11/01/2022

हीगल के राजनीतिक दर्शन की विशेषताएं

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हीगल के राजनीतिक दर्शन की विशेषताएं 

हीगल के राजनीतिक दर्शन की निम्नलिखित विशेषताएं हैं--

1. संवैधानिक प्रभुसत्ता

हीगल संवैधानिक प्रभुसत्ता के पक्ष में था। राज्य की तीन शाखाएं-- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका होती है। सार्वभौमिक सत्ता का प्रतीक व्यवस्थापिका होती है। यह वाद है। हीगल इसको प्रतिवाद के नाम से पुकारता है तथा एकीकरण करने वाली सत्ता को संवैधानिक राजा मानता है जिसे समन्वय के नाम से पुकारता है। संवैधानिक राजा मे ही राज्य की सार्वभौम सत्ता का निवास होता है पर राजा पर संवैधानिक नियंत्रण की स्थापना करके उसकी निरंकुशता को प्रतिबंधित करना जरूरी है। राजा को संविधान मे वर्णित अधिकारों के अनुसार कार्य करना चाहिए। उसे एक परामर्शदात्री समिति के संकेतों पर कार्य करना चाहिए तथा उसका निर्वाचन वंश, परंपरा के अनुसार किया जाना चाहिए। इस तरह हीगल को वर्तमान संसदीय प्रणाली का जनक कहा जाता है जिसमें राजा का कार्य सिर्फ हस्‍तान्‍तरण करना मात्र है जैसा कि इंग्लैंड (ग्रेट ब्रिटेन) में होता हैं।

2. पृथक्करण सिद्धांत 

हीगल ने सरकार के कार्यों को व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका तीन भागों में विभाजित करके पृथक्करण सिद्धांत को अपनाया है। न्याय का कार्य भी कार्यपालिका द्वारा किया जाता है हालांकि उसका शक्ति पृथक्करण सिद्धांत वर्तमान समय के शक्ति पृथक्करण सिद्धांत से सर्वथा भिन्न है। आजकल शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के अनुसार राज्य के तीनों भागों को पृथक-पृथक रूप से कार्य करने की स्वतंत्रता होती है पर हीगल का कहना है कि इस तरह के पृथक्करण से सरकार का काम चलना संभव नही है। इसलिए पृथक्करण सीमित होना चाहिए।

3. द्वंद्वात्मक पद्धित 

द्वंद्वात्मक पद्धित में हीगल ने विकास की प्रक्रिया के वाद, प्रतिवाद एवं संश्लेषण तीन स्तरों की व्याख्या की है और बतलाया है कि वाद प्रतिवाद को तथा प्रतिवाद संश्लेषण को एवं संश्लेषण पुनः वाद को जन्म देता है। द्वंद्वात्मक पद्धित को अपनाकर उसने यह निष्कर्ष निकाला है कि विश्वात्मा मे विकास की अंतिम अवस्था राष्ट्र है। इस पद्धित का मुख्य तत्व प्रगति है। इसी आधार पर यह कहता है कि विश्व का इतिहास विश्वात्मा के विकास का इतिहास है। इस तरह की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है। हीगल के द्वंद्वात्मक से मार्क्सवादी विद्वान प्रभावित हुए। मार्क्स की भौतिकवादी व्याख्या हीगल के द्वंद्वात्मक पर ही आधारित है।

4. राष्ट्र राज्य 

हीगल ने राज्य को सर्वोपरि माना है। राज्य के कानूनों को पालन करने मे ही वैयक्तिक स्वतंत्रता है। राष्ट्र राज्य ही सार्वभौमिक नैतिक समुदाय है। वह स्वयं साध्य है तथा व्यक्ति उस साध्य की प्राप्ति का साधन मात्र है। इस प्रकार राष्ट्र राज्य में व्यक्ति राज्य का दास बन जाता है हालांकि हीगल के राष्ट्र राज्य में राज्य तथा व्यक्ति के हितों में विभिन्नता नहीं पायी जाती। हीगल ने व्यक्ति की इच्छाओं को दो भागों में विभाजित किया हैं-- यथार्थ इच्छा एवं वास्तविक इच्छा। यथार्थ इच्छा स्वार्थपूर्ण इच्छा है तथा वास्‍तविक इच्छा सभी नागरिकों की इच्छाओं का योग है। राज्य नागरिकों की सामान्य इच्छा का प्रतिनिधि है। राज्य तथा नागरिकों के हितों में समानता होने से राज्य जो भी कार्य करता है वे नागरिकों के लिए हितकर हैं। 

5. स्वतंत्रता

स्वतंत्रता सिर्फ समाज में ही संभव है राज्य की पूर्ण आज्ञाओं का स्वेच्छा से पूर्ण रूप से पालन करना ही पूर्ण स्वतंत्रता का उपभोग करना है। स्वतंत्रता की प्राप्ति राज्य के अंदर हो सकती है। अतः समाज से पृथक रहकर राज्य का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता।

6. कर्तव्य की भावना

व्यक्ति के अधिकार चाहे जो भी हों उनका एक मात्र पवित्र कर्तव्य राज्य के द्वारा दी गयी हर आज्ञा का पालन करना हैं। 

7. युद्ध 

हीगल के अनुसार," शान्ति में भ्रष्टाचार होता है तथा अधिक दिन शांति स्थापित रहने से भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलता हैं। 

8. राज्य समुदाय का निर्माण 

राज्य सर्वोपरि है। राज्य द्वारा ही समस्त समुदायों का निर्माण होता है। समुदाय व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करने में सहायक होते है पर साथ ही साथ समुदायों का अस्तित्व राज्य की निरंकुशता का प्रतीक भी हैं।

हीगल के दर्शन का प्रभाव 

मार्क्स पर प्रभाव 

हीगल के सिद्धांत के मूल तत्व द्वंद्ववाद, राष्ट्र राज्य एवं प्रगति की धारणा है। इन तीनों धारणाओं से प्ररित होकर मार्क्स ने अपने समाजवादी दर्शन को विकसित किया था। मार्क्स का भौतिकवादी विचारों पर आधारित था। अतः कहा जाता है कि मार्क्स ने हीगल के द्वंद्ववाद के स्वरूप को उल्टा करके खड़ा किया। मार्क्स ने अपनी समाजवादी धारणा में हीगल से प्रेरणा ली है। इस क्षेत्र में दोनों विद्वानों में अंतर यही है कि हीगल का समाजवाद कल्पनावाद पर आधारित था वहीं मार्क्स ने अपने समाजवाद को एक वैज्ञानिक रूप दिया हैं।

सर्वाधिकारवाद का जनक या पिता 

हीगल सर्वाधिकारवाद का भी पिता था। मुसोलिनी ने उग्र राष्ट्रवाद का रूप, जो वह चाहता था, हीगल के दर्शन में पाया। उसने हीगल के दर्शन में देखा कि पृथ्वी पर राष्ट्रीय राज्य ईश्वर का रूप है। हीगल ने राष्ट्रीय राज्य को समस्त संस्थाओं से सर्वोच्च एवं सर्वोत्तम बताता है। उसने राष्ट्रीय राज्य को समस्त कानूनों एवं नैतिकता से भी ऊपर बताया है। उसने राज्य को साध्य एवं व्यक्ति को उसका साधन बताया हैं। व्यक्ति की स्वतंत्रता राजाज्ञा पालन करने में ही व्यक्त होती है। इस प्रकार के विचारों को लेकर ही फासीवाद, नाजीवादी एवं निरंकुश विचारों का उद्भव हुआ।

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