Har din kuch naya sikhe

Learn Something New Every Day.

1/02/2021

सार्वजनिक उपक्रम का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

By:   Last Updated: in: ,

sarvajanik upkram arth paribhasha visheshta;सार्वजनिक उपक्रम एवं राजकीय उपक्रम एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द है। सरकारी क्षेत्र के उद्योगो को ही सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कहा जाता है। संकीर्ण अर्थ में  सार्वजनिक उपक्रम वह है जो सरकार द्वारा संचालित किये जाते है। 

सार्वजनिक उपक्रम का अर्थ (sarvajanik upkram kise kahte hai)

लोक या सार्वजनिक उपक्रम से आश्य एक ऐसी संस्था से है जिस पर सरकार का स्वामित्व हो तथा जिसकी व्यवस्था भी राजकीय तंत्र द्वारा की जाती है। लोक उपक्रम को अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे-- राजकीय उपक्रम, सार्वजनिक उपक्रम, लोक उद्योग, जनसंस्था सरकारी उद्योग आदि। 

अन्य शब्दों मे, व्यापक अर्थ मे, सार्वजनिक उपक्रम से तात्पर्य ऐसे औद्योगिक एवं व्यावसायिक उपक्रमों से है, जिनकी स्थापना सरकार द्वारा की जाती है और सरकार द्वारा ही संचालित किये जाते अथवा जिसकी स्थापना एवं संचालन (प्रबंध) दोनो ही सरकार द्वारा किये जाते है।

सार्वजनिक उपक्रम की परिभाषा (sarvajanik upkram ki paribhasha)

एन.एन. माल्या के शब्दों मे," सार्वजनिक उपक्रम से आशय सरकारी स्वामित्व मे स्थापित और नियंत्रित ऐसी स्वशासित अथवा अर्द्ध स्वशासित निगमों और कंपनियों से है, जो औद्योगिक और वाणिज्य क्रियाओं मे संलग्न हो।" 

एस. एस. खेरा के अनुसार," सार्वजनिक उपक्रम से तात्पर्य उन समस्त औद्योगिक, व्यापारिक एवं आर्थिक क्रियाओं से है, जो केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार अथवा दोनों सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से स्वयं द्वारा या निजी उपक्रमों के सहयोग से संचालित की जाती है, बशर्ते कि इन उपक्रमों का संचालन स्वयं परिपूर्ण प्रबंध द्वारा किया जाता है।" 

इनसाइक्लोपीडिया ब्रियनिका के अनुसार," सार्वजनिक उपक्रम से आश्य एक ऐसे उपक्रम से है जिस पर केन्द्रीय, प्रान्तीय या स्थानीय सरकार का स्वामित्व होता है। ये उपक्रम के बदले वस्तुओं और सेवाओं की पूर्ति करते है तथा सामान्यता स्व-समर्पित आधार पर संचालित किये जाते है।" 

राॅय, चौधरी और चक्रवर्ती के मतानुसार," सार्वजनिक उपक्रम व्यवसाय का ऐसा स्वरूप है जो सरकार द्वारा नियंत्रित और संचालित होता है सरकार या तो उसकी स्वयं एकाकी स्वामी होती है या प्रमुख अंशधारी होती है।

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते है कि " सार्वजनिक उपक्रम के अंतर्गत वे समस्त औद्योगिक, वाणिज्यिक एवं आर्थिक उद्योग सम्मिलित होते है, जिनका स्वामित्व एवं नियंत्रण सरकार अथवा सरकार प्राधिकरण के हाथों मे होता है तथा जिनकी स्थापना एवं संचालन का उद्देश्य लोक कल्याण होता है।"

सार्वजनिक उपक्रम की विशेषताएं या लक्षण (sarvajanik upkram ki visheshta)

सार्वजनिक उपक्रम या राजकीय उपक्रम की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. सरकार का स्वामित्व 

लोक उपक्रमो का स्वामित्व सरकार अथवा किसी सार्वजनिक सत्ता के हाथों मे होता है। इनका स्वामित्व केन्द्र सरकार या राज्य सरकार या सम्मिलित रूप से केन्द्र एवं राज्य सरकार या दो से अधिक राज्य सरकारों के हाथों मे हो सकता है। सरकारी स्वामित्व का अर्थ यह नही है कि सरकार द्वारा शत-प्रतिशत पूंजी लगायी जाये। यदि सरकार द्वारा किसी कंपनी मे चुकता अंश पूंजी का कम-से-कम 51 प्रतिशत भाग लगाया जाता है, तो ऐसी कंपनियाँ सार्वजनिक उपक्रम की श्रेणी मे आयेगी।

2. वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन या आपूर्ति 

लोक उपक्रमों द्वारा ऐसी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन या आपूर्ति की जाती है, जिनका उत्पादन या आपूर्ति वैकल्पिक रूप मे निजी क्षेत्र द्वारा संभव हो। आधार पर शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कानून और न्यान हेतु सरकार की गई व्यवस्था को लोक उपक्रमों की श्रेणी मे सम्मिलित नही किया जा सकता।

