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4/24/2021

जल प्रदूषण क्या है? कारण/स्त्रोत, प्रभाव

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 jal pradushan arth karan prabhav;कहा जाता है कि जल ही जीवन है, जल के बिना जीवन संभव ही नही है। जल जीवमंडल मे अत्यन्तमहत्वपूर्ण तत्व है, क्योंकि एक तरफ तो यह सभी प्रकार के जीवो के लिये सर्वाधिक तथा आवश्यक तत्व है तो दूसरी तरफ यह जीवमंडल मे पोषक तत्वों के संचरण तथा चक्रण मे सहायता करता है। इसके अलावा जल, बिजली के निर्माण, नौका परिवहन, फसलो की सिंचाई, सीवेच की निपटान आदि के लिये महत्वपूर्ण होता है। ज्ञातव्य है कि जलमंडल के सम्पूर्ण जल का मात्र एक प्रतिशत ही जल विभिन्न स्त्रोतों जैसे-- भूमिगत जल, सरिता-जल, झील-जल, मृदा मे स्थित जल, वायुमण्डलीय जल आदि से मानव समुदाय के लिये सुलभ हो पाता है। 

जल प्रदूषण क्या है? (jal pradushan kise kahte hai)

प्राकृतिक जल मे किसी अवांछित बाहारी पदार्थ का प्रवेश जिससे जल की गुणता मे अवनति आती हो, जल प्रदूषण कहलाता है। 

यहां जल की गुणता से तात्पर्य जल के विभिन्न लाभदायक उपयोगों, जैसे मनुष्य तथा जन्तुओं के लिये पेयजल के रूप मे, स्वस्थ समुद्री जीवन के लिए तथा सिंचाई इत्यादि के लिए उपयुक्तता से है।

"जल मे किसी ऐसे बाहरी पदार्थ अथवा लक्षण की उपस्थिति को जल प्रदूषण कहते है जो उसके गुणों को इस प्रकार प्रभावित कर दे कि जल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाये अथवा उसकी उपयोगिता कम हो जाये।" 

यह बाहरी पदार्थ अकार्बनिक, कार्बनिक, रेडियो सक्रिय पदार्थ या कोई भौतिक कारक हो सकता है।

जल प्रदूषण के कारण अथवा स्त्रोत ( jal pradushan ke karan)

(अ) जल प्रदूषण के पाकृतिक स्त्रोत या कारण 

इसके अंतर्गत मृदा-अपरदन, भूमि स्खलन, ज्वालामुखी उद्गार तथा पौधे एवं जन्तुओं के विघटन एवं वियोजन को सम्मिलित किया जाता है। मृदा-अपरदन के कारण उत्पन्न अवसादों के कारण नदियों के अवसाद-भार मे वृद्धि हो जाती है। इस अवसाद के कारण नदियों तथा झीलों की आविलता गंदलापन मे वृद्धि हो जाती है। इसी तरह झीलो के पास भूमि स्खलन के कारण एक तरफ तो झीलों के मलबे से भराव होता है तो दूसरी तरफ झील के जल का गंदलापन भी बढ़ता जाता है।

