Har din kuch naya sikhe

Learn Something New Every Day.

12/31/2020

प्रवर्तक का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, कार्य

By:   Last Updated: in: ,

प्रवर्तक का अर्थ

pravartak arth paribhasha prakar karya;वह व्यक्ति जिसके मस्तिष्क मे कंपनी के निर्माण की विचारधारा सर्वप्रथम आती है, व्यापार संबंधी अनुसंधान करता है, किसी निश्चित योजना के अंतर्गत कंपनी का निर्माण करता है, आवश्यक सामग्री एकत्रित करता है और संचालन का भार उठाता है, 'प्रवर्तक' कहलाता है। यदि सच पूछा जाये तो कंपनी के निर्माण का दायित्व इसी के कंधों पर होता है। 

अन्य शब्दों मे," प्रवर्तक उस व्यक्ति को कहते है, जो पूर्व-निश्चित उद्देश्यों के आधार पर कंपनी के निर्माण का दायित्व लेता है, अपने ऊपर समस्त जोखिम लेता है और अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाता है।

प्रवर्तक की परिभाषा (pravartak ki paribhasha)

न्यायाधीश काॅकबर्न के अनुसार," प्रवर्तक वह है, जो किसी विशेष उद्देश्य के लिए कंपनी का निर्माण करने, उसको संचालित करने तथा उक्त उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाता है।" 

पामर के अनुसार," प्रवर्तक से तात्पर्य एक ऐसे व्यक्ति से है, जो कंपनी के निर्माण की योजना बनाता है, पार्षद सीमा नियम तथा पार्षद अन्तर्नियम तैयार करवाता है, उनका पंजीयन करवाता है और प्रथम संचालकों को चुनता है, प्रारम्भिक अनुबन्धो को तय करता है और यदि आवश्यकता हो तो विवरण-पत्रिका बनवाता है और उसे प्रकाशित करने का एवं पूंजी एकत्र करने का प्रबंध करता है।" 

न्यायाधीश बोवेन के अनुसार," प्रवर्तक शब्द, सन्नियम का नही वरन् व्यवसाय का शब्द है। इस शब्द मे व्यावसायिक जगत से परिचित अनेक व्यावसायिक क्रियाओं का समावेश किया गया है, जिसके  द्वारा कंपनी अस्तित्व मे लायी जाती है।" 

लार्ड ब्लेकबर्न के अनुसार," प्रवर्तक शब्द उन व्यक्तियों को सम्बोधित करने का एक सूक्ष्म और सुविधाजनक ढंग है जो उस मशीन को चलाते है जिसके द्वारा अधिनियम उन्हें एक समामेलित कंपनी बनबाने के योग्य बना देता है।" 

लार्ड एल. जे. लिण्डले के अनुसार," प्रवर्तक शब्द का कोई निश्चित अर्थ नही है। कंपनी के संबंध मे प्रवर्तक का अर्थ प्रभावपूर्ण क्रिया से होता है, जो कंपनी तैयाय करने, प्रारम्भ करने तथा प्रचलन मे लाने के लिये आवश्यक होता है।" 

संक्षेप मे कहा जा सकता है कि प्रवर्तक व्यावसायिक अवसरों की खोज करता है। आवश्यक साधनों को जुटाता है एवं प्रारंभिक आवश्यक कार्यवाही को पूरा करके व्यवसाय को कंपनी का स्वरूप प्रदान करता है। 

प्रवर्तक के प्रकार (pravartak ke prakar)

प्रवर्तक के प्रकार इस प्रकार से है-- 

1. व्यावसायिक प्रवर्तक 

व्यावसायिक प्रवर्तक वे व्यक्ति होते है, जो कमीशन तथा स्वामित्व स्थापित करने की दृष्टि से कंपनी का प्रवर्तन करते है। ये प्रवर्तक जहाँ औद्योगिक विस्तार करते है, वही औद्योगिक इकाइयों का संयोजन भी करते है ताकि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा से बचा जा सके।

2. वित्तीय प्रवर्तक 

वित्तीय प्रवर्तक के रूप मे संस्थाएं भी कार्य करती है। ये प्रवर्तक नयी कंपनी के अंशो को खरीद लेते है तथा बाद मे उचित अवसर देखकर उन्हें बेच देते है। इस प्रकार के प्रवर्तन संबंधी कार्य से उद्योगों की वित्तीय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने मे मदद मिलती है।

3. आकस्मिक प्रवर्तक 

आकस्मिक प्रवर्तक वे होते है, जो किसी विचार विशेष से प्रेरित होकर प्रवर्तक बन जाते है। ऐसे प्रवर्तक अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ नही होते, अतः उन्हें कंपनी के प्रवर्तन मे सफलता प्राप्त होने की आशा कम ही रहती है।

4. विशिष्ट संस्थाएं 

इस प्रकार की संस्थाएं कंपनियों का प्रवर्तन करने के बाद उसे अन्य व्यक्तियों को बेच देती है। यू. के. ट्रेडिंग इस्टेट्स इंग्लैंड मे एवं भारत मे राष्ट्रीय औद्योगिक विकास निगम इसी प्रकार की संस्थाएं है।

