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12/29/2020

व्यावसायिक संगठन के उद्देश्य, कार्य, क्षेत्र, महत्व या लाभ

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व्यावसायिक संगठन के उद्देश्य (vyavsayik sangathan ke uddeshya)

vyavsayik sangathan uddeshya karya kshara mahatva;प्रत्येक मानवीय क्रिया किसी न किसी उद्देश्य को लेकर की जाती है, ठीक उसी प्रकार व्यावसायिक क्रियाओं को भी निश्चित उद्देश्य को लेकर ही संपन्न किया जाता है। बिना उद्देश्य के प्रत्येक व्यवसाय की वही दिशा होती है, जो कि पतवार विहीन नौका की। उद्देश्य लक्ष्य होते है, जिनको सदैव मस्तिष्क मे रखना होता है। व्यवसायिक संगठन के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार है--

1. समय और प्रयत्नों मितव्ययिता 

समय तत्व का व्यवसाय की सफलता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। एवं यह केवल व्यवस्थित संगठन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

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2. अधिक व अच्छा उत्पादन न्यूनतम लागत पर 

अधिक व अच्छा उत्पादन कम लागत पर प्राप्त करना, अपव्ययों को रोककर उपक्रम के विभिन्न अंगों मे समन्वय स्थापित करना आवश्यक है जो व्यवसायिक संगठन द्वारा ही संभव है।

3. पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति करना 

प्रत्येक क्रिया किसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु की जाती है। व्यवसाय भी एक क्रिया है तथा इसका भी लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। व्यवसायिक संगठन के माध्यम से उन लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है। इसके लिए संगठन रूपी तंत्र बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

4. व्यवसाय की कुशलता मे वृद्धि करना 

व्यवसायिक संगठन का एक उद्देश्य व्यवसाय की कार्यकुशलता मे वृद्धि करना है, ताकि अधिक एवं श्रेष्ठ उत्पादन अथवा सेवाएं प्रदान की जा सकें।

5.  विशिष्टीकरण के लाभ प्राप्त करना 

एक श्रेष्ठ व्यवसायिक संगठन द्वारा विशिष्टीकरण को क्रियान्वित कर सही व्यक्ति का सही कार्य (रूचि के अनुसार) सौंपा जा सकता है। ऐसा करने से संस्था को विशिष्टीकरण के लाभ प्राप्त होते है।

6. श्रम तथा पूंजी के मध्य मधुर संबंधो की स्थापना 

व्यवसायिक संगठन व्यवसाय के क्षेत्र मे श्रमिक एवं पूंजी के मध्य संघर्ष के स्थान पर मधुर सम्बन्धों का होना आवश्यक है। जो एक कुशल संगठन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

7. सेवा भाव 

लाभ कमाने की भावना के साथ-साथ व्यवसाय मे सेवा-भाव की भावना को भी बढ़ाना चाहिए। आधुनिक व्यवसायिक संगठन का लक्ष्य सेवा के माध्यम से लाभ कमाना है।

 8. व्यवसाय संबंधी सैद्धान्तिक ज्ञान को सुसज्जित करना 

व्यवसाय से जीविकोपार्जन करने वाले व्यक्ति को व्यवसाय संबंधी सैद्धान्तिक ज्ञान से सुसज्जित करना व्यवसायिक संगठन का प्रमुख उद्देश्य है।

9. सामाजिक दायित्व 

व्यवसायी का कार्य केवल वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करना ही नही होता। इसके अतिरिक्त समाज के प्रति भी उनका दायित्व होता है और इस दृष्टि से उसे विनियोजक, श्रमिक, उपभोक्ता तथा समाज के प्रतिनिधि अर्थात् सरकार के हितों का पूरा ध्यान रखना चाहिए।

10. प्रभावी नियंत्रण 

व्यावसायिक संगठन का उद्देश्य विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं पर प्रभावी नियंत्रण बनाये रखना है। अधिकार, उत्तरदायित्व एवं पारस्परिक संबंधों की स्पष्ट रूप से व्याख्या हो जाने से नियंत्रण का कार्य सरल हो जाता है।

व्यावसायिक संगठन का कार्य या क्षेत्र (vyavsayik sangathan ke karya)

vyavsayik sangathan ke karya;सामान्यतः किसी व्यवसाय के निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु जिन-जिन कार्यों के करने की आवश्यकता होते है, वे सभी व्यवसाय  के क्षेत्र का निर्धारण करते है। फलतः जैसे-जैसे व्यावसायिक जटिलताएं बढ़ती जाती है, व्यवसाय का क्षेत्र भी विस्तृत होता जाता है। इस संबंध मे फ्रांस के प्रसिद्ध उद्योगपति एवं प्रशासक श्री हैनरी फेयोल ने अपनी प्रसिद्धि पुस्तक औद्योगिक एवं सामान्य प्रशासन मे स्पष्ट शब्दों मे लिखा है कि आधुनिक व्यवसाय का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत एवं व्यापक है। इसके अंतर्गत विभिन्न क्रियाओं का समावेश किया जाता है। आधुनिक व्यवसाय के क्षेत्र के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की क्रियाओं का समावेश किया जाता है। इसमे से प्रमुख क्रियाएं इस प्रकार है--

