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12/31/2020

कंपनी के गुण एवं दोष

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संयुक्त स्कन्ध कंपनी के गुण या लाभ 

कंपनी के गुण या लाभ इस प्रकार है--

1. सीमित दायित्व 

यह इसकी विशेषता भी है और एक गुण भी है। गुण इसलिए है कि इसके कारण सदस्यों या अंशधारियों का व्यक्तिगत जोखिम अंशो मे निवेशित राशि तक ही रहता है। 

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2. अंशो की हस्तान्तरणीयता 

अंशधारियों को उनके द्वारा धारित अंशों को बेचने का अधिकार होता है। इस प्रकार खरीदने वाला व्यक्ति उनके स्थान पर कंपनी का सदस्य बन जाता है।

3. निरन्तरता की क्षमता 

अंशो की हस्तान्तरणीयता के कारण अंशो का क्रय-विक्रय होता है। सदस्यों का आना-जाना लगा रहता है,  किन्तु इस सबसे कंपनी की निरन्तरता पर कोई आँच नही आती है।

4. विकास की क्षमता 

विपुल वित्तीय एवं प्रबन्धकीय संसाधनों के आधार पर कंपनी विकास एवं विस्तार की क्षमता रखती है।

5. सुदृढ़ वित्तीय शक्ति 

अंशधारी भारी संख्या मे कंपनी के अंशो मे निवेश करते है। अतः कंपनी के पास वित्तीय साधनों का पर्याप्त भण्डार बना रहता है। आवश्यकता होने पर वह अतिरिक्त अंशों का निर्गमन करके एवं ऋण लेकर भी वित्तीय-स्थिति मे सुधार कर सकती है।

6. ॠण प्राप्त करने की क्षमता 

कंपनी के पास अपनी स्वयं की पर्याप्त स्वामिपूंजी होती है जिनके बल पर वह अनेक प्रकार की परिसम्पत्तियों के ढ़ांचे का निर्माण करती है। इनकी जमानत पर उसे ॠण प्राप्त करने मे कोई कठिनाई नही होती है। बन्धकपत्रों एवं बाण्डों का निर्गमन करके वह ऋणपूंजी प्राप्त कर लेती है, क्योंकि वित्तीय संस्थाओं का विश्वास उसे प्राप्त हो जाता है। इनके अतिरिक्त दीर्घकालीन ऋण भी इसे सरलता से प्राप्त हो जाता है।

7. केन्द्रीकृत प्रबंध 

आवश्यक नीति संबंधी मामलों पर शीघ्र निर्णयन के लिये समय-समय पर निदेशक मण्डल की मीटिंग होती रहती है। पूर्वानुमान, आयोजन, नियंत्रण एवं समन्वय आदि के लिये नीति संबंधी निर्णय संबंध के उच्च स्तर पर ही किये जाते है। मध्य एवं निचले स्तरों पर पेशेवर प्रबंधकों द्वारा उनका परिचालन किया जाता है।

8. बाजार पर मजबूत पकड़ 

अपनी साख एवं सुदृढ विक्रय व्यवस्था के आधार पर प्रायः कंपनियाँ विस्तृत बाजार पर अपनी पकड़ बना लेती है। 

9. सस्ते एवं गुणवत्ता वाले उत्पाद 

अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी तथा विशाल स्तर पर, उत्पादन के आधार पर प्रायः कंपनियां उपभोक्ताओं को सस्ते एवं गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध कराने मे सफल रहती है। 

कंपनी के दोष या सीमाएं 

कंपनी के दोष या सीमायें इस प्रकार है-- 

1. निर्माण कठिन 

कंपनी का निर्माण सरलता से नही होता। कंपनी की स्थापना एवं समापन मे अनेक वैधानिक औपचारिकताओं का समाना करना पड़ता है। समय एवं धन जुटाना भी कठिन होता है। अतः छोटे पैमाने के उद्योग हेतु यह आवश्यक नही है।

