5/21/2022

गुटनिरपेक्षता का अर्थ, सिद्धांत, विकास/उदय के कारण

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गुटनिरपेक्षता वास्तव में कोई निष्क्रियता नही है बल्कि यह एक सक्रिय और स्वतंत्र सिद्धान्त हैं। यह अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में होने वाली घटनाओं के प्रति चुप्पी लगाकर बैठना नही बल्कि उनमें न्यायपूर्ण ढंग से सक्रिय भाग लेना हैं।

गुटनिरपेक्षता का अर्थ (gutnirpekshta ki niti kya hai)

गुट-निरपेक्षता का सामान्य अर्थ है "विभिन्न शक्ति से तटस्थ या अलग रहते हुए स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हित के अनुसार न्याय का समर्थन करना।" गुटनिरपेक्षता शक्ति गुटो से अलग रहने की नीति पर चलने वाला देश अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी शक्ति गुट अथवा खेमे के साथ बँधा हुआ नही हैं। उसका अपना सत्य न्याय औचित्य एवं शक्ति पर आधारित स्वतंत्र मार्ग हैं।
गुटनिरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में "तटस्थता" नही हैं। गुटनिरपेक्षता देश विश्व की घटनाओं के प्रति उदासीन नही रहते, बल्कि एक ऐसी स्पष्ट और रचनात्मक नीति का अनुसरण करते हैं जिससे विश्व मे शांति स्थापित हो सके।
गुटनिरपेक्षता का सरल अर्थ है कि विभिन्न शक्ति गुटों से तटस्थ या दूर रहते हुए अपनी स्वतन्त्र निर्णय नीति और राष्ट्रीय हित के अनुसार सही या न्याय का साथ देना। आंख बंद करके गुटों से अलग रहना गुटनिरपेक्षता नहीं हो सकती गुटनिरपेक्षता का अर्थ है सही और गलत में अन्तर करके सदा सही नीति का समर्थन करना। 
जार्ज लिस्का ने इसका सही अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि सबसे पहले यह बताना जरूरी है कि गुटनिरपेक्षता तटस्थता नहीं है। इसका अर्थ है उचित और अनुचित का भेद जानकर उचित का साथ देना। गुटनिरपेक्षता का सही अर्थ स्पष्ट करने के लिए यह बताना जरूरी है कि गुटनिरपेक्षता क्या नहीं है? 

गुटनिरपेक्षता तटस्थता नहीं है 

तटस्थता शब्द का प्रयोग प्रायः युद्ध के समय किया जाता है। 
शान्तिकाल में भी यह एक प्रकार से युद्ध की मनोवृत्ति को प्रकट करती है। यह उदासीनता का दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यह एक प्रकार की नकारात्मक प्रवृति है। जबकि गुटनिरपेक्षता का विचार सक्रिय एवं सकारात्मक है। इससे विश्व समस्याओं का बिना गुटों के भी समाधान किया जा सकता है। इस तरह गुटनिरपेक्षता एक सक्रिय विचार है गुट निरपेक्षता युद्धों में शामिल होकर भी बरकरार रहती है। भारत को चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध करने पड़े फिर वह गुटनिरपेक्ष देश है। तटस्थता युद्धों में भाग लेने पर समाप्त हो जाती है। स्वीटज़रलैंड एक तटस्थ देश है क्योंकि वह न तो किसी युद्ध में शामिल हुआ है और न ही उसे किसी सैनिक संगठन की सदस्यता प्राप्त है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि गुटनिरपेक्षता तटस्थता की नीति नहीं है। 

गुटनिरपेक्षता अलगाववाद या पृथकतावाद नहीं है

पृथकवाद का अर्थ होता है प्रायः अपने को दूसरे देशों की समस्याओं से दूर रखना। अमेरिका ने प्रथम विश्व युद्ध से पहले इसी नीति का पालन किया। लेकिन गुटनिरपेक्षता अलगाववाद की नीति नहीं है। गुटनिरपेक्षता अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं में स्वयं रूचि लेने व सक्रिय भूमिका निभाने की नीति है। उदाहरण के लिए भारत ने शीत युद्ध में किसी गुट में शामिल न होकर भी इस समस्या के प्रति अपनी जागरूकता का परिचय दिया और दोनों गुटों में तनाव कम कराने के प्रयास भी किए। इस प्रकार कहा जा सकता है कि गुटनिरपेक्षता तटस्थतावाद तथा अलगाववाद की नीति नहीं है। यह एक ऐसी नीति है जो सैनिक गुटों से दूर रहते हुए भी उनके काफी निकट है। 

गुट निरपेक्ष देश कौन हैं? 

गुटनिरपेक्षता का सही अर्थ जानने के लिए गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के तीन कर्णधारों पंडित जवाहर लाल नेहरू, नासिर व टीटो के विचारों को जानना आवश्यक है। इन तीनों नेताओं ने 1961 में गुटनिरपेक्षता को सही रूप में परिभाषित करने वाले निम्नलिखित 5 सिद्धान्त विश्व के सामने रखे--
1. जो राष्ट्र किसी सैनिक गुट का सदस्य नहीं हो। 
2. जिसकी अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति हो। 
3. जो किसी महाशक्ति से द्विपक्षीय समझौता न करता हो। 
4. जो अपने क्षेत्र में किसी महाशक्ति को सैनिक अड्डा बनाने की अनुमति न देता हो। 
5. जो उपनिवेशवाद का विरोधी हो। 
इस सिद्धान्तों के आधार पर कहा जा सकता है कि ऐसा देश जो सैनिक गुटों से दूर रहकर स्वतन्त्र विदेश नीति का पालन करता हो और अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति जागरूक हो गुट निरपेक्ष देश कहलाता है।

