8/20/2020

एकाकी व्यापार अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं या लक्षण

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एकाकी व्यापार क्या है? एकाकी व्यापार का अर्थ (ekaki vyapar kya hai)

एकाकी व्यापार व्यावसायिक संगठन वह स्वरूप है जिसको केवल एक व्यक्ति स्थापित करता है। वही व्यक्ति आवश्यक पूंजी लगाता है, संचालन एवं प्रबंध करता है, लाभ प्राप्त करता है, हानि को सहन करता है और व्यापार का समस्त उत्तरदायित्व उसी एक व्यक्ति के कंधो पर होता है तथा लाभ-हानि का एकमात्र भाजक व वहनकर्ता भी वही होता है।
आगे जानेंगे एकाकी व्यापार की परिभाषा, एकाकी व्यापार की विशेषताएं।

एकाकी व्यापार की परिभाषा (ekaki vyapar ki paribhasha)

जेम्स स्टीफेंसन के अनुसार " एकाकी व्यापार वह व्यक्ति है जो व्यवसाय को स्वंय तथा अपने लिए ही करता है। इस प्रकार एकाकी व्यवसाय (व्यापार) का महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि वह व्यक्ति व्यवसाय को चलाने स्वामी ही नही होता। अपितु उसका संगठनकर्ता एवं प्रबन्धक भी होता है तथा सब कार्यों को करने अथवा हानि वहन करने के लिए उत्तरदायी होता है।"
सर्वश्री लुई हेने के शब्दों मे " एकाकी व्यापार व्यवसाय का वह स्वरूप है जिसका प्रमुख एक ही व्यक्ति होता है जो उसके समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है, उसकी क्रियाओं का संचालन करता है और लाभ-हानि का संपूर्ण भार स्वयं ही उठता है।"
बी. बी. घोष के अनुसार " एकाकी स्वामित्वधारी व्यवसाय मे, एक व्यक्ति की व्यवसाय का अकेला स्वामी होता है। वही व्यवसाय का प्रबंध और नियंत्रण करता है।"

डाॅ. जाॅन ए. शुबिन " एकाकी स्वामित्व व्यवसाय के अन्तर्गत एक ही व्यक्ति उसका संगठन करता है। उसका स्वामी होता है, अपने निजी नाम से व्यवसाय चलाता है।
किम्बाल एवं किम्बाल के अनुसार " एकाकी स्वामी अपने व्यवसाय से सम्बंधित समस्त बातों के लिए सर्वोच्च न्यायाधीश (अधिकारी) होता है, परन्तु देश के सामान्य नियमों तथा उसके व्यवसाय पर प्रभाव डालने वाले नियमों का पालन करते हुए।"

एकाकी व्यापार के प्रमुख लक्षण एवं विशेषताएं (ekaki vyapar visheshta)

1. कार्य क्षेत्र की निर्धारित सीमा
एकाकी व्यापार का कार्य-क्षेत्र व्यापार की सीमाओं मे सीमित होता है। अकेला होने के कारण वह अनेक स्थानों पर कार्य न करके एक स्थान पर कार्य-क्षेत्र सीमित करता है।
 2. एकल स्वामित्व
व्यवसाय का स्वीम एक ही व्यक्ति होता है जो व्यापार की समस्त बातों के लिए उत्तरदायी होता है। वह स्वयं जोखिम उठाता है। व्यवसाय की समाप्ति पर वह समस्त संपत्ति का अधिकारी होता है।
3. असीमित दायित्व
एकाकी व्यापार के यह भी विशेषता है कि इसके मालिक का दायित्व उसके द्वारा प्रदत्त पूँजी तक ही सीमित नही रहता अपितु उसकी निजी सम्पत्ति का भी प्रयोग व्यापार के दायित्व का चुकता करने के लिए जा सकता है।
4. ऐच्छिक आरंभ और अन्त 
एकाकी व्यापार का एक लक्षण यह भी है कि एकाकी व्यापारी अपनी इच्छा से जब चाहे तब अपनी मर्जी से व्यवसाय आरंभ कर सकता है और उसे समाप्त भी कर सकता है।
5. सीमित प्रबंध कुशलता
प्रायः ऐसे संगठन का प्रबंध उसके मालिक के द्वारा ही किया जाता है। कभी-कभी, उसके परिवार के सदस्य भी उसमे भाग लेते है। आकार के बड़े होने पर ही कुछ दशा मे योग्य प्रबन्धक नियुक्त किये जाते है परन्तु सीमित धन होने के कारण अधिक योग्य प्रबन्धक की सेवाएं ये नही प्राप्त कर पाते।
6. वैधानिक शिष्टाचार से मुक्ति 
एकाकी व्यापार को स्थापित करने के लिए किसी प्रकार की वैधानिक कार्यवाही नही करनी पड़ती है अर्थात् इसके लिए रजिस्ट्री आदि की आवश्यकता नही होती।
7. व्यापार के चुनाव मे स्वतंत्रता
एकाकी व्यापार की एक विशेषता यह भी है की एकाकी व्यापारी को इच्छानुसार कोई भी व्यापार चुनने की स्वतंत्रता होती है, परंतु यदि एक ऐसा व्यापार आरंभ करने जा रहा है जिसके लिए सरकारी अनुज्ञा-पत्र जरूरी है तो उसे प्राप्त करना भी जरूरी है।
8. पूँजी पर एकाधिपत्य
एकाकी व्यापार मे लगाई जाने वाली पूंजी का प्रबंध एकाकी व्यापारी को स्वयं करना पड़ता है। वह कुल पूंजी या तो अपने पास से लगाता है अथवा अपने मित्रों या रिश्तेदारों से ऋण लेकर व्यापार मे लगाता है।
9. सम्पूर्ण जोखिम व लाभ मालिक का
व्यापार के मालिक को ही सम्पूर्ण जोखिम उठाना पड़ता है तथा वही हानि का वहन करता है। साथ ही, लाभ होने पर सम्पूर्ण लाभ भी उसी का होता है।

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