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4/19/2021

राष्ट्रीय आय मापने की विधियां/रीतियां

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राष्ट्रीय आय मापने की विधियां/रीतियां 

जैसा कि स्पष्ट है कि उत्पादन, आय एवं व्यय आर्थिक क्रियाओं का चक्रीय प्रवाह निर्मित करते है। उत्पादन से आय प्राप्त होती है, आय से व्यय सृजित होता है एवं व्यय से पुनः उत्पादन संचरित होता है। इन्ही आधारों पर राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया जाता है या गणना की जाती है। राष्ट्रीय आय मापने की मुख्य रीतियां या विधियां इस प्रकार है--

1. व्यय गणना रीति 

इस रीति के अंतर्गत समस्त नागरिकों द्वारा उपभोग की गई वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य ज्ञात करके इसमे समस्त बचत का मूल्य जोड़ लिया जाता है तथा यही योग राष्ट्रीय आय को सूचित करता है। राष्ट्रीय आय आँकने की यह रीति दोषपूर्ण है, क्योंकि एक तो नागरिकों द्वारा उपभोग पर व्यय की गई रकम का अनुमान कोई सरल कार्य नही है। दूसरे उपभोग व्यय के साथ-साथ बचत व्यय ज्ञात करना और भी जटिल साध्य कार्य है, तीसरे जिस देश मे अधिकांश व्यक्ति अपनी बचत को गाड़ कर रखते है, वहाँ बचत पूंजी को ज्ञात करना एकदम असंभव है।

2. उत्पादन रीति और आय रीति का मिश्रित उपयोग 

भारतीय अर्थशास्त्री डाॅ. वी. के. आर. वी. राव ने उत्पादन गणना रीति और आय गणना रीति को मिलाकर एक नई मिश्रित रीति को जन्म दिया तथा इस प्रणाली के आधार पर भारत की राष्ट्रीय आय का सफलतापूर्वक अनुमान लगाया। राष्ट्रीय आय की इस विधि का प्रयोग ऐसे देश मे उपयुक्त सिद्ध होता है, जहाँ न तो आय संबंधी समस्त आँकड़े उपलब्ध होते है और न उत्पादन संबंधी ही समस्त आँकड़े उपलब्ध होते है। 

3. सामाजिक लेखारीति 

प्रो. रिचर्ड स्पेन द्वारा प्रतिपादित इस रीति के अनुसार देश की जनसंख्या को आय के आधार पर विभिन्न वर्गों मे बाँट दिया जाता है। प्रत्येक वर्ग के कुल लोगों की आय ज्ञात कर एक औसत निकाल लिया जाता है। उनकी कुल जनसंख्या को इस अनुमानित औसत आय से गुणा कर देने पर उनकी संपूर्ण आय ज्ञात हो जाती है। इस प्रकार विभिन्न वर्गों द्वारा प्राप्त कुल आय का योग राष्ट्रीय आय होता है।

सामाजिक लेखा रीति का प्रयोग तभी संभव है, जबकि सभी वर्गों के लोग तथा संस्थायें अपनी आय का सही हिसाब-किताब रखे। अर्द्ध-विकसित देशों मे जहां इस प्रकार के हिसाब-किताब ठीक प्रकार से नही रखे जाते, इस रीति का प्रयोग सीमित रहना स्वाभाविक है।

4. परिगणना रीति अथवा उत्पादन गणना रीति

इस रीति के अंतर्गत किसी देश मे एक निश्चित अवधि के भीतर (प्रायः एक वर्ष) उत्पत्ति के साधनों द्वारा उत्पन्न की गई समस्त वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का योग ज्ञात करके उसमे से चल पूंजी की स्थान पूर्ति और अचल पूंजी का मूल्य ह्रास घिसावट और प्रतिस्थापन व्यय घटा दिया जाता है तथा जो कुछ विशुद्ध उत्पादन शेष रहता है वही राष्ट्रीय आय कहलाती है। इस रीति का मुख्य दोष यह है कि उत्पादन गणना करते समय कभी-कभी किसी वस्तु या सेवा का मूल्य दो बार जोड़ लिया जाता है। इसके अलावा इस रीति के अंतर्गत उत्पत्ति और व्यापार संबंधी आँकड़े वस्तुओं की उत्पत्ति का अनुमान करने के लिये तो उपयुक्त ठहर सकते है, परन्तु सेवाओं का मूल्य मापन इस रीति के द्वारा कोई सरल कार्य नही है।

5. अन्य गणना रीति 

इस रीति के अंतर्गत सरकार को मिलने वाली आयकर की राशि के आधार पर देश के सभी व्यक्तियों की वार्षिक आय का अनुमान लगाकर उसे जोड़ दिया जाता है। राष्ट्रीय आय आँकने की यह रीति भी दोषपूर्ण है।  एक तो यह किसी देश के सभी नागरिकों की आय के ऊपर लगाया जाता है। दूसरे जो व्यक्ति आय-कर अदा करते है, वे आय-कर से बचने हेतु अपनी आय-व्यय का झूठा, हिसाब-किताब दिखाकर अपनी आय को कम दिखाने का प्रयत्न करते है। अतएत आय-गणना रीति के आधार पर राष्ट्रीय आय का सही और वास्तविक अनुमान लगाना कठिन है।

6. व्यावसायिक गणना रीति 

इस रीति मे देश के समस्त नागरिकों की आय की गणना उनके विभिन्न व्यवसायों के आधार पर की जाती है तथा विभिन्न व्यवसायों मे लगे हुये व्यक्तियों की आय का योग ही राष्ट्रीय आय को समुचित करता है। उत्पादन गणना रीति और व्यावसायिक गणना रीति के बीच मुख्य भेद है कि प्रथम रीति मे राष्ट्रीय आय की गणना का आधार व्यवसाय और उद्योग की रीति है, जबकि दूसरी रीति मे राष्ट्रीय आय की गणना का आधार व्यवसायों मे लगे व्यक्तियों की आय है। कृषि प्रधान देश मे दूसरी रीति के द्वारा राष्ट्रीय आय की सही गणना संभव नही है, क्योंकि कृषि व्यवसायों मे संलग्न व्यक्तियों की वास्तविक आय का ठीक अनुमान नही लगाया जा सकता।

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