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12/24/2020

उपभोक्ता व्यवहार का महत्व, घटक

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उपभोक्‍ता व्‍यवहार का महत्‍व (upbhokta vyavhar ka mahatva)

प्राचीन समय में यह मान्‍यता थी कि उपभोक्‍ता एक इच्‍छाशून्‍य व्‍यक्ति है। जिसको कुछ भी वस्‍तु कि‍सी  भी मूल्‍य पर बेच दी जाती थी। उस समय का बाजार विक्रता बाजार था। उत्‍पादक जो भी वस्‍तु बनाता था अनन-फनन में बिक जाती थी पहले वस्‍तुओं का अभाव था। कन्तिु आज परिस्थिति बिल्‍कुल अलग है अब विक्रेता/उत्‍पादक  को अपनी वस्‍तु बाजार में विक्रय के लिए प्रस्‍तुत करने से पहले  उपभोक्‍ता/क्रेता  के व्‍यवहार का अध्‍ययन करना पड़ता है।इसका कारण यह भी है की अब क्रेता का बाजार है विक्रता वही वस्‍तु विक्रय के लिए प्रस्‍तुत  करेगा जो क्रेता को पसंद होगी। इसी प्रकार विक्रता भी वही वस्‍तु अपनी दुकान पर रखेगा जिन्‍हे उपभोक्‍ता खरीद सके। कोई वस्‍तु जितनी अधि‍क उपभोक्‍ता को पसंद होगी वह वस्‍तु उतनी अधिक बिकेगी। वस्‍तु जितनी ज्‍लदी बिकेगी विक्रेता को उतना ही अधिक लाभ प्राप्‍त होगा। 

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उपभोक्‍ता व्‍यवहार का महत्‍व इस प्रकार से है--

1. मूल्‍य नीतियां

मूल्‍य संबंधी नीतियां और निर्णय भी उपभोक्‍ता व्‍यवहार से प्रभावित होते है। यदि उपभोक्‍ता  वि‍वेकीय क्रय प्रेरणाओं से प्रभावित होकर वस्‍तुएं खरीदता है तब अवश्‍य ही उन वस्‍तुओं  का मूल्‍य उचि‍त रखना चाहिए किन्‍तु भावात्‍मक प्रेरणा से खरीदी जाने वाली वस्‍तुओं का मूल्‍य अधिक रखा जाना चाहिए।

2. विक्रय प्रवर्तन सम्‍बन्‍धी नीतियां 

वस्‍तु के विक्रय वृद्धि के लिए विक्रय प्रवर्तन नीति उपभोक्‍ताओं के क्रय व्‍यवहार से कुछ सीमा तक प्रभावित होते है और इस प्रकार क्रेता व्‍यवहार के अध्‍ययन के बिना विक्रय संवर्द्धन के प्रयास सफल नही हो सकते है क्‍यों‍कि‍ वस्‍तु कौन खरीद रहा है? किसके द्वारा वस्‍तु खरीदी जा रही है? कहां से खरीद रहा है? और कैसे खरीद रहा है? आदि बातें विक्रय प्रवर्तन व प्रचार के कार्यक्रमों को प्रभावित करती है।

3. उत्‍पादन में विविधता 

इसके के अन्‍तर्गत उपभोक्‍ता व्‍यवहार का ज्ञान होना अतिअवश्‍यक है यदि उपभोक्‍ता उत्‍पाद के कि‍सी विशेष गुण जैसे आकार, शैली से प्रभावित होकर उसे क्रय करता है तब निर्माता को उस आकार का गुण या शैली का अपने उत्‍पाद में समावेश करना ही चाहिए। इस से यह स्‍पष्‍ट होता है कि‍ उपभोक्‍ता व्‍यवहार उत्‍पादन विविधता में अपना महत्‍वपूर्ण प्रभाव डालता है।

