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12/23/2020

उत्पादन का अर्थ, परिभाषा, प्रकार या विधियां

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उत्पादन का अर्थ (utpadan kise kahte hai)

साधारण बोलचाल की भाषा मे उत्पादन का अर्थ वस्तु या पदार्थ का निर्माण करना होता है, पर विज्ञान हमे यह बताता है कि मनुष्य न तो किसी वस्तु का निर्माण कर सकता है और न ही उसे नष्ट कर सकता है। मनुष्य केवल वस्तु का रूप बदलकर या अन्य किसी तरीके से वस्तु को उपभाग योग्य बना सकता है। इस प्रकार कुछ अर्थशास्त्री, जैसे मार्शल आदि उत्पादन का अर्थ उपयोगिता का सृजन लागते है। वस्तु मे उपयोगिता का सृजन करना ही उत्पादन है, ऐसा कुछ अर्थशास्त्री मानते है।

उत्पादन को यदि केवल उपयोगिता मे वृद्धि ही माना जाये तो भी गलत होगा, क्योंकि " उपयोगिता मे सृजन " या " उपयोगिता " मे वृद्धि के ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते है, जिन्हें उत्पादन कहना हास्यास्पद होगा। उदाहरण के लिये प्यासे को पानी देकर " उपयोगिता मे वृद्धि " की जा सकती है, किन्तु किसी को पानी दे देना आर्थिक अर्थ मे उत्पादन नही हो सकता इसीलिए अधिकांश आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, केवल " उपयोगिता का सृजन या वृद्धि उत्पादन मे नही है, बल्कि उसके साथ ही विनिमय मूल्य का सृजन या उसमे वृद्धि भी आवश्यक है।" 

इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि वस्तु मे आर्थिक उपयोगिता का सृजन या वृद्धि करना ही उत्पादन है।

उत्पादन की परिभाषा (utpadan ki paribhasha)

मार्शल के अनुसार ", मानव इस संसार मे अधिक से अधिक इतना अवश्य कर सकता है वह पदार्थ की पुर्नव्यवस्था कर दे जिससे वे पहले से अधिक उपयोगी हो सकें।

फेयर चाइल्ड के अनुसार, " धन मे उपयोगिता का सृजन करना ही उत्पादन है।" 

मेयर्स के अनुसार ", उत्पादन कोई भी वह क्रिया है, जिसका परिणाम विनिमय हेतु वस्तुएं एवं सेवाएं होती है।

निकलन के अनुसार," उत्पादन अधिक उपयोगिता का सृजन करना ही है।

रोशर के अनुसार," व्यापक अर्थ मे उत्पत्ति शब्द से हमारा अभिप्राय नवीन माल निर्माण करने से है-- नवीन उपयोगिता की खोज का वर्तमान मे उपलब्ध मालों मे परिवर्तन या स्थान्तरण से उपयोगिता का आविर्भाव हो जाता है।" 

टामस के शब्दों मे," वस्तु के अर्थ-सृजन करना या मूल्य मे वृद्धि करना ही उत्पत्ति कहलाता है।" 

पेन्सन के शब्दों मे, उत्पत्ति का अर्थ किसी पदार्थ का निर्माण से न होकर वस्तु की मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की तृप्ति करने की योग्यता, शक्ति या गुण मे वृद्धि करने से है।" 

ऐली के अनुसार, " आर्थिक उपयोगिता का सृजन करना ही उत्पादन है।

उत्पादन का अर्थ इस एक उदाहरण से अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। एक बढ़ई लकड़ी को काट-छाँटकर सुन्दर सी टेबल बनाता है तो यहाँ पर बढ़ई ने किसी नये पदार्थ का निर्माण नही किया है वरन् जंगल मे पड़ी लकड़ी को अपने प्रयत्नों से अधिक उपयोगी बनाया है। इस प्रकार उत्पादन का तात्पर्य उपयोगिता का सृजन करना या उपयोगिता मे वृद्धि करना है।