3. आकार 

सार्वजनिक उपक्रमों का आकार विशाल होता है। प्रायः उनमे बड़ी मात्रा मे पूंजी विनियोजित होती है और पूंजी का बड़ा भाग सरकार द्वारा दिया जाता है। ये मुख्यतः आधारभूत उद्योगों के रूप मे लगाये जाते है, जैसे -- इस्पात उद्योग, भारी मशीनरी उद्योग आदि। इनका आकार विशाल होता है।

4. संगठन के प्रकार 

सार्वजनिक उपक्रम अपने उद्देश्यों के अनुरूप विभिन्न प्रकार से संगठित किए जा सकते है, जैसे-- विभागीय संगठन, लोक निगम, सरकारी कंपनी, सूत्रधारी कंपनी आदि। भारत मे सभी प्रकार के प्रारूप प्रचलित है, लेकिन सरकारी कंपनियों की अधिकता है।

6. कार्य क्षेत्र 

सार्वजनिक उपक्रमो का कार्य क्षेत्र स्थानीय, प्रान्तीय, राष्ट्रीय अथवा अंतराष्ट्रीय हो सकता है।

7. एकाधिकारी प्रकृति 

राष्टहित मे होने के कारण सार्वजनिक उपक्रम प्रायः एकाधिकारी संगठनों के रूप मे संचालित किए जाते है। जैसे-- भारतीय रेल, सेवा, डाक-तार विभाग, रक्षा उद्योग आदि।

8. सरकारी नियंत्रण एवं प्रबंध 

सार्वजनिक उपक्रमों का नियंत्रण और प्रबंध सरकार या किसी लोक सत्ता के हाथों मे होता है। बिना सरकारी नियंत्रण एवं प्रबंध के अर्थात् केवल सरकारी स्वामित्व के आधार पर अथवा बिना सरकारी स्वामित्व के अर्थात् सरकारी नियंत्रण एवं प्रबंध के आधार पर किसी उपक्रम को लोक उपक्रम नही कहा जा सकता। लोक उपक्रम कहलाने के लिए अधिकांश स्वामित्व के साथ-साथ नियंत्रण एवं प्रबंध भी सरकार के हाथों मे होना चाहिए।

 9. मधुर औद्योगिक संबंध 

राजकीय उपक्रमों का दृष्टिकोण निजी क्षेत्र के व्यावसायियों की तुलना मे अधिक उदार होता है। वे ऐसी प्रबंधकीय नीतियों को अपनाते है जो अनेक कर्मचारियों, उपभोक्ताओं और अन्ततः समाज के लिए हितकार है इस प्रकार सार्वजनिक उपक्रमों मे औद्योगिक संबंध सामान्यतः मधुर होते है।

10. जन-कल्याण संबंधी उद्देश्य 

सरकारी उपक्रमों का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना नही होता। यद्यपि ये उपक्रम इतना लाभ अवश्य कमाते है कि इनके कोषों की रक्षा की जा सके, किन्तु पूर्ण रूप से वाणिज्यिक आधार पर इनका संचालन नही किया जाता। मूल रूप से ये उपक्रम सामाजिक समृध्दि के लिए कार्य करते है।

11. जनता के प्रति उत्तरदायी उद्देश्य 

लोक उपक्रमों मे विनियोजित धनराशि सरकारी खजाने से आती है। अतः यह राशि " सार्वजनिक धन " होती है। जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों (संसद एवं विधानसभा सदस्यों) को इन उपक्रमों की प्रगति के विषय मे जानकारी देना आवश्यक होता है। संसद एवं विधानसभाओं मे इन उपक्रमों की प्रगति का सम्पूर्ण ब्यौरा प्रस्तुत किया जाता है।

12. आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्य 

सार्वजनिक उपक्रमों का प्रमुख उद्देश्य जनहित संरक्षण संतुलित क्षेत्रीय विकास तथा आर्थिक न्याय की प्राप्ति  होता है। 

13. प्रबंध मे अधिकारियों का महत्व 

राकीय उपक्रमों के प्रशासन एवं प्रबंध मे अनेक सरकारी प्रशासन की पद्धतियों एवं नियमों या उपनियमों का पालन सतर्कता एवं सूक्ष्मता से किया जाता है कि उनमे स्वतंत्र व्यावसायिक निर्णय लेने का साहस ही नही रह जाता है। अतः वे (राजकीय उपक्रम के प्रबंध) प्रायः इतने गतिशील, उत्साही तथा साहसी नही होते, जितने कि निजी उपक्रम होते है।

पढ़ना न भूलें; सार्वजनिक उपक्रम के उद्देश्य, लाभ, दोष

शायद यह आपके लिए काफी उपयोगी जानकारी सिद्ध होगी

कोई टिप्पणी नहीं:
Write comment

अपने विचार comment कर बताएं हम आपके comment का इंतजार कर रहें हैं।