9/24/2022

लास्की के राजनीतिक विचार

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प्रश्न; लाॅस्की के राजनीतिक विचारों की व्याख्या कीजिए। 

अथवा" हैरोल्ड लॉस्की के राजनीतिक चिंतन के महत्व का मूल्यांकन कीजिए। 

अथवा" राज्य की प्रभुसत्ता पर लास्की के विचारों की समीक्षा कीजिए। 

अथवा" राज्य की प्रकृति एवं संप्रभुता पर लाॅस्की के विचारों का परीक्षण कीजिए। 

उत्तर-- 

laski ke rajnitik vichar;बींसवीं शताब्दी के राजनीतिक विचारकों में लास्की को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हालांकि प्रमुख रूप से वह एक बहुलवादी विचारक है लेकिन उसे राजनीतिक विचारकों की एक विशिष्ट श्रेणी में नहीं रखि जा सकता क्योंकि लाॅस्की के विचार किसी निश्चित धारा में नहीं बहते। थोड़े-थोड़े समय के बाद उसके विचारों में परिवर्तन होता रहता है। उसके विचारों में एक साथ व्यक्तिवादी, उदारवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी, आदर्शवादी, श्रम संघवादी, श्रेणी समाजवादी एवं अन्तर्राष्ट्रीय विचारों की छाप दिखाई देती है। अतः लास्की को सिर्फ सैद्धांतिक विचारक न मानकर उसे महान विचारक, एक सफल शिक्षक तथा निःस्वार्थ सेवकों की श्रेणी में रखा जाता हैं। 

लास्की के राजनीतिक विचार 

लाॅस्की के राजनीतिक विचार किसी विशेष विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उसके विचारों में समय-समय पर परिवर्तन होता रहा है। लेकिन वह एक यथार्थवादी एवं मानवतावादी विचारक था, उसने मानव मात्र को अज्ञानता, शोषण तथा भय से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया, वह मानव अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं का प्रबल समर्थक था। लास्की के मुख्य राजनीतिक विचार इस प्रकार से हैं--

1. राज्य तथा समाज संबंध विचार 

लास्की ने आधुनिक समाज का विश्लेषण करते हुए कहा है कि राज्य इस तरह से शासन नहीं कर सकता कि वह समस्त समुदायों की स्वायत्तता का अन्त कर दे तथा अगर वह ऐसा करता है तो उसका पतन अवश्यम्भावी है। अपने कथन के पक्ष में लास्की ने हिटलर एवं मुसोलिनी का उदाहरण देते हुए कहा कि फासीवाद एवं नाजीवाद के पतन का प्रमुख कारण यह था कि उन्होंने राजसत्ता का विरोध करने वाले सभी समुदायों का अन्त कर दिया था। 

राज्य अधिकारों का रक्षक हैं 

लास्की राज्य को कल्याणकारी कार्यों का संचालनकर्ता मानता था। राज्य व्यक्ति के अधिकारों का संरक्षक है। लास्की के शब्दों में," राज्य अधिकारों की रक्षा करने के स्थान पर उनको मान्यता देता है तथा राज्य की विशेषता उन अधिकारों से स्पष्ट होती है जो एक युग विशेष में राज्य की तरफ से नागरिकों को प्राप्त होते हैं।"

2. लास्की के सम्प्रभुता संबंधी विचार 

लास्की ने आस्टीन के संप्रभुता सिद्धांत का खण्डन विभिन्न तर्कों के आधार पर किया है। लास्की के शब्दों में," आस्टिन का संप्रभुता सिद्धांत सैद्धांतिक रूप से तो गलत है ही अगर उसका प्रयास व्यावहारिक रूप से किया जाए तो दासता का प्रादुर्भाव हो जायेगा।" 

लास्की राज्य को सर्वोच्च संस्था नहीं मानता तथा न उसको समस्त अधिकारों का स्त्रोत ही मानता है। लास्की राज्य को कानून तथा नैतिकता से ऊपर भी नही मानता क्योंकि अगर ऐसा हो जाये तो राज्य सर्वशक्ति सम्पन्न हो जायेगा जिसमें कि व्यक्ति का विकास असंभव हो जायेगा। लास्की ने संप्रभुता के सिद्धांत का खण्डन निम्नलिखित आधार पर किया हैं-- 