उत्पादन के प्रकार या रूप या तरीके अथवा उपयोगिता सृजन की रीतियां या विधियां

उत्पादन मे वृद्धि या उत्पादन की निम्न विधियां इस प्रकार है--

1. स्थान परिवर्तन द्वारा उत्पादन 

किसी वस्तु को ऐसे स्थान से, जहां उसकी आवश्यकता तथा तुष्टिगुण कम है, हटाकर ऐसे स्थान पर ले जाना जहाँ उसकी आवश्यकता अधिक है अथवा जहाँ उसकी तुष्टिगुण अधिक है, स्थान परिवर्तन द्वारा उत्पादन कहलाता है, जैसे-- किसी नदी या जल स्त्रोत का पानी जिसका वहां कोई मूल्य नही है, रेगिस्तान मे ले जाया जाये तो वहां जल के तुष्टिगुण मे वृद्धि हो जाती है। इसी प्रकार रेत को नदी तट से शहर मे भवन-निर्माण के लिये ले जाना स्थान परिवर्तन द्वारा उत्पादन कहलाता है। 

2. रूप मे परिवर्तन द्वारा उत्पादन 

वस्तुओं के रूप मे परिवर्तन करके जब उनके तुष्टिगुण मे वृद्धि की जाती है तो उसे रूप-परिवर्तन द्वारा उत्पादन कहते है, जैसे-- एक बढ़ई लड़की के टेबिल, कुर्सी आदि बनाकर लड़की के रूप मे परिवर्तन करता है और उसके तुष्टिगुण मे वृद्धि कर देता है। इसी प्रकार मिट्टी से ईंटों तथा लोहे से मशीन बनाकर रूप परिवर्तन द्वारा उत्पादन किया जाता है।

3. समय परिवर्तन द्वारा उत्पादन 

किसी वस्तु को कुछ समय तक बचाकर (संचय करके) उसके तुष्टिकरण मे वृद्धि करने को समय परिवर्तन द्वारा उत्पादन कहते है। कुछ वस्तुएं विशेष समय या ॠतु मे बहुत उत्पन्न होती है, जैसे-- अनाज, आलू आदि। इनका भविष्य के लिये करने से उनका तुष्टिगुण बढ़ जाता है। इसी तरह गुड़, चावल, शराब, पुराने होने पर अधिक उपयोगी हो जाते है।

4. अधिकार परिवर्तन द्वारा उत्पादन 

किसी वस्तु को उस व्यक्ति के अधिकार मे पहुंचाना जो उससे अधिक तुष्टिगुण प्राप्त कर सके अधिकार परिवर्तन द्वारा उत्पादन कहलाता है। व्यापारी, आढ़तियों और दलाल वस्तुओं मे इसी प्रकार से तुष्टिगुण बढ़ाते है, क्योंकि एक व्यापारी के लिये अनाज का उतना तुष्टिगुण नही है जितना कि उपभोक्ता के लिये। जब वह अनाज को उपभोक्ता के लिये बेचता है तो वह उसका तुष्टिगुण बढ़ा देता है। 

5. ज्ञान मे वृद्धि द्वारा उत्पादन 

उपभोक्ताओं को वस्तु के तुष्टिगुण का ज्ञान कराना ताकि वे उसकी आवश्यकता को पहले से अधिक अच्छी प्रकार से समझने लगें, ज्ञान की वृद्धि द्वारा उत्पादन कहलाता है, जैसे-- विज्ञापन कार्य भी उत्पादन- कार्य है क्योंकि इसके द्वारा वस्तुओं के तुष्टिगुण के संबंध मे हमारा ज्ञान बढ़ता है। अध्यापक विद्यार्थियों को आवश्यक वस्तुओं के विषय मे ज्ञान प्रदान करके ज्ञान वृद्धि उत्पादन करते है।

6. सेवा द्वारा उत्पादन 

जब कोई मनुष्य शारीरिक या मानसिक या दोनो प्रकार से सेवा करके किसी अन्य मनुष्यों मे उसके कार्य करने की योग्यता या क्षमता बढ़ाता है तो यह सेवा का कार्य सेवा द्वारा उत्पादन कहलाता है, जैसे-- घरेलू सेवक, अध्यापक, डाॅक्टर, वकील आदि। नाचने-गाने अभिनय करने वाले अपनी-अपनी कलाओं मे प्रदर्शन से दर्शकों का मनोरंजन करते है जिससे दर्शक अपनी मानसिक तथा शारीरिक थकान को भूलकर फिर से अपना कार्य अधिक उत्साह सेव करने योग्य हो जाते है।

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