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12/25/2020

संगठन का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य, महत्व एवं संगठनकर्ता के कार्य

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संगठन का अर्थ (sangathan kya hai)

sangathan meaning in hindi;जब कभी दो या से अधिक व्यक्ति किसी उपक्रम के साथ-साथ कार्य करते है, तो इन व्यक्तियों के मध्य कार्य को बांटने की आवश्यकता होती है। इसी का नाम "संगठन" है।

अंग्रेजी भाषा के शब्द " Organizations " की उत्पत्ति " Organism " से हुई है, जिसका आश्य देह के ऐसे टुकड़ों से है, जो परस्पर इस प्रकार संबंधित है कि एक पूर्ण इकाई के रूप मे कार्य करते है। जिस तरह मावन शरीर की समस्त कार्यवाही का संचालन मानव मस्तिष्क द्वारा होता है, उसी प्रकार एक व्यावसायिक संस्था भी विभिन्न विभागों मे विभक्त होती है। जैसे-- क्रय, वित्त, कर्मचारी आदि विभाग। इस तरह " संगठन " वास्तव मे वह तंत्र है, जो लोगों मे एक साथ रहने की सामर्थ्य पैदा करता है।

संगठन की परिभाषा (sangathan ki paribhasha)

संगठन एक अत्यंत विस्तृत शब्द है, अतः इसकी कोई एक ऐसी परिभाषा देना कठिन है, जो सर्वमान्य हो। विभिन्न विद्वानों ने संगठन की विभिन्न परिभाषाएं दी है, इनमें से कुछ इस प्रकार है--

पो. हैन के अनुसार," किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिये उत्पादन के साधन को सर्वोत्तम ढंग से समायोजित करने के कार्य को संगठन कहा जाता है।" ।

जी. ई. मिलवाई के अनुसार," कार्य और कार्मचारी समुदाय का मधुर संबंध संगठन कहलता है।" 

प्रो. बाई के शब्दों मे," व्यावसायिक उपक्रम का सारा कार्य एक प्रकार का श्रम है। यह आय तथा धन प्राप्त करने के लिये किया गया मानसिक प्रयास है। यह अन्य प्रकार के श्रम से भिन्न श्रम है, क्योंकि इसमे विशेष विद्यमान रहते है।" 

लैस्बर्ग एवं स्प्रीगल के शब्दों मे," संगठन किसी उपक्रम के विभिन्न घटकों के बीच संरचनात्मक संबंध होता है।" 

मैक्फारलैण्ड के अनुसार," संगठन का आशय निर्दिष्ट व्यक्तियों के उस समूह से है जो उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये अपने प्रयत्नों का योगदान है।" 

उर्विक के अनुसार," संगठन का अर्थ ' यह निर्धारित करना है कि किसी उद्देश्य या योजना को प्राप्त करने के लिए क्या-क्या क्रियाएँ करनी आवश्यक है तथा इनको ऐसी श्रेणियों मे विभाजित करना है जिन्हें अलग-अलग व्यक्तियों मे सौंपा जा सके।"

उक्त परिभाषाओं के अध्ययन के बाद संगठन की एक उपयुक्त परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है," संगठन एक ओर उत्पादन के विभिन्न उपादानों को एकत्र करके काम पर लगाना तथा उनके बीच ऐसा सहयोग एवं सामंजस्य स्थापित करना है कि वे उत्पादन मे अपना अधिकतम योग दे सके, तथा दूसरी ओर कार्यरत व्यक्तियों के मध्य मधुर संबंध स्थापित कर सकें।" 

संगठन का महत्व (sangathan ka mahatva)