2. अनुत्तरदायी प्रबंध व्यवस्था 

कंपनी संगठन के अंशधारियों की संख्या अधिक होने के अतिरिक्त वे दूर-दूर के क्षेत्रों मे रहते है, इसलिए कंपनी का प्रबंध व संचालन अंशधारियों द्वारा न किया जाकर वेतनभोगी संचालकों द्वारा किया जाता है। इन संचालकों एवं अन्य पेशेवर प्रबंधकों को तो निश्चित वेतन एवं सुविधायें मिलती रहती है, कंपनी के लाभों एवं हानियों का उन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नही पड़ता है, अतः वे रूचिपूर्वक, निष्ठा तथा लगन से कार्य नही करते है। 

3. अंशो मे सट्टेबाजी 

साधारणतया कंपनी के अंशो के स्वतंत्र हस्तान्तरण पर प्रतिबंध नही होता है। अतः कोई भी व्यक्ति स्कन्ध विनिमय केंद्र से अंशो का क्रय-विक्रय कर सकता है। इन केन्द्रों पर सटोरिये अफवाहें फैलाकर अंशो मे मूल्यों मे वृद्धि अथवा कमी कराने मे सफल हो जाते है तथा सट्टे द्वारा लाभ कमाते है। दूसरी ओर कंपनी के अंशो का मूल्य पिछले वर्ष की लाभांश दर से भी घटता-बढ़ता रहता है। फलस्वरूप अंशो के क्रय-विक्रय मे सट्टेबाजी को प्रोत्साहन मिलता है। इस कारण सामान्य विनियोजकों को अनावश्यक रूप से हानि उठानी पड़ती है।

5. एकाधिकार का भय 

अनेक अवसरों पर एक ही प्रकार का व्यवसाय करने वाली कंपनियां आपस मे मिलकर संयोजन स्थापित कर लेती है। इस कारण उनके मध्य प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है तथा एकाधिकार की स्थिति पनपने लगती है, जिससे उपभोक्ताओं का शोषण होने लगता है।

6. अंशधारियों का शोषण 

चूंकि कंपनी के समस्त अंशधारी प़त्यक्ष रूप से कंपनी के संचालन एवं प्रबंध मे भाग नही लेते अतः कुछ चुने हुए सदस्य ही संचालक के रूप मे कार्य करते है। व्यक्ति कंपनी मे अपनी मनमानी नीतियां लागू करके कंपनी के अंशधारियों का शोषण करते है। एक ओर कंपनी के संचालक बड़े-बड़े वेतन एवं सुविधायें प्राप्त करते है दूसरी तरफ अंशधारियों को बहुत कम लाभांश वितरित करते है।

7. केन्द्रीय संचालन एवं प्रबंध 

प्रजातंत्रीय प्रबंध व्यवस्था के नाम पर कंपनी संचालन तथा प्रबंध का कार्य कुछ गिने-चुने व्यक्तियों के हाथों मे ही केन्द्रित रहता है। चूंकि ये व्यक्ति उच्च पदों पर पदासीन होते है, अतः इनके हितों की रक्षा नही हो सकती।

8. प्रवर्तकों द्वारा कपट

कंपनी के निर्माण संबंधी समस्त कार्य प्रवर्तकों द्वारा किया जाता है। हालांकि प्रवर्तकों को कंपनी के निर्माण मे अनेक प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे धोखाधड़ी भी करते है। कंपनी का पंजीयन हो जाने पर ये कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को हथिया कर छल-कपट द्वारा अपने निजी स्वार्थों के लिए कंपनी का शोषण करते है।

9. बड़े पैमाने पर उत्पादन की बुराइयाँ 

कंपनी संगठन बड़े पैमाने पर किया जाने वाला व्यवसाय है। इसके फलस्वरूप प्रबंध मे शिथिलता, साधनों का दुरूपयोग, समन्वय की समस्या आदि बुराइयां जन्म ले लेती है।

शायद यह आपके लिए काफी उपयोगी जानकारी सिद्ध होगी

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