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2/26/2021

प्रस्ताव का अर्थ, लक्षण, वैधानिक नियम

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प्रस्ताव का अर्थ (prastav kya hai)

prastav arth paribhasha lakshana niyam;प्रत्येक वैध अनुबंध के लिए जरूरी है कि एक पक्ष प्रस्ताव करते तथा दूसरा पक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार करे। प्रस्ताव के बिना अनुबंध हो ही नही सकता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम मे प्रस्ताव के लिए proposal शब्द का प्रयोग किया गया है वही अंग्रेजी राजनियम मे इसके लिए offer शब्द का प्रयोग किया गया है। 

चेट्टी के अनुसार," प्रस्ताव किसी कार्य को करने या नही करने का वचन है।" 

पोलक के अनुसार," किसी व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से व्यक्त की गई शर्तों के आधार पर, किसी ठहराव का पक्षकार बनाने की इच्छा को व्यक्त करना "प्रस्ताव" कहलाता है।"

भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 2 (a) के अनुसार," जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से किसी कार्य को करने या न करने के विषयों मे अपनी इच्छा इस उद्देश्य से प्रकट करता है कि दूसरे व्यक्ति द्वारा उस कार्य को करने या न करने के लिए सहमति प्राप्त हो तो कहेंगे कि पहले व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति के सामने प्रस्ताव रखा।" 

उदाहरण के लिए राकेश, मुकेश से कहता है कि क्या वह उसकी मोटरसाइकिल दस हजार रूपये मे खरीदना चाहता है, यहां राकेश मुकेश से प्रस्ताव कर रहा है। जो व्यक्ति प्रस्ताव रखता है उसे प्रस्तावक या वचनदाता कहते है तथा जिस व्यक्ति के सामने प्रस्ताव रखा जाता है उसे स्वीकर्ता या वचनगृहीता कहते है।

प्रस्ताव के आवश्यक लक्षण 

प्रस्ताव के आवश्यक लक्षण इस प्रकार है--

1. दो पक्षकारों का होना 

प्रस्ताव के लिए कम-से-कम दो पक्षकारों का होना अनिवार्य है ताकि एक पक्षकार दूसरे पक्षकार के सम्मुख अपनी इच्छा प्रकट कर सके। प्रस्ताव सदैव किसी दूसरे पक्षकार को किया जाता है-- स्वयं को नही। कोई भी व्यक्ति स्वयं प्रस्तावक एवं स्वीकर्ता नही हो सकता। अतः प्रस्ताव के लिए दो पक्षकारों का होना अनिवार्य है।

2. वैधानिक संबंध स्थापित करना 

प्रस्ताव तभी वैध होता है जब प्रस्ताव वैधानिक संबंध स्थापित करने के उद्देश्य या भावना से किया गया हो। 

3. प्रस्ताव किसी कार्य को करने के संबंध मे हो सकता है

प्रस्ताव किसी कार्य को करने के संबंध मे हो सकता है। अतः इस दशा मे एक पक्षकार दूसरे पक्षकार के सामने किसी कार्य को करने का प्रस्ताव रख सकता है। उदाहरण के लिए राकेश अपना 2.50 लाख रूपये मे मुकेश को बेचने का प्रस्ताव करता है। यहाँ मुकेश किसी कार्य को करने का प्रस्ताव करता है। 

4. प्रस्ताव किसी कार्य को न करने के संबंध मे भी हो सकता है

ऐसा जरूरी नही है कि प्रस्ताव किसी कार्य को करने के लिए ही किया जाए, अपितु प्रस्ताव किसी कार्य को न करने के विषय मे भी हो सकता है।  

5. प्रस्ताव का उद्देश्य दूसरे व्यक्ति की सहमति प्राप्त करना होता है

यह प्रस्ताव की आधारभूत विशेषता है क्योंकि सहमति प्राप्त न करनी हो तो प्रस्ताव का कोई औचित्य ही नही रहता है।

6. प्रस्ताव का संवहन 

प्रस्ताव किया हुआ तभी माना जाता है जबकि उसका संवहन हो गया हो। प्रस्ताव के संवहन का तात्पर्य प्रस्ताव की जानकारी उस व्यक्ति को होने से है जिसको प्रस्ताव किया गया हो।

प्रस्ताव संबंधी वैधानिक नियम 

प्रस्ताव से संबंधित वैधानिक नियम इस प्रकार है--

1. प्रस्ताव वैधानिक संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए 

प्रस्ताव से पक्षकारों के बीच वैधानिक संबंध स्थापित होने चाहिए। सामाजिक ठहराव वैधानिक संबंध पैदा नही करते, जैसे-- घूमने जाने, भीजन करने, साथ-साथ पढ़ने, सिनेमा जाने के ठहराव से वैधानिक संबंधो का बोध नही होता। 

