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12/22/2020

मांग की लोच क्या है? मांग की लोच का महत्व, प्रभावित करने वाले तत्व

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मांग की लोच क्या है? (maang ki loch kise kahte hai)

maang ki loch ka arth paribhasha mahatva prabhavit karane vale tatva;मांग के नियम के अनुसार जब वस्तु के मूल्य मे वृद्धि होती है तो वस्तु की मांग कम हो जाती है और इसी प्रकार से जब वस्तु  के मूल्य मे कमी आती है तो मांग मे वृद्धि हो जाती है। इस तरह से यह नियम मूल्य मे परिवर्तन होने के परिणामस्वरूप मांग के परिवर्तन की दिशा ही दर्शाता है, लेकिन यह नही दर्शाता है कि मांग की मात्रा मे कितना परिवर्तन होता है। मांग की मात्रा मे परिवर्तन जानने के लिए अर्थशास्त्रियों ने मांग की लोच का तकनीकी विचार प्रस्तुत किया है।

मांग की लोच का मतलब वस्तु के मूल्य, उपभोक्ताओं की आय, सम्बन्धित वस्तु का मूल्य एवं विज्ञापन खर्च मे परिवर्तन के फलस्वरूप मांग मे होने वाले परिवर्तन की मात्रा की माप से सम्बंधित है। यह मांग की मात्रा वस्तु की मात्रा वस्तु के मूल्य उपभोक्ताओं की आय, या सम्बन्धित वस्तुएं का मूल्य, या विज्ञापन खर्च के मध्य परिमाणात्मक संबंध को व्यक्त करता है।

मांग की लोच की परिभाषाएं (maang ki loch ki paribhasha)

मांग की लोच को परिभाषित करते हुये प्रो. मार्शल ने कहा है कि- " बाजार मे मांग की लोच इस तथ्य के अनुसार अधिक या कम होती है कि मूल्य मे निश्चित कमी होने के कारण मांग की मात्रा मे अधिक या कम वृद्धि हो अथवा मूल्य मे निश्चित वृद्धि होने पर मांग की मात्रा मे अधिक या कम गिरावट हो। 

श्रीमति जाॅन के अनुसार," मांग की लोच, मूल्य मे थोड़े से परिवर्तन के फलस्वरूप क्रय की गई मात्रा के अनुपातिक परिवर्तन मे मूल्य के अनुपातिक परिवर्तन से भाग देने पर प्राप्त होती है। 

प्रो. बोल्डिंग ने मांग की लोच को इस प्रकार से परिभाषित किया है," किसी वस्तु के मूल्य मे निश्चित प्रतिशत परिवर्तन होने पर उस वस्तु की मांग मे जो निश्चित प्रतिशत परिवर्तन होगा, उसे मांग की लोच कहते है।" 

डाॅ. केयर्नक्रास के अनुसार," किसी वस्तु की मांग की लोच वह गति है जिस पर मांगी हुई वस्तु की मात्रा मे मूल्य के आधार पर परिवर्तन होता है।" 

वेह्रम के शब्दों मे," मांग की लोच की धारणा का अभिप्राय मूल्य मे अल्प परिवर्तन के कारण मांग की मात्रा पर पड़ने वाले प्रभाव से है।" 

सेम्युलसन के अनुसार, " मांग की लोच का विचार मूल्य के परिवर्तन के फलस्वरूप मांग की मात्रा मे परिवर्तन के अंश, अर्थात् मांग मे प्रतिक्रियात्मकता के अंश को दर्शाता है।" 

मांग की लोच का महत्व अथवा उपयोगिता (maang ki loch ka mahatva)

मांग की लोच का महत्व सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनो मे दृष्टिकोण से है। वास्तव में मांग की लोच का व्यावहारिक महत्व सैद्धांतिक महत्व की तुलना मे अधिक है। मांग की लोच का विचार व्यावसायिक फर्मों के मूल्य-निर्णयों तथा सरकार द्वारा मूल्य-नियंत्रण की स्थिति मे महत्वपूर्ण भूमिका का निभाता है। मांग की लोच का विचार मुद्रा के अवमूल्यन के परिणामस्वरूप निर्यातों से होने वाली आय पर प्रभाव को समझने मे सहयोग प्रदान करता है। मांग की लोच का विचार राजकोषीय नीति मे भी अत्यन्त उपयोगी है। मांग की लोच से अर्थशास्त्र के अनेक सिद्धांतों तथा समस्याओं की व्याख्या करने मे सहयोग प्राप्त होता है। इस प्रकार मांग की लोच का विचार अर्थशास्त्र मे सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोणों से उपयोगी है। मांग की लोच का महत्व या उपयोगिता इस प्रकार से है-- 