(ब) जल प्रदूषण के मानवीय कारण अथवा स्त्रोत 

1. घरेलू बहि:स्त्राव 

जल प्रदूषण का एक कारण घरेलू कूड़ा-कचड़ा का जल मे बहाया जाना या फेंका जाना भी है। यह देखा जाता है कि जब लोग खाना पकाते है या स्नान करने है, या कपड़ो की धुलाई करते है या अन्य सफाई कार्य करते है तो ऐसा करने मे विभिन्न प्रकार के पदार्थों का उपयोग करते है, इन पदार्थों का अपशिष्ट घरेलू बहि:स्त्राव के जल मे बहा दिया जाता है। सब्जियां एवं फलों के छिलके, सड़े हुए फल एवं सड़ी हुई सब्जियां, चूल्हे की राख, फटे पुराने कपड़ों के छोटे-छोटे टुकड़े, गंदा जल इत्यादि इसके प्रमुख उदाहरण है। इसके अतिरिक्त यह भी देखा गया है कि पाॅलीथीनों मे घरेलू कूड़ा-कचरा भरकर लोग सड़क या पड़ोस की नालो या नालियों मे फेंक देते है इससे भी जल प्रदूषण होता है। घरेलू कूड़े-कचरे से युक्त बहि:स्त्राव मलिन या गंदा जल (Sullage) के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान समय मे घर मे भी बहुत से विषैले कीटनाशक पदार्थों का उपयोग होने लगा है उदाहरणार्थ चूहा मार दवाएं, जुआमार दवाएं, खटमल, मच्छर, काकरोच, मक्खी मार दवाओं आदि का उपयोग घरों मे बहुतायत के साथ किया जाने लगा है। इन विषैली दवाइयों के अपशिष्टों को जब जल के साथ बहा दिया जाता है या घरेलू कूड़े-कचड़े के साथ जल मे फेंक दिया जाता है तो जल प्रदूषण का गंभीर खतरा पैदा हो जाता है।

2. वाहितमल 

वाहितमल के अंतर्गत मुख्यतः घरेलू तथा सार्वजनिक शौचालयों से निकले मानव मल मूत्र (विशेषकर विष्ठा) का समावेश होता है। वाहितमल मे कार्बनिक तथा अकार्बनिक दोनो ही प्रकार के पदार्थ होते है जो जल की अधिकता होने पर धुली हुई अथवा निलंबित अवस्था मे रहते है। सामान्यतः ठोस मल का अधिकांश भाग कार्बनिक होता है जिसमे मृतोपजीवी तथा कभी रोग कारक (Pathogenic) सूक्ष्मजीवी भी उपस्थित रहते है। कार्बनिक पदार्थों की अधिकता से विभिन्न सूक्ष्म जीव उदाहरणार्थ, बैक्टीरिया, वाइरस, प्रोटोजोआ, शैवाल, कवक इत्यादि तीव्रता से वृद्धि करते है। इस प्रकार का दूषित वाहितमल जब मलनालों (Sewers) मे होता हुआ वि-उपचार के ही जलमार्गों मे मिलता है तो वहां गंभीर जल प्रदूषण का कारण बनता है। मल नालों के अतिरिक्त खुले स्थानों मे मनुष्य तथा पशुओं द्वारा मल त्याग से एकत्रित विष्ठा भी वर्षा के जल के साथ बहुता हुआ अंततः जल स्त्रोतों तक पहुंच जाता है। जल के इस प्रकार के प्रदूषण को जैवीय संदूषणक की संज्ञा भी दी जाती है।

3. कृषि बहि:स्त्राव 

कृषि बहि:स्त्राव भी जल प्रदूषण का एक कारण है, कृषि बहि:स्त्राव तीन रूपों मे हो सकता है--

(A) उर्वरको के उपयोग मे निरन्तर वृद्धि 

नाइट्रेट्स तथा फास्फेट्स जैसे पोषक पदार्थों द्वारा जल के अत्यधिक समृद्धिकरण से उत्पन्न स्थिति के सुपोषण की संज्ञा दी जाती है। 

वर्तमान मे जल स्त्रोतों के सुपोषण की दर मे तीव्रता से वृद्धि हुई है। इसका एक प्रमुख कारण पैदावार मे वृद्धि के उद्देश्य से आवश्यकता से अधिक उर्वरक डालने की कृषकों की सामान्य प्रवृत्ति भी है। खेतों मे डाला गया अतिरिक्त उर्वरक धीरे-धीरे जल के साथ बहकर नदियों, पोखरों तथा तालाबो मे पहुंच जाता है।

(B) कीट नाशी एवं रोगनाशक दवाइयों का उपयोग 

वर्तमान समय मे बहुत से पेस्टीसाइड्स एवं कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है और ये अवशिष्ट पदार्थ बहते हुए नालियों के जल के साथ नदी, नालों एवं अन्य जल स्त्रोतों मे मिल जाते है जिसका परिणाम यह होता है कि संपूर्ण जल क्षेत्र दूषित हो जाता है।

