगी

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