1. लास्की का मत है कि संप्रभुता का सिद्धांत असत्य, भ्रामक एवं अतिश्योक्ति पूर्ण है। इतिहास में ऐसे किसी भी व्यक्ति का उदाहरण नहीं मिलता जिसने कि संप्रभुता शक्ति का असीमित एवं अनियन्त्रित प्रयोग किया हो। यहाँ तक कि टर्की का सुल्तान भी हालांकि शक्ति सम्पन्न था लेकिन उसने भी प्रथाओं तथा परम्पराओं का उल्लंघन करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।

लास्की के अनुसार," यदि राज्य को असीमित सत्ता प्रदान कर दी जाये तो हमें निर्विवाद रूप से उस निश्चित भयावह हीगलवाद को स्वीकार करना पड़ेगा जिसने बगैर किसी संकोच के हमारे समक्ष ऐसी संपूर्णता को पेश किया है जो हमसे कहीं ज्यादा हैं।" 

2. संप्रभुता का सिद्धांत नैतिक दृष्टि से भी उचित नहीं है। यह व्यक्ति की अन्तरात्मा पर कुठाराघात करता है। संपूर्ण राज्य में व्यक्ति राज्य की आज्ञाओं का पालन करने हेतु बाध्य है। इस दृष्टि से व्यक्ति सिर्फ एक साधन मात्र रह जाता है। 

लास्की कहता हैं," जिस राज्य में मेरा नैतिक विकास पर्याप्त रूप से होता हैं, मैं सिर्फ उस राज्य के प्रति भक्ति रखता हूँ, उसी के आदेशों का पालन करता हूँ। हमारा प्रथम कर्तव्य अपने अन्त:करण के प्रति सच्चा रहना हैं।" 

3. लास्की आस्टिन के इस विचार से सहमत नहीं है कि कानून सम्प्रभु के आदेश हैं। लास्की का विचार है कि कानून के कई स्त्रोत होते हैं। परम्पराएं, रीति-रिवाज कानून के मुख्य स्त्रोत हैं। फिर कानून का पालन भी दण्ड के भय से नहीं वरन् उपयोगिता के कारण किया जाता हैं। 

4. लास्की अन्तर्राष्ट्रीयता का समर्थक है एवं सम्प्रभुता को अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा मानता हैं। 

5. संप्रभुता का सिद्धांत हिंसा एवं युद्ध का जनक है जिससे साम्राज्यवाद को प्रोत्साहन मिलता हैं। 

उपर्युक्त तर्कों के आधार पर लास्की ने संप्रभुता के सिद्धांत का विरोध किया हैं। लास्की के शब्दों में," राजनीति विज्ञान के लिए यह चिरलाभ की बात होगी अगर संप्रभुता का संपूर्ण विचार ही त्याग दिया जाए।" 

3. लास्की के समानता एवं स्वतंत्रता संबंधी विचार 

लास्की स्वतंत्रता एवं समानता के अधिकार का समर्थक था। वह स्वतंत्रता एवं समानता को एक ही सिक्के के दो पहलू मानता है। उसका मत है कि हर व्यक्ति को समानता का अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

लास्की के शब्दों में," एक व्यक्ति नागरिक होने के नाते जिन अधिकारों के योग्य है, वे ही अधिकार मुझे भी उस सीमा तक प्राप्त होने चाहिए। जब तक मुझे सब लोगों के समान अधिकार प्रदान नहीं किये जाते निष्पक्षता का वातावरण तैयार हो ही नहीं सकता। 

लास्की ने राजनीतिक समानता का प्रबल समर्थन किया है। प्रत्येक व्यक्ति को राज्य के कार्यों में भाग लेने का समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए। लास्की के शब्दों में," समाज में किसी व्यक्ति को ऐसी स्थिति में नहीं रखा जायेगा कि वह अपने पड़ौसी के ऊपर इस सीमा तक छा जाये कि पड़ौसी हेतु नागरिकता की ही अस्वीकारोक्ति हो।" 

लास्की राजनीतिक समानता के साथ ही आर्थिक समानता के पक्ष में भी है। वह इन दोनों समानताओं को एक-दूसरे का पर्यायवाची मानता है। लास्की के शब्दों में," राजनीतिक समानता तक तब व्यावहारिक नहीं हो सकती जब तक नागरिकों में असल में आर्थिक समानता की स्थापना नहीं हो जाती।" 