4. वितरण स्‍त्रोतों सम्‍बन्‍धी नीतियां

इसके निर्धारण के लिए उपभोक्‍ता व्‍यवहार का अध्‍ययन अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है यदि कोई वस्‍तु कम कीमत पर खरीदी जा रही हो तो उस वस्‍तु की विपणन प्रक्रिया भी सरल व सुविधाजानक होना चाहिए जैसे रोज उपयोग में लई जाने वाली वस्‍तुएं शक्‍कर, तेल व चाय आदि। यदि कि‍सी कारण वस वस्‍तुएं विक्रय के बाद अच्‍छी सेवा की गारण्‍टी के आधार पर खरीदी जाती है। तो ऐसी  उत्‍पाद के निर्माता को अपने वितरण स्‍त्रोत भी इसी प्रकार से चुनने होंगे जो उपभोक्‍ता को विक्रय के बाद अच्‍छी सेवा दे सके।

5. गलाकाट प्रतियोगिता 

आज के युग में प्रत्‍येक वस्‍तु के अनेक विक्रता है यहां वर हर विक्रेता अपनी वस्‍तुओं को शीघ्र बेचना चाहता है। कुछ विक्रेता अपनी वस्‍तु को गलाकाट प्रतियोगिता में लागत से कम कीमत पर बेचने के लिए तैयार हो जाते है इस गलाकाट प्रतियोगिता में वही विक्रेता अपने अस्तित्‍व को बाचये रख सकता है जिसने उपभोक्‍ता व्‍यवाहर का अध्‍ययन कि‍या हो।

6. फैशन में परिवर्तन

आज के इस दौर में फैशन में तेज गति से परविर्तन होते जा रहे है। जिन वस्‍तुओं को लोग आज पसन्‍द कर रहे है वह वस्‍तु कुछ दिन बाद अप्रचलन में आ जाती है इसके बाद उपभोक्‍ता उन वस्‍तुओं का त्‍याग कर देते है। इस स्थिति में विक्रेता को क्रेता की पसन्‍द का अध्‍ययन करना परम आवश्‍यक है और उसी के अनुसार अपने उत्‍पादन में परिवर्तन करने चाहिए। उदाहरण के लिए अमेरिका में कार का मॉडल एक साल के भीतर ही अप्रचलन में आ जाता है।                            

उपभोक्‍ता व्‍यवहार के घटक (upbhokta vyavhar ke ghatak)

उपभोक्‍ता व्‍यवहार के घटक इस प्रकार है-- 

1. मनावैज्ञानिक घटक 

उपभोक्ता व्यवहार के मनोवैज्ञानिक घटक के निम्‍न प्रकार है-

(अ) आधारभूत आवश्‍यकताएं

यह वो आवश्‍यकता है जिन्‍हें उपभोक्‍ता सबसे पहले पूरी करने का प्रयास करता है। इन आवश्‍यकताओं की पूर्ति के बाद ही उसकी निगाह अन्‍य वस्‍तुओ व सेवाओं पर पडती है। ए.एच.मैस्‍लों के अनुसार यह आवश्‍यकताएं इस प्रकार है--

 1. शरीर विज्ञान आवश्‍यकताएं जिसमें खाना पिना सोना आदि शामि‍ल है 

2. सुरक्षा आवश्‍यकतायें 

3. प्रेम आवश्‍यकतायें 

4. समान आवश्‍यकतायें 

5. स्‍वयं यथार्थवाद की आवश्‍यकतायें 

6. जानने व समझने की आवश्‍यकता 

7. सौन्‍दर्य आवश्‍यकतायें

यह आवश्‍यकता सभी लोगों में नही होती पर कुछ लोगों में पायी जाती है। जब कोई व्‍यक्ति कि‍सी वस्‍तु को खरीदने के लिए बाजार में जाता है तो उसके दिमाग में उपयुक्‍त आवश्‍यकताएं होती है जिसका सीधा प्रभाव उसके क्रय व्‍यवहार पर पड़ता है।

(ब)  छवि 

यह एक मनोवैज्ञानिक तत्‍थ है जो उाभोक्‍ता व्‍यवहार को प्रभावित करता है। छवि तीन प्रकार की होती है-- 