1. एकाधिकारी के लिए 

वस्तु की पूर्ति पर एकाधिकारी का पूरा नियंत्रण होता है, वस्तु की मांग पर नही, इसलिए लाभ को अधिकतम करने के लिए वह वस्तु के मूल्य उसकी मांग की लोच के अनुसार निर्धारित करता है। यदि वस्तु की मांग बेलोचदार है तो अधिक मूल्य तय करके अधिक लाभ अर्जित किया जाएगा। मांग लोचदार होने पर वस्तु के मूल्य कम निर्धारित करके अधिक मात्रा के विक्रय के द्वारा लाभ को अधिकतम किया जायगा। 

2. सरकारी नीति निर्धारण मे महत्व 

मांग की लोच का विचार सरकार की आर्थिक एवं वित्तीय नीति के निर्धारण मे सहायता प्रदान करता है। वस्तुओं के वैधानिक मूल्य नियंत्रण के समय सरकार को मांग की लोच के विचार पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। कर लगाते समय सरकार को यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि उसका भार समाज के कौन से वर्ग पर पड़ेगा? अगर बेलोचदार मांग वाली वस्तुओं पर कर लगाया गया तो सरकार को इच्छित आय प्राप्त हो जायेगी, परन्तु लोचदार मांग वाली वस्तुओं की दशा मे ऐसा होना संभव नही है।

3. कीमत विभेद मे महत्व 

कीमत विभेद करते समय भी मांग की लोच को ध्यान मे रखा जाता है। एकधिकारी का कीमत विभेद तभी सफल हो सकता है, जब उसे क्रेताओं व बाजारों की मांग की लोच की जानकारी होगी। वह उन बाजारों मे वस्तु को ऊंची कीमत पर बेचेगा जहां मांग की लोच बेलोच होती है और उन बाजारों मे सस्ती बेचता है जहां मांग की लोच लोचदार होती है।

4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मे महत्व 

किन्ही दो देशो के बीच व्यापार की शर्तों के लिए यह विचार बहुत मददगार होता है। अन्तराष्ट्रीय व्यापार मे सौदा करने की शक्ति तथा उससे प्राप्त लाभ आयातित एवं निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की पारस्परिक मांग एवं पूर्ति की लोच पर निर्भर है। 

5. वितरण मे महत्व 

मांग की लोच का महत्व वितरण मे भी है। संयुक्त उत्पादन मे साधनों के हिस्से के बंटवारे के लिए मांग की लोच को ध्यान मे रखा जाता है। उत्पादक के लिए जिन साधनो की मांग बेलोच होगी उनको ऊंचा परिश्रमिक दिया जायेगा और जिन साधनों की मांग लोचदार होगी उनको पारिश्रमिक कम दिया जायेगा।

6. संयुक्त पूर्ति 

दो या अधिक वस्तुओं का उत्पादन एक साथ होने पर उनकी लागत को अलग-अलग ज्ञात करना कठिन होता है जैसे कि गेंहू और भूसा। ऐसी स्थिति मे जिस वस्तु की मांग अधिक लोचदार हो उसका मूल्य कम रखा जाता है तथा जिस वस्तु की मांग बेलाचदार होती है उसका मूल्य अधिक निर्धारित किया जाता है।

7. उत्पत्ति के साधनों के पारिश्रमिक का निर्धारण 

मांग की लोच के द्वारा बेलोचदार मांग वाले साधनों का अधिक मूल्य एवं लोचदार मांग वाले साधन को कम मूल्य निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए, मालिक के द्वारा श्रमिकों की मांग बेलोचदार होने पर अधिक मजदूरी देनी पड़ती है। 

8. परिवाहन की भाड़े की दर निश्चित करने मे प्रयोग 

व्यापार मे यदि कोई वस्तु ऐसी है जिसके परिवहन की मांग लोचदार है, तो परिवहन भाड़े की दर कम रखी जायेगी और यदि परिवहन की मांग बेलोचदार है, तो परिवहन भाड़े की ऊंची दर निश्चित की जायेगी। 