वर्तमान विज्ञान तथा टेक्नालॉजी के युग मे तो संगठन का महत्व और भी बढ़ता ही जा रहा है। किसी भी विभाग या कारखाने की सफलता उसमे कार्यरत कर्मचारियों की तुलना मे उनसे काम निकालने की क्षमता, उनका प्रोपर उपयोग तथा उनमे उत्तरदायित्व बढ़ाने की भावना पर ज्यादा निर्भर है। पश्चिमी देशों मे संगठन को शुरू से ही महत्व दिया जाता रहा है। अमेरिका मे एक कथन प्रचलित है-- एक फर्म के संचालक ने कहा " हमारा धन, संपत्ति तथा सारी सामग्री ले लो," केवल हमारा संगठन हमारे पास रहने दो। कुछ ही समय मे हम पुनः अपनी संपत्ति यथावत् खड़ी कर लेंगे।" वास्तव मे संगठन ही प्रबंध की आधारशीला है। संगठन का महत्व निम्म बातों से स्पष्ट होता है-- 

1. संगठन से प्रबंधकीय क्षमता मे वृद्धि होती है।

2. विभिन्न क्रियाओं मे संतुलन बना रहता है। 

4. विकास की गति बढ़ाई जा सकती है।

5. उचित संगठन व्यवस्था से धन एवं समय दोनों की बर्बादी रूकती है।

संगठन के उद्देश्य (sangathan ke uddeshya)

सभी व्यावसायिक उपक्रमों मे संगठन के प्रायः निम्म उद्देश्य होते है--
1. पारस्परिक नियंत्रण 
संगठन के द्वारा एक वर्ग, दूसरे वर्ग की क्रियाओं पर नियंत्रण भी रखता है, जिससे मनमानेपन को कोई स्थान नही रहता है।
2. उचित कार्य प्रविधियों की स्थापना 
संगठन के कारण कार्य की उचित प्रविधियों की स्थापना एवं उनके अनुसार आचरण संभव हो सकता है।
3. समय और प्रयत्नों मे मितव्ययिता 
उत्पादन मे मितव्ययिता के साथ संगठनकर्ता समय और प्रयत्नों मे भी मितव्ययिता प्राप्त करने का प्रयास करता है।
4. श्रम एवं पूंजी के मध्य मधुर संबंधों की स्थापना 
संस्था के प्रबंधक श्रम एवं पूंजी के मध्य संघर्ष के स्थान पर मधुर संबंधों की स्थापना करने का प्रयास करते है।
5. सेवा भावना जाग्रत करना 
प्रत्येक व्यावसायिक संस्था लाभ कमाने के लिए ही स्थापित की जाती है परन्तु प्रभावशाली संगठन मे लाभ कमाने के साथ ग्राहकों तथा समाज के प्रति सेवा भावना पर भी बल दिया जाता है।
6. उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करना 
उपक्रम के दीर्घकालीन एवं अल्पकालीन सभी प्रकार के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भी संगठन की व्यवस्था की जाती है। संगठन मे कार्यरत सभी व्यक्ति आपस मे मिलकर साधनों का इस प्रकार से उपयोग करते है कि वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति बिना किसी कठिनाई के हो जाती है। उपक्रम संगठन की ओर अग्रसर होता है।
7. समाज का जीवन-स्तर ऊंचा उठना
संगठन साधनों का सदुपयोग करके हमेशा सस्ता और अच्छा उत्पादन करता है जिससे समाज के लोगों को कम मूल्य पर ही सस्ती और अच्छी वस्तुएं प्राप्त होती है। इससे समाज का जीवन-स्तर ऊंचा उठता है।
8. न्यूनतम लागत पर उत्पादन करना 
न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करना ही संगठन का आधारभूत उद्देश्य होता है। संगठन मे कार्य करने वाले व्यक्ति साधनों का इस प्रकार उपयोग करते है कि साधनों का अपव्यय रूकता है और लागतों मे कमी आती है। 
9. कार्य-क्षमता मे वृद्धि 
श्रेष्ठ संगठन के द्वारा प्रत्येक कर्मचारी की कार्य-क्षमता मे वृद्धि होती है, क्योंकि वह कार्य के उचित विभाजन पर जोर देता है।
10. विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन 
रूचि एवं योग्यता के अनुसार कार्य के आवंटन तथा बारंबार उसी को करते रहने से विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन देना भी संगठन का उद्देश्य है।