5. इंजीनियरी फर्म या निर्माता गण 

इंजीनियरी फर्में एवं निर्मातागण भी कभी-कभी इस उद्देश्य से प्रवर्तन कार्य करते है कि प्रवर्तित कंपनियों के चालू होने पर उनके माल की खपत बढ़ जाये।

6. प्रबंध अभिकर्ता 

भारत मे अन्य संस्थाओं के अभाव मे अधिकतर प्रबंध अभिकर्तागण ही प्रवर्तन कार्य करते रहते है।

7. राजनीतिक प्रवर्तक 

राजनीतिक प्रवर्तक वे होते है, जिन्हें अपने क्षेत्र की संपूर्ण जानकारी होती है, क्योंकि वे नेता आदि होते है, अपनी इस जानकारी का उपयोग कर वे अपने क्षेत्र मे विकास की दृष्टि से वहां नये-नये उपक्रम खोलते है।

प्रवर्तक के कार्य (pravartak ke karya)

किसी नये व्यावसायिक उपक्रम की स्थापना की संभावनाओं की खोज करने से लेकर अंतिम रूप मे उस संभावना को कार्य रूप मे परिणित कर देने तक के समस्त कार्य प्रवर्तक के कार्य होते है। एक प्रवर्तक कंपनी के प्रवर्तन व निर्माण से संबंधित निम्म कार्यों को करता है-- 

1. व्यावसायिक सुअवसरों की खोज एवं चांज संबंधी कार्य 

(अ) कंपनी के निर्माण की कल्पना करना अथवा व्यावसायिक सुअवसरों की खोज तथा जांच करना।

(ब) प्रवर्तन का कार्यक्रम तैयार करना।

(स) आवश्यकतानुसार विशेषज्ञों से सलाह लेना और उनकी रिपोर्ट प्राप्त करना।

2. साधनों के संकलन संबंधित कार्य 

(अ) प्रथम संचालकों के रूप मे कार्य करने तथा सीमानियम पर हस्ताक्षर करने के लिए व्यक्तियों का चुनाव करके उनकी लिखित सहमति प्राप्त करना।

(ब) यदि कंपनी का निर्माण किसी चालू व्यवसाय को क्रय करने के लिये किया जा रहा है तो विक्रेता से प्रारंभिक अनुबंध करना।

(स) कंपनी का नाम, पंजीयित कार्यालय का स्थान, कंपनी के उद्देश्य, उसकी अधिकृत पूंजी तथा उसकी सीमा व स्वरूप निश्चित करना।

(द) पार्षद सीमानियम, अन्तर्नियम तथा अन्य आवश्यक प्रलेखों को तैयार करना।

(य) कंपनी के लिए अध्यक्ष, बैंकर्स, अंकेक्षक, सचिव, कानूनी सलाहकार तथा दलालों आदि की नियुक्ति की व्यवस्था करना।

(र) प्रारंभिक खर्चों के भुगतान की व्यवस्था करना।

(ल) कंपनी के लिए भूमि, भवन, मशीनरी, कच्चा माल आदि की व्यवस्था करना तथा विक्रेताओं से प्रारम्भिक अनुबन्ध करना।

3. वित्त व्यवस्था संबंधी कार्य 

(अ) कंपनी के लिए अधिकृत पूंजी का निर्धारण करके पूंजी निर्गमन नियन्त्रक से अनुमति प्राप्त करना यदि आवश्यक हो।

(ब) पूंजी के निर्गमन की व्यवस्था करना।

(स) प्रविवरण तैयार करना और उसके प्रकाशन व विज्ञापन की व्यवस्था करना।

(द) मान्य स्कंध विपणियों मे अंशों के सूचियन हेतु स्कंध विपणि की सदस्यता प्राप्त करने के लिए आवेदन पत्र देना।

(य) न्यूनतम विक्रय राशि का निर्धारण करना।

(र) अंशों एवं ॠणपत्रों के विक्रयार्थ अभिगोपकों से अभिगोपन अनुबन्ध।

4. कंपनी के समामेलन संबंधी कार्य 

(अ) कंपनी मे पंजीयन हेतु राजिस्ट्रार के पास फाइल किये जाने वाले समस्त प्रपत्रों को तैयार करना।

(ब) राजिस्ट्रार के यहाँ समस्त प्रपत्रों को फाइल करना तथा आवश्यक पंजीयन शुल्क जमा करना।

(स) राजिस्ट्रार से समायोजन का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना।

(द) व्यवसाय प्रारंभ करने के पूर्व व्यवसाय प्रारंभ करने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना।

शायद यह आपके लिए काफी उपयोगी जानकारी सिद्ध होगी

कोई टिप्पणी नहीं:
Write comment

अपने विचार comment कर बताएं हम आपके comment का इंतजार कर रहें हैं।