(C) मृदाक्षरण 

मृदा क्षरण दोषपूर्ण कृषि पद्धतियों के कारण से होता है। जब मृदाक्षरण होता है तो बहुत सी मिट्टी, नदियों, तालाबों इत्यादि जलस्रोतों मे पहुंचकर उनके तल मे कीचड़ (Mud) के रूप मे बैठ जाती है। इस प्रकार की कीचड़ मिट्टी से भी जल प्रदूषण होता है।

4. औद्योगिक बहि:स्त्राव 

अधिकांश उत्पादन संयंत्रो मे जल का भारी मात्रा मे उपयोग किया जाता है तथा इन संयंत्रो से भारी मात्रा मे अपशिष्ट पदार्थ भी बहि:स्त्राव के रूप मे निकलते है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही उद्योगो को नदियों एवं जलाशयों के किनारे स्थापित किया जाता रहा है। नदियों एवं जलाशयों के किनारे इन उद्योगों के स्थापित होने से जहां एक ओर जल की आपूर्ति आसानी से हो जाती है वही दूसरी ओर इन उद्योगों को अपना अपशिष्ट या कूड़ा-कचड़ा बहाने मे आसानी रहती है।

उत्पादन प्रक्रिया के पश्चात प्रत्येक उद्योग या कारखाने मे बहुत से अपशिष्ट बच जाते है। यह अपशिष्ट सामान्यतया नदियो या तालाबो मे ही छोड़े जाते है। अधिकांश औद्योगिक कारखानों के बहि:स्त्राव मे अनेक प्रकार के धात्विक तत्व अम्ल, लवण, क्षार, वसा, तेल इत्यादि विषैले रासायनिक तत्व विद्यमान रहते है जिनसे जल प्रदूषण की बहुत ही गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है।

5. तैलीय प्रदूषण 

विभिन्न औद्योगिक स्त्रोतो से नदी तथा अन्य जल स्त्रोतों मे तैल तथा तैलीय पदार्थो के मिलने से तैल प्रदूषण होता है। इसका एक उदाहरण अमेरिका की क्वाहोगा नदी (Cuyahoga river) है जो कि क्लीवलैंड मे होती हुई ऐरी झील (Erie Lake) मे जा मिलती है। यह नदी इतनी अधिक तैल प्रदूषित है कि एक बार इसमे आग लग गई थी। यही कारण है कि इसको ज्वलनशील नदी की संज्ञा दी जाती है। 

नदियों की अपेक्षा समुद्रो मे तैल प्रदूषण की अधिक सम्भावना रहती है। समुद्री जल का तैल प्रदूषण निम्न कारणों से होता है--

1. जलयानों द्वारा अपशिष्ट तेल के विसर्जन से।

2. तेल वाहक जलयानो की खराबी से या दुर्घटनावश।

3. तेल वाहक जलयानो मे तेल चढ़ाते या उतारते समय।

4. समुद्र के किनारे खोदे गये तेल कुओं से च्यवन (लीकेज के कारण) 

6. रेडियोऐक्टिव अपशिष्ट तथा अवपात 

पिछले कुछ दशको से विश्वभर मे विशेषकर विकसित देशो मे विभिन्न उद्देश्यों हेतु ऊर्जा प्राप्त करने के लिए परमाणुवीय (नाभिकीय) विस्फोट संबंधी प्रयोग बहुत अधिक किये जाते रहे है। इन सब प्रयोगों के दौरान अनेक रेडियोऐक्टिव अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न होते है, जिनका यदि समुचित समापन न हो तो उनसे गंभीर पर्यावरणीय प्रदूषण की संभावना रहती है।

7. तापीय प्रदूषण 

यह प्रदूषण प्रमुख रूप से विभिन्न प्रकार के उत्पादक संयंत्रो मे प्रयोग किए जाने रियेक्टरो से, वाप्ष या परमाणु शक्ति चालित संयंत्रो द्वारा होता है। इसके अतिरिक्त समुद्रों मे किए गए परमाणु विस्फोट संबंधी परीक्षणों एवं अन्तरिक्ष यानो के जल मे उतरने से भी उष्मीय प्रदूषण होता है।

8. जल प्रदूषण के अन्य कारण 

जल प्रदूषण उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ अन्य कारणों से भी होता है। ये कारण इस प्रकार है--