संगठनकर्ता के कार्य (sangathankarta ke karya)

सामान्यतः संगठन कार्य उत्पादन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने, उत्पादन की मात्रा मे वृद्धि करने लागत को न्यूनतम बनाये रखने आदि उद्देश्य से किये जाते है। संगठकर्ता किसी भी उद्योग का सेनापति होता है। उसका कार्य उत्तदायित्वपूर्ण एवं जटिल होता है। एक संगठनकर्ता के निम्म कार्य है--

1. उत्पादन की सुव्यवस्थित योजना बनाना 

सबसे पहले संगठनकर्ता संपूर्ण कार्य की प्रारंभ से अंत तक सुव्यवस्थित योजना बनाता है। वह यह निश्चय करता है कि वह किसी वस्तु का, कितनी मात्रा मे, किस प्रकार से उत्पादन करे? इस बात का निर्णय मांग तथा फैशन आदि को देखकर किया जाता है। इस प्रकार वह व्यवसाय का चयन करके उसकी योजना तैयार करता है।

2. उत्पत्ति के विभिन्न साधनों को यथेष्ट मात्रा मे जुटाना 

उत्पादन योजना बनाने के बाद वह उत्पादन के विभिन्न आवश्यक उपादानों को एक स्थान पर जुटाता है और इस संबंध मे कार्य करने की शर्तों व पारिश्रमिक आदि बातों को तय करता है।

3. उपादानों मे अनुकूल स्थापित करना 

संगठकर्ता प्रतिस्थापन के नियम की सहायता से विभिन्न साधनों को आदर्श अनुपात मे जुटाता है जिससे कम व्यय पर अधिक उत्पादन हो सके।

4. उत्तम कच्चे माल व उत्तम मशीनों की व्यवस्था करना 

संगठनकर्ता उत्पादन कार्य के लिये आवश्यक कच्ची सामग्री उचित मात्रा मे समय पर तथा उचित मूल्य पर जुटाने की व्यवस्था करता है। वह व्यवसाय की प्रकृति के अनुसार नवीनतम मशीनों व औजारों का प्रबंध करता है। वह मशीनों की मरम्मत आदि का भी प्रबंध करता है।

5. श्रमिकों को योग्यतानुसार कार्य देना 

संगठकर्ता श्रमिकों को उनकी योग्यता एवं शक्ति के अनुसार कार्य बांटता है और उनके कार्य की देखरेख करता है।

6. व्यवसाय संबंधी अनुसंधान 

संग़ठनकर्ता व्यवसाय के संबंध मे वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा नयी-नयी खोज करता है जिससे उत्पादन कार्य मे सुधार की संभावना बढ़ती है। 

7. वस्तु की मांग मे वृद्धि करना 

उत्पादित माल की बिक्री व माल की बिक्री हेतु विज्ञापन व ऐजेन्टों आदि का प्रबंध करता है तथा अपनी उत्पादित वस्तु के लिये बाजार मे मांग उत्पन्न करता है।

8. उपोत्पादन को काम मे लाना 

संगठनकर्ता उत्पादन कार्य मे बचे उपोत्पादन को भी उचित प्रयोग मे लाने या उसे बेचने की व्यवस्था करता है। उदाहरणार्थ-- चीनी बनाने के कारखाने मे बचे हुए शीरे को काम मे लाना आवश्यक है।

9. साहस और जोखिम उठाने का कार्य 

जब संगठन और साहस का कार्य अलग-अलग न होकर एक ही व्यक्ति के जिम्मे होता है, तब संगठनकर्ता को संगठन कार्य के अतिरिक्त साहस (Enterprise) का कार्य अर्थात् लाभ हानि उठाने की जोखिम भी सहनी पड़ती है।

10. मूल्य नीति निर्धारत करना 

वस्तु की मांग व पूर्ति को ध्यान मे रखकर संगठनकर्ता मूल्य नीति निर्धारित करता है।

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