1. आत्‍म छवि 

हर व्‍यक्ति की आत्‍म छवि अलग होती है। आत्‍म छवि से आशय उस तस्‍वीर  से है जो कि‍ एक व्‍यक्ति अपने सम्‍बन्‍ध में रखता है। 

2. वस्‍तु छवि

वस्‍तु के सम्‍बन्‍ध में क्रेताओं की धारणा वस्‍तु छवि कहलाती है। वस्‍तु छवि भी उपभोक्‍ता व्‍यवहार को प्रभावित करती है। 

3. ब्राण्‍ड छवि

एक निर्माता की एक ब्राण्‍ड के बारे में एक उाभोक्‍ता जो छवि अपने मस्तिष्‍क में बना लेता है वह ब्राण्‍ड छवि कहलाती है। छवि का निर्माण वस्‍तु के प्रयोग से निर्माता की ख्‍याति से तथा विज्ञापन से होता है।

(स) सीखना-सीखना 

सीखना सीखना का अर्थ वस्‍तु को जानने व समझने से है। यदि कोई वस्‍तु उपभोक्‍ता के प्ररेणा के अनुसार हो तो वह व्‍यक्ति उससे सीख लेता है अन्‍यथा उसे सीखने में कठिनाई आती है उदाहरण के लिए एक व्‍यक्ति जिसके बाल गिर रहे हों या सफेद हो रहे हो उसे उस वस्‍तु के नाम में कठिनाई नही आती है जो बालों को गिरने व सफेद होने से रोकती है यह सच बात है कि‍ वस्‍तु या सेवा के क्रय के समय  सीखे हुए क्रेता का व्‍यवहार बिना सीखे क्रेता के व्‍यवहार क अलग होता है। 

2. आर्थिक घटक

उपभोक्ता व्यवहार के आर्थिक घटक इस प्रकार से है--

(अ) परिवारिक आय

पारिवारिक आय एक परिवार की आय उसकी वचत एवं क्रय करने के तरीकों को प्रभावित करती है यदि पारिवारिक आय गरीबी रेखा के नीचे है तो उसका खर्च आय से अधिक होगा और उसका क्रय व्‍यवहार अन्‍य व्‍यक्ति जैसा नही होगा जिनकी आय गरीबी की पंक्ति में आगे है।

(ब) आय की आशाएं 

जिन व्‍यक्ति को निकट भविष्‍य में अधिक आय प्राप्‍त होने की सम्‍भावना हो उसके द्वारा प्राय अधिक मात्रा में क्रय कि‍या जाता है इसके  विपरीत भविष्‍य में आय प्राप्‍ती की आशा न होने पर कम वस्‍तुओं को क्रय कि‍या जाता है।

(स) सरकारी नीति 

सरकार की नीति भी क्रेता के व्‍यवहार को प्रभावित करती है सरकार द्वारा लगाये जाने वाले कर क्रय शक्ति को कम करते है इसी प्रकार सराकर द्वारा मुद्रा प्रसार की अवस्‍था में कीमतें बढती है और वचत कम होती है। प्रत्‍येक उपभोक्‍ता को सरकारी नीतियां के अनुसार क्रय व्‍यवहार में परिवर्तन करना होता है।

(द) उपभोक्‍ता साख

कि‍सी वस्‍तु या सेवा का नकद या उधार में उपलब्‍ध होना भी क्रय व्‍यवहार को प्रभावित करता है साख सुविधा मिलने पर उपभोक्‍ताओं द्वारा अधिक क्रय कि‍या जाता है उपभोक्‍ता साख द्वारा विपणनकर्ता वस्‍तु के बाजार को विस्‍तृत व संकुचित कर सकता है।

(ई) स्‍वाधीन आय

एक परिवार का आवश्‍यक आवश्‍यकताओं की पूर्ति के बाद यदि उसके पास आय का कुछ भाग खर्च  करने के लिए वच जाता है इसी को हम स्‍वाधीन आय कहते है।

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