1. मृत शवो को बहाना, अस्थि विसर्जन करना, अधजले शवों को बहाना,

2. धार्मिक अन्ध विश्वास, 

3. साबुन लगाकर नहाना एवं कपड़े धोना, 

5. दुकानो से जूठे तथा अन्य प्रकार के कूड़ा कचरों को जल मे फेंका जाना।

जल प्रदूषण के प्रभाव ( jal pradushan ke dush prabhav)

जल प्रदूषण का प्रभाव बहुत ही खतरनाक होता है इससे मानव तो बूरी तरह प्रभावित होता ही है; जलीय पादप एवं जलीय जन्तु भी बुरी तरह प्रभावित होते है। जल-प्रदूषण से प्रमुख रूप से जलस्त्रोत, नदियाँ, झीलें, तालाब इत्यादि बहुत अधिक प्रभावित हुए है। एक अनुमान के अनुसार स्वीडेन मे लगभग 4000, कनाड़ा मे 2000, नार्वे मे 1500 और अमेरिका मे 200 झीलें बेकार हो गई है। भारत की नदियाँ एवं झीले भी जल प्रदूषण से बहुत प्रभावित है। 

एक अनुमान के अनुसार पिछले 20 वर्षो मे मछली व पादप उत्पन्न करने की सागरों की क्षमता मे 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी है। जल प्रदूषण के दुष्प्रभाव इस प्रकार है--

1. जलीय जीव जन्तुओं पर प्रभाव 

जलीय जीव-जन्तुओं पर प्रदूषित जल बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। जल प्रदूषण से जल मे काई की अधिकता हो जाती है तथा आक्सीजन की कमी हो जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार एक लीटर जल मे आक्सीजन की मात्रा इस समय मात्र 0.1 घन से. मी. रह गई है जबकि वर्ष 1940 मे यह मात्रा 2.5 घन से.मी. थी। जल प्रदूषण से प्रभावित होने वाले जन्तुओं मे मछलियां प्रमुख है। लखनऊ की गोमती नदी मे लखीमपुर चीनी मिल तथा अन्य कारखानों द्वारा छोड़े जल से नदी का जल इतना विषाक्त हो गया था कि नदी के जल के ऊपर मरी हुई मछलियां उतराती हुई दिखाई देती थी तथा मछुवारों के जाल मे मरी हुई मछलियां फंसती थी। इसी प्रकार बम्बई के हाजी अली क्षेत्र मे समुद्र तट पर लाखों की संख्या मे मरी हुई मछलियां पाई गई थी। 

2. जलीय वनस्पतियों पर प्रभाव 

जल प्रदूषण से जलजीव ही नही जल मे विद्यमान वनस्पतियां भी बुरी तरह प्रभावित होती है। ऐसा निम्न कारणों से होता है--

1. कृषि बहि:स्त्राव तथा घरो से निकला कूड़ा-कचरा जब जल मे मिल जाता है तो जल प्रदूषित हो जाता है जिससे जल शैवाल तेजी से प्रस्कुटित होने लगता है और कुछ विशेष प्रकार के पौधों को छोड़कर शेष सभी नष्ट हो जाते है। (प्रदूषित जल मे नष्ट न होने वाले पौधे है-- नीले हरित शैवाल और डाएट्स इत्यादि) 

2. प्रदूषित जल मे काई की अधिकता हो जाती है जिससे सूर्य का प्रकाश गहराई तक नही पहुँच पाता जिससे जलीय पौधे की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया और उनकी वृद्धि प्रभावित होती है। इसी प्रकार डी. डी. टी. तथा दूसरी अन्य जीवननाशी से प्रदूषित जल मे पौधों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया और उनकी वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

3. प्रदूषित जल मे प्रदूषक तत्वो के कारण जहां एक ओर जलीय पौधे नष्ट हो जाते है वही कुछ जलीय खरपतवार जैसे-- जलीय फर्न (weter fern), जलीय हाईसिंध (Hyacinth) इत्यादि की वृद्धि हो जाती है।