2. प्रस्ताव की शर्ते निश्चित होनी चाहिए 

प्रस्ताव की सभी शर्ते सुनिश्चित होनी चाहिए, अनिश्चित, असंगत अथवा भ्रमात्मक नही। जैसे-- राकेश के मुकेश के सामने अपनी भैस बेचने हेतु यह प्रस्ताव रखा है कि अगर उसकी भैसा को बच्चा होगा ताभी वह अपनी भैस बेचेगा। यह प्रस्ताव निश्चित नही है। 

3. प्रस्ताव का संवहन आवश्यक है 

जिस व्यक्ति के लिए प्रस्ताव किया गया है उसके सामने वह जरूर पहुंच जाना चाहिए, जिससे कि वह प्रस्ताव के विषय मे पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सके और उसे स्वीकार कर सके तभी वह एक ठहराव हो सकेगा। स्वीकृत के अभाव मे कोई भी प्रस्ताव ठहराव नही हो सकता और ठहराव के लिए प्रस्ताव स्वीकारकर्ता के सामने पहुंचना जरूरी होता है।

4. प्रस्ताव विनय के रूप मे होना चाहिए

प्रस्ताव हमेशा विनय के रूप मे होना चाहिए ना कि आज्ञा के रूप मे होना चाहिए। प्रस्तावक प्रस्ताव की स्वीकार करने हेतु कोई शर्त निश्चित कर सकता है पर अस्वीकार करने को नही। अर्थात प्रस्तावक ऐसा नही कह सकेगा कि निश्चित समय के अंदर स्वीकृति नही आई तो प्रस्ताव स्वीकृत समझा जाएगा।

5. प्रस्ताव स्पष्ट अथवा गर्भित हो सकता है 

प्रस्ताव स्पष्ट अथवा गर्भित हो सकता है। लिखित या मौखिक शब्दों द्वारा व्यक्त किये गये प्रस्ताव को स्पष्ट प्रस्ताव कहते है। आचरण द्वारा किये गये प्रस्ताव को गर्भित या विवक्षित प्रस्ताव कहते है।

6. विशेष शर्तों की सूचना स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए 

यदि प्रस्ताव मे कुछ विशेष शर्ते जुड़ी हुई है तो उन विशेष शर्तों को वचनगृहीता के सामने रखना जरूरी है। जिससे कि वह उन विशेष शर्तों के विषय मे जानकारी रख सके।

7. प्रस्ताव सामान्य या विशेष हो सकता है 

जब कोई प्रस्ताव किसी निश्चित व्यक्ति के सामने किया जाता है तो वह विशेष प्रस्ताव कहलाता है एवं जब कोई प्रस्ताव सामान्य जनता अथवा अनिश्चित व्यक्तियों के समूह के सामने होता है तो वह सामान्य प्रस्ताव कहलाता है।

प्रस्ताव के लिए आमंत्रण 

जब प्रस्ताव किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं पेश न किया जाये तथा किसी अन्य व्यक्ति को निमंत्रण दिया जाए कि वह प्रस्ताव रखे तो यह प्रस्ताव रखने हेतु आमंत्रण होगा। "प्रस्ताव" के लिए आमंत्रण की दशा मे जो व्यक्ति आमंत्रण देता है वह "स्वीकृति" देने वाला होता है एवं जिस व्यक्ति को आमंत्रित किया गया है वह प्रस्तावक होता है। साधारणतया प्रस्ताव हेतु आमंत्रण सर्वसाधारण के लिए खुला रहता है, जो भी चाहे वह प्रस्ताव रख सकता है। पर यह अनुबंध का रूप तभी लेगा जब इसकी स्वीकृति दे दी जाए। 

प्रस्ताव और आमंत्रण मे अंतर 

प्रस्ताव और आमंत्रण मे अंतर इस प्रकार है--

1. प्रस्ताव से तात्पर्य प्रस्तावक द्वारा किसी कार्य को करने या न करने के संबंध मे अपनी इच्छा प्रकट किये जाने से है जिसे स्वीकार कर लेने पर वह बाध्य हो जाता है। जब प्रस्ताव किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं पेश न किया जाये तथा किसी अन्य व्यक्ति को निमंत्रण दिया जाए कि वह प्रस्ताव रखे तो यह प्रस्ताव रखने हेतु आमंत्रण होगा।

2. प्रस्ताव के लिए आमंत्रण मे ठहराव की क्षमता नही होती पर प्रस्ताव ठहराव का रूप ले सकता है।

3. प्रस्ताव हेतु आमंत्रण पक्षकार पर दायित्व पैदा नही करता जबकि प्रस्ताव स्वीकृति मिलते ही दायित्व पैदा हो जाता है।

शायद यह आपके लिए काफी उपयोगी जानकारी सिद्ध होगी

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