4. लास्की के अधिकार संबंधी विचार 

लास्की ने अधिकारों की परिभाषा देते हुए कहा हैं," अधिकार वे बाह्य परिस्थितियाँ हैं जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास हेतु जरूरी हैं।" उसका यह भी मत है कि किसी राज्य की उत्तमता की कसौटी भी यही है कि वह अपने नागरिकों को कितने अधिकार प्रदान करता है। लास्की के शब्दों में," राज्य की विशेषता उन अधिकारों से स्पष्ट होती है जो एक युग विशेष में राज्य की तरफ से नागरिकों को प्राप्त हैं।" 

लास्की अधिकारों को व्यक्ति के विकास की जरूरी शर्त मानता है। उसके अनुसार," अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके अभाव में कोई व्यक्ति अपने सर्वोत्तम स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकता। लास्की की यह मान्यता है कि राज्य अधिकारों का जन्मदाता नहीं हैं अपितु वह उन्हें मान्यता प्रदान करता हैं।" 

5. राज्य की आज्ञापालन का अधिकार 

यह समस्या बहुत पुराने समय से राजनीतिज्ञों के विचारों को उद्वेलित करती रही है कि हम राज्य की आज्ञाओं का पालन क्यों करते हैं? तथा व्यक्ति को राज्य की आज्ञाओं का पालन किस सीमा तक करना चाहिए। दैवी सिद्धांत के समर्थकों ने कहा राज्य चूँकि एक दैवी संस्था हैं अतः इसकी आज्ञाओं का पालन अवश्य किया जाना चाहिए। आदर्शवादियों के अनुसार सामान्य इच्छा राज्य की आज्ञापालन का आधार है तो शक्ति सिद्धांत के समर्थक राज्य की आज्ञाओं के पालन का आधार शक्ति को मानते हैं जिनके द्वारा राज्य की आज्ञाओं का उल्लंघन करने वालों को दण्डित किया जाता हैं।

6. लोक कल्याणकारी व्यवस्था का समर्थन 

लास्की ने अपने विचारों में लोक कल्याणकारी व्यवस्था का समर्थन किया है। लास्की का मत है कि उत्तरदायी शासन व्यवस्था जो कि प्रजातंत्र में ही संभव हैं, में सरकार को लोक कल्याणकारी कार्यों को सम्पादित करना चाहिए। लेकिन लास्की शक्तियों के विकेंद्रीकरण में विश्वास करता था। 

लास्की के शब्दों मे," सरकार को जनहित के प्रति उत्तरदायी तथा ज्यादि सचेत होने के लिए जरूरी है कि सत्ता को राज्य तक सीमित न रख कर अन्य मानव समुदायों में भी फैला दिया जाये।" 

7. लास्की के समाजवादी एवं साम्यवाद संबंधी विचार 

लास्की समाजवादी विचारों का समर्थक था। लास्की ने खुद इस तथ्य को स्वीकार करते हुए लिखा हैं," मेरा अनुमान है कि मैं कुछ न कुछ अंश में अपने विद्यार्थी जीवन के अन्तिम वर्षों से ही लगातार एक समाजवादी रहा हूँ। 

लास्की श्रमिकों के उत्थान में विश्वास करता था अतः वह अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में मार्क्सवाद के प्रभाव में आ गया। वह मार्क्स के उन विचारों का प्रसंशक बन गया जो उसने अन्याय, शोषण एवं असमानता को दूर करने हेतु व्यक्त किये थे। लेकिन उसने मार्क्स के सिद्धांतों का अन्धानुकरण नहीं किया, उसने मार्क्स के कोरे भौतिकवादी सिद्धांतों का विरोध किया। वह अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत को असंगत एवं अपर्याप्त मानता है। वह हिंसा को सामाजिक जीवन हेतु अभिशाप मानता है अतः उसने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को मान्यता प्रदान नहीं की। लास्की का विचार है कि वर्तमान राज्यों की सरकारें इतनी शक्तिशाली हैं कि वे किसी भी तरह के क्रान्तिकारी आन्दोलन को कुचल देने में सक्षम हैं। यहाँ यह दृष्टव्य है कि आगे चलकर लास्की को भी यह अनुभव होने लगा की शान्तिपूर्ण संवैधानिक तरीकों से पूंजीवाद का अन्त नहीं किया जा सकता इसलिए वह भी क्रान्तिकारी साधनों में विश्वास करने लगा। लास्की ने कहा," हिंसात्मक विद्रोह के द्वारा आज तक कोई सामाजिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो पाई हैं।" 

लाॅस्की समाजवादी विचारक अवश्य था लेकिन उसका समाजवाद मार्क्सवाद से कम लोकतन्त्र से ज्यादा प्रभावित था।

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