1. लेखांकन संबंधी क्रियायें 

व्यवसाय मे विभिन्न लेन-देनो का लेखा रखने के साथ-साथ लेखो का विश्लेषण करके अनेक महत्वपूर्ण सूचनाएं एकत्रित करना अति महत्वपूर्ण है। 

2. क्रय संबंधी क्रियायें 

क्रय संबंधी क्रियाओं के अंतर्गत कच्चा माल, तैयार माल व अन्य वस्तुएं खरीदना शामिल है। व्यवसायिक संगठन, क्रय विभाग के माध्यम से, क्रय संबंधी क्रियाओं को सफलतापूर्वक संपन्न करने का प्रयास करता है।

3. विक्रय एवं वितरण संबंधी क्रियाएं 

व्यवसाय मे विक्रय एवं वितरण का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण एवं कठिन होता है। प्रतिस्पर्धा के इस युग मे यह कार्य और भी अधिक महत्वपूर्ण एवं कठिन हो गया है। उत्पादन का कार्य उस समय तक पूर्ण नही माना जाता जब तक कि उत्पादित वस्तु उपभोक्ताओं के हाथो मे न पहुंच जाये। इस कार्य के लिए विक्रय-कला एवं विज्ञापन पर बल दिया जाता है। यही कारण है कि आजकल " विक्रय नियोजन एवं संगठन " व्यवसाय का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया है।

4. निर्माण क्रियायें 

निर्माण क्रियाओं से तात्पर्य है कच्चे माल को उसका रूप बदलकर अधिक उपयोगी बनाना। इस कार्य की सफलता इसकी सहयोगी क्रियाओं, जैसे-- कच्चे माल की पूर्ति, बिजली व शक्ति का प्रबन्ध, श्रमिकों की व्यवस्था आदि की कुशलता पर निर्भर करती है। इन सहयोगी क्रियाओं की कुशलता व्यवस्थित संगठन द्वारा निर्धारित होती है।

5. वित्त संबंधी क्रियायें 

प्रत्येक व्यवसाय का जीवन-प्राण उसकी पूंजी होती है। पूंजी के अभाव मे बड़ी-बड़ी फर्में हो जाती है, जैसे-- एक ग्रामीण कहावत है-- " थोड़ी जमा दुकानदार को खाये और अधिक जमा ग्राहक को खाये।" अतः प्रत्येक व्यवसाय को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके पास पर्याप्त पूंजी हो। पूंजी न तो आवश्यकता से अधिक और न आवश्यकता से कम होनी चाहिए। अति-पूंजीकरण एवं न्यून पूंजीकरण दोनों ही व्यवसाय के घातक सिद्ध होते है।

6. कार्यालय संबंधी क्रियायें 

कार्यालय संबंधी क्रियायें व्यवसाय मे है। मुख्यतः पत्र- व्यवहार, सूचनाये एकत्रित करना, फाइलिंग, समय व श्रम बचाने वाले यन्त्रों का प्रयोग करना आदि कार्य आते है। ये सब क्रियायें  व्यवसायिक संगठन के मुख्य कार्य के रूप मे की जाती है।

7. कर्मचारियों संबंधी क्रियायें 

एक व्यावसायिक संस्था के कर्मचारियों से संबंधित क्रियाओं मे उनकी भर्ती, चुनाव, पारिश्रमिक, प्रशिक्षण, पदोन्नति, श्रम-कल्याण आदि को सम्मानित किया जाता है।

8. इंजीनियरिंग संबंधी क्रियायें 

व्यवसाय की प्रारंभिक अवस्था मे उत्पादन ही स्वयं ' डिजाइनर ' होता था। कंपनियों मे कोई विशिष्ट इंजीनियरिंग विभाग नही होता था। परन्तु श्रम विभाजन, विशिष्टीकरण, वैज्ञानिक प्रबंध आदि के कारण इंजीनियरिंग कार्यों को संपादित करने के लिए एक पृथक विभाग स्थापित करने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। अतः एक चतुर एवं विशिष्ट योग्यता वाले व्यक्तियों के अधिकार मे प्रत्येक निर्माणकर्ता उद्योग मे एक इंजीनियरिंग विभाग होता है। यह विभाग उत्पादन, डिजाइन तथा प्लांट इंजीनियरिंग क्रियाओं को संपादित करता है।

