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9/19/2020

संप्रभुता के प्रकार या स्वरूप

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संप्रभुता के प्रकार या स्वरूप (samprabhuta ke prakar)

1. नाममात्र की अथवा वास्तविक संप्रभुता

नाममात्र की और वास्तविक संप्रभुता का अभिप्राय शक्ति के प्रयोग की यथार्थ और वास्तविक स्थिति से है। नाममात्र की संप्रभुता शब्द का प्रयोग उस राज्य के राजतंत्रीय शासक के लिये किया जाता है जो किसी समय वास्तव मे संप्रभु था, किंतु अब पर्याप्त  समय मे वह संप्रभु नही है। इस प्रकार शासक संप्रभुता का प्रयोग नही करता, वरन् उसके मंत्री अथवा वहां की संसद उसका प्रयोग करती है। शासन का समस्त कार्य उसके नाम से अवश्य किया जाता है और संविधान द्वारा उसको समस्त कार्यपालिका सम्बन्धी अधिकार प्राप्त है। इंग्लैंड का सम्राट इसी प्रकार का संप्रभु है। संयुक्त राज्य अमेरिका मे यह भेद नही है। औपचारिक और वास्तविक संप्रभुता का भेद संसदात्मक शासन प्रणाली मे ही देखा जाता है, अध्यक्षात्मक मे नही देखा जाता।

2. कानूनी और राजनीतिक संप्रभुता 

कानूनी संप्रभु एक संवैधानिक संकल्पना है, जिसका अर्थ है कानून बनाने और उसका पालन कराने की सर्वोच्च शक्ति जिस सत्ता के पास है वह कानूनी संप्रभु है। कानून की दृष्टि मे संप्रभुता की सत्ता का उपयोग करने वाले व्यक्ति अथवा व्यक्तियों को लेकर कोई शंका नही हो सकती। कानूनी संप्रभुता, पूर्ण व्यापक होता है उसके पास अपने कानून और आदेश को कार्यान्वित करने की लिए पर्याप्त शक्तियाँ होती है। गार्नर का कहना है," कानूनी संप्रभु वह निश्चित व्यक्ति है जो राज्य के उच्चतम आदेशों को कानून के रूप मे प्रकट कर सके, वह शक्ति जो ईश्वरीय नियमों या नैतिकता के सिद्धांत तथा जनमत के आदेशों का उल्लंघन कर सके।" इंग्लैंड मे संसद सहित सम्राट कानूनी संप्रभु है। इसके विपरीत राजनीतिक संप्रभुता की संकल्पना अस्पष्ट और भ्रमित करने वाली है। यह बताया जाता है कि कानून संप्रभु के पीछे राजनीतिक संप्रभु होता है, जिसका कानूनी संप्रभु शिरोधार्य करता है। प्रो. डायसी ने इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है," कानूनी संप्रभु के पीछे एक-दूसरा संप्रभु विद्यमान है जिसके सामने कानूनी संप्रभु को भी झुकना पड़ता है। यह दूसरा संप्रभु ही राजनीतिक संप्रभ है। राजनीतिक संप्रभुता कानूनन मान्यता प्राप्त नही है। इसकी पहचान बहुत मुश्किल कार्य है। यह कानूनी संप्रभु को प्रभावित और नियंत्रित करती है। 

3. लोकप्रिय संप्रभुता 

मध्य युग के विचारक जो राजा की शक्ति के विरोधी थे। उन्होंने लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। अठारहवीं शताब्दी मे इसका प्रतिपादन फ्रांस के दार्शनिक रूसो ने बड़े जोरदार शब्दों मे किया। उन्नीसवीं शताब्दी मे इस सिद्धांत का प्रचार तथा विकास प्रजातंत्र के विकास के साथ-साथ आरंभ हुआ। यदि वैधानिक संप्रभुता जनता की इच्छा है और यह जनता की इच्छा का विरोध करती है तो वह अधिक समय तक कार्य नही कर सकती है और उसका शीघ्र अन्त कर दिया जाता है। जनता वैधानिक संप्रभुता के आदेशों का पालन इसलिये करती है, क्योंकि उसके आदेश जनता की इच्छानुसार होते है। प्रोफेसर रिची ने लोक संप्रभुता का समर्थन खुले शब्दों मे किया। उनके अनुसार जनता प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचन द्वारा संप्रभुता का प्रयोग करती है और परोक्ष रूप से विद्रोह करने के अधिकार द्वारा दबाव, आदि के कारण संप्रभुता का प्रयोग करती है, जनता के हाथ मे शारीरिक बल होता है और उसके द्वारा यह सरकार को उलट सकती है। 

4. यथार्थ संप्रभुता 

जब राज्य सत्ता किसी व्यक्ति मे निहित हो, किंतु उसके अधिकारों का प्रयोग अन्य कोई व्यक्ति करता है, तो प्रयोग करने वाली सत्ता यथार्थ संप्रभुता कहलाती है। इंग्लैंड मे संसद यथार्थ संप्रभुता का उदाहरण है। 

5. विधि-सम्मत और वास्तविक संप्रभुता 

कभी-कभी किसी राज्य मे दो-दो सत्ता या शासक हो जाते है। इनमे एक वास्तविक शासक होता है, जिसकी आज्ञा का पालन जनता भी करती है। लार्ड ब्राइस के अनुसार, " व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समूह जो अपनी इच्छा को मनवा सकता है, चाहे वह कानून के अनुसार हो या कानून के विरूद्ध वह वास्तविक शासक हैं " तथा दूसरा शासक वह होता है, जिससे सत्ता छीन ली गयी है, पर वह स्वयं को वास्तविक शासक ही मानता है, यहि विधि सम्मत संप्रभु है। कई बार जब विधि-सम्मत संप्रभु का अस्तित्व मिटने लगता है, तब वास्तविक शासक ही विधि सम्मत शासक बन जाता है। गार्नर के शब्दों मे, " वह संप्रभु जो अपनी शक्ति को बनाये रखने मे सफल होता है, थोड़े ही समय मे वैध संप्रभु बन जाता है। यह क्रिया या तो जनता की सहमति से होती है या राज्य के पुनर्गठन द्वारा। यह वास्तव मे कुछ ऐसी ही है, जैसा निजी कानून मे वास्तविक अधिकार पुरातनता द्वारा वैध स्वामित्व का रूप ग्रहण कर लेता है।

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