9. किसी उद्योग को सार्वजनिक महत्व वाला उद्योग घोषति करना 

कौन से उद्योग को सार्वजनिक सेवा घोषित किया जाये, यह निर्णय लेने मे मांग की लोच का विचार सहायक की भूमिका निभाता है। यदि जीवनोपयोगी वस्तु, जिसकी मांग बेलोचदार है, किसी एकाधिकारी के नियंत्रण मे है तो ऐसी वस्तु के उत्पादन तथा व्यापार को सरकार को अपने नियंत्रण मे ले लेना चाहिए।

मांग की लोच को प्रभावित करने वाले तत्व (mang ki loch ko prabhavit karne wale karak)

मांग की लोच को प्रभावित करने वाले तत्व इस प्रकार से है--

1. वस्तु की कीमत 

वस्तु की कीमत का मांग की लोच प्रभावित करती है। प्रो. मार्शन के अनुसार, " मांग की लोच ऊंची कीमतों के संबंध मे अधिक होती है, मध्य कीमतों के लिए पर्याप्त तथा ज्यों-ज्यों कीमत घटती है त्यों-त्यों मांग की लोच भी घटती है। यदि कीमतें इतनी गिरें कि तृप्ति की सीमा आ जाये, तो लोच धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

2. वस्तु का प्रयोग 

वस्तु का प्रयोग भी मांग की लोच को प्रभावित करने वाला तत्व है। जिन वस्तुओं का प्रयोग अनेक कामों मे होता है उन वस्तुओं की मांग लोचदार होगी। उदाहरण के दौर पर बिजली को ले लीजिये बिजली का रोशनी अतिरिक्त भी अनेक कार्यों मे होता है, यदि बिजली की दरों मे वृद्धि होती है तो लोग इसकी मांग कम और दरों मे कमी होने पर मांग अधिक करेंगे। यदि बिजली का प्रयोग केवल रोशनी करने के लिए ही होता, तो मूल्य वृद्धि होने पर भी इसकी मांग मे उतनी कमी नही की जाती। अतः जिन वस्तुओं के एक से अनेक प्रयोग किये जाते है उन वस्तुओं की मांग की लोच लोचदार जबकि एक ही प्रयोग मे काम आने वाली वस्तु की मांग की लोच बेलोच होगी। 

3. वस्तु के गुण 

वस्तु के गुणों का प्रभाव मांग की लोच पर पड़ता है, अनिवार्य वस्तुओं की मांग बेलोचदार तथा आरामदायक वस्तुओं की मांग लोचदार होती है।

4. समय का प्रभाव 

जितना कम समय होता है वस्तु की मांग की लोच उतनी ही कम लोचदार होगी और इसके विरुद्ध जितना समय अधिक होगा, वस्तु की मांग की लोच उतनी ही अधिक लोचदार होगी। 

5. संयुक्त मांग 

वस्तु की संयुक्त मांग भी मांग की लोच को प्रभावित करती है। जो वस्तुओं एक दूसरे के साथ मांगी जाती है जैसे की सिगरेट के साथ माचिस, बाइक के साथ पेट्रोल, पेन के साथ स्याही। ऐसी वस्तुएं की मांग की लोच का सम्बन्ध मुख्य वस्तु की मांग की लोच से जुड़ा होता है। 

6. आय वर्ग 

ऐसी वस्तुएं की मांग बेलोचदार होती है, जिनका उपयोग धनवान व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। इसके विपरीत ऐसी वस्तुएं की मांग लोचदार होती है, जिनका उपयोग केवल निर्धन वर्ग द्वारा किया जाता है। गरीब आदमी की मांग पर मूल्यों के परिवर्तन का अधिक प्रभाव पड़ता है जबकि धनवान पर कम।

7. उपभोक्ता की आदत 

उपभोक्ता की आदत भी मांग की लोच को प्रभावित करती है। यदि किसी उपभोक्ता को किसी वस्तु की लत या आदत है तो उस वस्तु की मांग बेलोचदार होगी। उदाहरण के लिए, नशीली वस्तुएं जैसे, सिगरेट, शराब, गांजा, अफीम, तम्बाकू आदि। इसके विपरीत शौकिया ढंग से जिन वस्तुओं का उपयोग किया जाता है, उनकी मांग लोचदार होती है।

8.  वस्तु के भावी उपयोग की संभावना 

जिन वस्तुओं का उपभोग भविष्य के लिए टाला जा सकता है उन वस्तुओं की मांग की लोच लोचदार होती है, क्योंकि ये वस्तुएं उतनी आवश्यक नही होती है, परन्तु जिन वस्तुओं के उपभोग को भविष्य के लिए नही टाला जा सकता है उन वस्तुओं की मांग की लोच बेलोच होती है।

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