व्यावसायिक संगठन का महत्व अथवा लाभ (vyavsayik sangathan ka mahatva)

vyavsayik sangathan ka mahatva;व्यवसाय किसी भी देश की समृद्धि एवं विकाशीलता का द्योतक माना जाता है। मानव जीवन को सुखमय एवं समृद्धिशाली बनाने मे व्यवसाय एवं व्यावसायिक संगठन का जितना अधिक महत्व है उतना अन्य किसी घटक का नही है। व्यवसाय एवं आधुनिक सभ्यता सह-यात्री। बेयर्स ओ. व्हीलर के अनुसार," व्यवसाय किसी भी राष्ट्र की संस्कृति मे एक प्रधान संस्था है तथा रोजगार एवं आय का मूल साधन है।" 

व्यवसायिक संगठन का महत्व या लाभ इस प्रकार है--

1.  तीव्र आर्थिक विकास 

प्रो. डाॅब के अनुसार," आर्थिक विकास की समस्या मुख्यतः वित्त की नही वरन् व्यावसायिक संगठन की है।" सुसंगठित व्यवसाय से उत्पादन, रोजगार एवं राष्ट्रीय आय मे वृद्धि होती है, देश के संसाधनों का श्रेष्ठतम व अनुकूलतम उपयोग होता है एवं आर्थिक प्रगति की गति तीव्र होती है।

2. प्राकृतिक व मानवीय संसाधनों सदुपयोग 

व्यापार, वाणिज्य तथा उद्योगों के द्वारा ही देश के प्राकृतिक संसाधनों एवं वहां की अमूल्य मानवीय सम्पदा का उपभोग संभव होता है।

3. उत्पादन मे विशिष्टता 

व्यवसाय ने ही श्रम-विभाजन यन्त्रीकरण, स्वचलन, विवेकीकरण, वैज्ञानिकन, प्रमाणीकरण, आदि तकनीकों को प्रोत्साहित किया है। इसलिए व्यवसाय के विभिन्न क्षेत्रों मे विशिष्टीकरण का प्रयोग किया जाने लगा है।

4. रोजगार के अवसरों मे वृद्धि 

मेकअलराय के अनुसार," व्यवसायिक संगठन मनुष्य की रचनात्मक शक्तियों के सद्उपयोग का श्रेष्ठतम साधन है।" व्यापार एवं उद्योग का विस्तार, नए उद्योगों की स्थापना, अंतराष्ट्रीय व्यापार मे वृद्धि, बैकिंग, बीमा, यातायात संबंधी व्यावसायिक क्रियाओं मे वृद्धि, नये रोजगारों का सृजन करती है और जतना को नये-नये अवसर प्रदान करता है।

5. उन्नत जीवन स्तर 

व्यवसाय से उत्पादन की मात्रा बढ़ती है तथा उत्पादन लागत कम होती है एवं वस्तुएं सस्ती होती है। इसलिए उपभोग भी सरल एवं सुविधाजनक हो जाता है अतः जीवन स्तर मे वृद्धि होती है।

6. राजस्व मे वृद्धि 

व्यवसाय के विकास मे राजस्व मे वृद्धि होना स्वाभाविक है। देश के विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिये सरकार को व्यावसायिक क्रियाओं से काफी राजस्व प्राप्त होता है। यह राजस्व सरकार को विभिन्न प्रकार के कर जैसे-- आयकर, संपदा कर, आबकारी कर तथा विलिध प्रकार के शुल्क, जैसे चुंगी, उत्पादन शुल्क, सीमा शुल्क आदि के रूप मे बड़ी मात्रा मे आय प्राप्त होती है।

7. गरीबी का उन्मूलन 

श्रेष्ठ व्यावसायिक संगठन मे देश मे गरीबी उन्मूलन का महत्वपूर्ण अस्त्र है। वर्तमान समय मे लगभग 50 प्रतिशत से अधिक व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे है। व्यवसायिक क्रियाएं रोजगार के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अवसर उत्पन्न करने मे सक्षम है। रोजगार के अवसरों मे वृद्धि होने से गरीबी उन्मूलन मे सहायता मिलती है।

8. सुख-सुविधाओं मे वृद्धि 

व्यवसाय के कारण लोगों को आधुनिकतम सुख-सुविधाये मिल रही है। इससे उनकी उत्पादकता व कार्यक्षमता मे भी वृद्धि हुई है।

9. संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग 

किसी देश का विकास उस देश के संसाधनों का उचित विदोहन व उपयोग करके ही संभव है। आज हमारे देश मे प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ मानवीय संसाधन भी पर्याप्त मात्रा मे है। देश के विभिन्न संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग के लिये व्यावसायिक शक्तियां ही अधिक सक्रिय भूमिका का निर्वाह कर सकती है।

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