4. वाहित मल जल में कवक (Fungus) शैवाल, बैक्टीरिया इत्यादि तेजी से बढ़ना शुरू हो जाते है। इन्हे मल कवक (Sewage Fungus) कहते है जो जल की सतह सफेद, भूरे, लाल या पीले रंग के पिण्डों के रूप मे फैले रहते है।

3. पशु पक्षियों पर प्रभाव 

जल प्रदूषण से पशु पक्षी भी प्रभावित होते है, प्रदूषित जल को जब पशु या पक्षी पीते है तो उन्हें तरह-तरह की बीमारियां होने लगती है। इसके अतिरिक्त समुद्रों मे जब तैलीय प्रदूषण होता है तो तेल समुद्र की सतह पर उतराने लगता है जिससे विहार करने आए पक्षियों के पंख तेल से चिपचिपे हो जाते है और वे उड़ने मे अक्षम हो जाते है जिससे ऊपर से नीचे गिरकर मर जाते है।

4. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव 

प्रदूषित जल का सबसे भयंकर प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रदूषित जल के कारण प्रतिवर्ष पाँच लाख बच्चे मर जाते है, भारत मे प्रति लाख लगभग 360 व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है और सम्पूर्ण विश्व मे प्रतिवर्ष 1½ करोड़ व्यक्ति प्रदूषित जल के कारण मृत्यु का शिकार हो जाते है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट (1981) के अनुसार विकासशील देशों मे से चार मे से एक व्यक्ति को शौच की और 5 मे से 2 व्यक्तियों को शुद्ध पेय जल की सुविधा उपलब्ध है। अस्पतालों मे भर्ती होने वाले रोगियों मे से 50% रोगी ऐसे होते है जिनके रोग का कारण प्रदूषित जल होता है अविकसित देशों की स्थिति और भी बुरी है। वहां 80% रोगो की जड़ प्रदूषित जल का होना होता है।

5. जल प्रदूषण के अन्य प्रभाव 

(अ) पेयजल का अरूचिकर एवं दुर्गन्धयुक्त होना 

जल मे विद्यमान विभिन्न पदार्थों तथा सूक्ष्म जीवों के कारण पेयजल अरूचिकर हो जाता है इसके कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों के सड़ने से हाइड्रोजन सल्फाइड (H²S), अमोनिया NH¹) इत्यादि की उत्पत्ति होती है जिससे जल मे दुर्गन्ध आने लगती है।

(ब) सागरो की क्षमता मे कमी 

जल प्रदूषण से सागरो की क्षमता भी प्रवाहित हो रही है। भारत सागर तट 6,100 कि.मी. है इसमें प्रतिदिन 4-2 बिलियन गैलन मल विसर्जित होता है 1½ लाख टन डिटरजेन्ट गिरता है जिससे सागरो की दशा शोचयीन होती जाती जा रही है।

ऐसा अनुमान है कि पिछले 20 वर्षों मे मछली व पादप उत्पन्न करने की क्षमता मे 30 से 50 प्रतिशत तक कमी आई है।

(स) उद्योगों की क्षमता मे कमी 

जल प्रदूषण से औद्योगिक उत्पादन भी प्रभावित है, उदाहरणार्थ दामोदार नदी के प्रदूषित होने के कारण दुर्गापुर प्रोजेक्ट लिमिटेड की ऊर्जा इकाइयां बुरी तरह प्रभावित हो रही है, कुछ ऐसे संयंत्र केवल चार घण्टे ही चल पा रहे है जबकि उन्हें 8 घण्टे चलना चाहिए। इसी प्रकार कानपूर की चमड़ा इकाइयों से गंगा का जल बूरी तरह प्रदूषित हो गया है और उपयुक्त जल उपलब्ध न होने के कारण चमड़ा उद्योग हुआ है और उसकी क्षमता मे कमी आई है।

(द) जल शोधन पर भारी खर्च 

प्रदूषित जल को शोधित करना एक बहुत महंगा कार्य है। उदाहरणार्थ पिछले दशक मे प्रदूषित जल को शोधित करने और जललाशयों की सफाई पर अमेरिका द्वारा लगभग 90 खरब रूपये खर्च किये गये।

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