भारत की गुटनिरपेक्षता नीति के सिद्धांत 

विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति मे भारत की भूमिका हमेशा से ही असंलग्नयता गुटनिरपेक्षता की रही हैं। गुटनिरपेक्षता गुटों की पूर्व उपस्थित का संकेत कर देती है। जब भारत स्वाधीन हुआ तो उसने पाया कि विश्व की राजनीति दो विरोधी गुटों मे बँट चुकी हैं। एक गुट का नेता संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरे सोवियत संघ था। विश्व के अधिकांश राष्ट्र दो विरोधी खेमों मे विभाजित हो गये और भीषण शीत-युद्ध प्रारंभ हो गया। शीत-युद्ध का क्षेत्र विस्तृत होने लगा और इसके साथ-साथ एक तीसरे महासमर की तैयरी होने लगी। अतः भारत ने दोनों गुटों से पृथक रहने की जो नीति अपनायी उसे "गुटनिरपेक्षता" की नीति के नाम से जाना जाता हैं।
इस नीति का आशय है कि भारत वर्तमान विश्व राजनीति के दोनों गुटों मे से किसी में से भी शामिल नही होगा, किन्तु अलग रहते हुए उनसे मैत्री सम्बन्ध कायम रखने की चेष्टा करेगा और उनकी बिना शर्त सहायता से अपने विकास मे तत्पर रहेगा। यह गुटनिरपेक्षता नकारात्मक तटस्थता, अप्रगतिशीलता अथवा उपदेशात्मक नीति नही हैं। इसका अर्थ सकारात्मक है अर्थात जो सही और न्यायसंगत हैं।
गुटनिरपेक्षता का अर्थ है विश्व के किसी भी गुट के साथ जुड़ा हुआ न होना, अर्थात नाटो, सीटो या वारसा संगठनों जैसे किसी सैनिक गठबंधन में शामिल न होना। यह ऐसी नीति है जो विश्व मे स्वतंत्र नीति का अनुसरण करती है और हर समस्या पर अपने विचारों को प्रकट करने और अपने दृष्टिकोण को अपनाने के लिए स्वतंत्र समझती है। यह किन्हीं पूर्वाग्रहों के आधारों पर कार्य नही करती। यह समस्याओं पर वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण अपनाती है, व्यक्तिनिष्ठ नही। भारत की यह गुट-निरपेक्षता पलायनवाद की नीति भी नही हैं। एशिया के प्रमुख राष्ट्र के रूप में भारत अपने उत्तरदायित्व से कभी बचना नहीं चाहता। किसी भी विवाद के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए भारत की मध्यस्थता की सेवाएँ सदैव उपलब्ध रही हैं।

गुटनिरपेक्षता के उदय/विकास के कारण

गुटनिरपेक्षता के विकास के निम्‍नलिखित कारण हैं--   
1. राष्ट्रीय स्वाधीनता की भावना 
एशिया व अफ्रीका के राष्ट्र लम्बे समय तक उपनिवेशवाद के शिकार रहैं। यहाँ के राष्टों ने अपनी राष्ट्रवाद की भावना को प्रज्ज्वलित कर स्वाधीनता का संघर्ष किया और साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद को जड़ से उखाड़कर स्वाधीनता प्राप्त की। ऐसे राष्ट्र अब किसी भी कीमत पर अपने स्वाधीनता को खोने नहीं चाहते थे। इसलिए वह महाशक्तियों के किसी गुट में सम्मिलित होने से अपने को बचाना चाहते थे।
2. महान नेताओं का नेतृत्व 
द्वितीय विश्व युध्दोत्तर काल में गुटनिरपेक्षता देशों को विश्व स्तर के नेताओं का नेतृत्व प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। जवाहरलाल नेहरू, जोसिफ ब्रोज टीटो, अब्दुल गाथेर नासिर, एन्कुमा, सुकर्ण आदि ऐसे ही विश्व स्तर के महान नेता थे जिनके नेतृत्व मे गुटनिरपेक्षता आन्दोलन को नेतृत्व मिला।
3. आर्थिक कारण 
गुटनिरपेक्षता राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के समय आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक पिछड़े हुए थे। गरीब, बेरोजगारी, भुखमरी इन राष्टों मे व्याप्त थी। स्वतंत्रता के पश्चात इन्हें अपने आर्थिक विकास के लिए अत्यधिक आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी, जो इन्हें बिना किसी गुट में सम्मिलित हुए ही प्राप्त हो सकती थी।
4. विश्व शांति की स्थापना 
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात महाशक्तियों के चल रहे शीत युद्ध से दूर रहकर वे अपना विकास करना चाहते थे जो शांतिपूर्ण स्थिति में ही सम्भव हो सकता था। इसलिए नवोदित राष्ट्रों ने गुटो से अगल रहकर विश्व रहकर शांति स्थापना के लिए गुट-निपेक्षता आन्दोलन को बल दिया।
5. जातीय एवं सांस्कृतिक कारण 
गुटनिरपेक्षता की नीति एक जातीय और सांस्कृतिक पहलू भी हैं। इस नीति के समर्थक मुख्यतः एशिया और अफ्रीका के वे देश हैं जिनका यूरोपीय राष्ट्रों ने राजनीतिक तथा सांस्कृतिक एकता की कड़ियाँ यद्यपि मजबूत नही हैं तथापि इसमें सभी एकमत हैं कि वे किसी भी बड़ी शक्ति के अधीन न रहें।
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1 टिप्पणी:
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  1. सोवियत संघ के विघटन से विशव राजनीति के सावरूप मे क्या अंतर आया

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