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12/03/2020

भारतीय परिषद अधिनियम 1892

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भारतीय परिषद (कौंसिल) अधिनियम 1892 

1892 ka bhartiya parishad adhiniyam;भारत मे ब्रिटिश प्रभुसत्ता के अधीन भारतीय शासन व्यवस्था के विकास मे कतिपय संवैधानिक सुधार अधिनियम पारित किये गये। सन् 1892 का भारतीय कौंसिल अधिनियम इसी श्रृंखला की दूसरी कड़ी था। सन् 1861 के पश्चात ही संवैधानिक सुधार पारित किये गये, उनमे भारतीयों का असंतोष उनके उग्र होते आंदोलन, अनिच्छा से दिये गये सुधार और उनसे और अधिक भड़कता असंतोष इसका एक लगातार सिलसिला चलता रहा। सन् 1892 मे पारित अधिनियम भी सन् 1885 मे स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा लगातार राजनीतिक एवं संवैधानिक सुधारों की माँग का परिणाम था।

भारतीय परिषद् अधिनियम 1892 के पारित होने के कारण 

सन् 1861 मे स्थापित विधान परिषदों मे जो भी गैर सरकारी तत्व थे, वे जनता का प्रतिनिधित्व नही करते थे। इनमे बड़े-बड़े जमींदार, अवकाश प्राप्त अधिकारी तथा भारतीय राजा, महाराजा थे जो जनता की समस्याओं से अधिक परिचित नही थे। अतः भारतीय इससे सन्तुष्ट नही थे। अतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी मांग सूचीबद्ध करके सरकार के सम्मुख प्रस्तुत की तथा अपने प्रथम अधिवेशन मे निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किया--

कांग्रेस यह चाहती है कि सर्वोच्च तथा स्थानीय विधान परिषदों मे पर्याप्त संख्या मे निर्वाचित सदस्य सम्मिलित करके इनका सुधार तथा विस्तार किया जाये और इनके सदस्यो को, कार्यकारिणी से, प्रशासन के सभी विभागों पर प्रश्न पूछने का अधिकार हो। इसी प्रकार की विधान परिषदें अवध, पश्चिमोत्तर प्रान्त तथा पंजाब मे भी स्थापित की जाये। कांग्रेस की अन्य माँगे थीं-- 

भारत मे ही सिविल सर्विस की परिक्षा हो। भारतीय प्रशासन की जाँच-पड़ताल के लिये एक राजकीय आयोग की नियुक्ति की जाये। सैनिक व्यय मे कमी की जाये तथा परिषद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाकर उन्हे बजट पर वाद-विवाद करने तथा प्रशासन के सभी विभागों के कार्यों पर प्रश्न पूछने का अधिकार दिया जाये।

इन माँगों को लेकर काँग्रेस ने दो शिष्टमंडल ब्रिटेन भेजे। इन शिष्टमंडलों को भेजने मे काँग्रेस का उद्देश्य था कि ब्रिटिश राजनीतिज्ञों को इस बात का विश्वास दिलाएं कि भारत मे प्रतिनिधि शासन के ध्येय की ओर पग बढ़ाने की आवश्यकता है। 1892 का एक्ट इन्ही प्रयासों का परिणाम था।

ऐसी ही परिस्थिति मे ब्रिटिश संसद के उदार सदस्य श्री चार्ल्स ब्रेडला भारत आये और काँग्रेस के अधिवेशन मे सम्मिलित हुए। वे कांग्रेस की माँगों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इससे सम्बंधित एक विधेयक संसद के सामने रखा। इस पर सरकार ने स्वयं एक विधेयक संसद मे पेश किया, जो पारित होकर इण्डिया कौंसिल एक्ट, 1892 के नाम से विख्यात हुआ। 

भारतीय परिषद अधिनियम 1892 के प्रावधान या व्यवस्थाएं 

1892 का अधिनियम केवल एक संशोधित अधिनियम था। इसलिए भारत सरकार का ढाँचा मुख्यतः 1861 के अधिनियम के अनुसार ही रहा। भारतीय परिषद अधिनियम 1892 की मुख्य व्यवस्थाएं, धाराएं या प्रावधान इस प्रकार है--

1. 1892 के अधिनियम भारत के गवर्नर जनरल को ऐसा अधिकार दिया गया जिसके द्वारा वह विधान परिषदों के अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ा सकता था। इसकी व्यवस्थाओं के अनुसार अतिरिक्त सदस्यों की संख्या कम से कम 10 तथा अधिक से अधिक 16 निर्धारित की गई थी।

2. इस अधिनियम द्वारा बम्बई एवं मद्रास की विधान परिषदों मे अतिरिक्त सदस्यों की संख्या मे कम-से-कम 8 और अधिक-से-अधिक 20 सदस्यों की वृद्धि की गई थी। यह वृद्धि तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार की गई थी।

3. बंगाल की परिषद की अधिकतम सदस्य संख्या 20 निर्धारित की गई थी।

4. भारतीय परिषद् अधिनियम 1892 के द्वारा उत्तरी पश्चिमी सीमांत प्रदेश तथा अवध की परिषदों की अधिकतम सदस्य संख्या 15 निर्धारित की गई थी।

5. भारतीय परिषद् अधिनियम द्वारा परिषदों के कार्यों तथा अधिकार क्षेत्र मे भी बढ़ोतरी की गई थी। इन परिषदो मे अब सरकारी आय-व्यय के वितरण पर बहस हो सकती थी। इस प्रकार वित्तीय नियंत्रण को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया था। 

6. भारतीय परिषद् अधिनियम 1892 के द्वारा सपरिषद गवर्नर जनरल को सपरिषद भारत सचिव के अनुमोदन के अतिरिक्त सदस्यों के अंतर्गत भारत के गवर्नर जनरल को प्राधिकृत किया गया था कि वह आंशिक रूप से चुनाव पद्धति को स्वीकार कर सकता था।

7. अधिनियम की व्यवस्थाओं के अंतर्गत रहते हुए परिषद सदस्यों को नियमानुसार प्रश्न पूछने का भी अधिकार दिया गया था। प्रत्येक सदस्य 9 दिन की पूर्व सूचना देकर प्रश्न पूछ सकता था। नियमानुसार अध्यक्ष बिना कारण बताये किसी प्रश्न को अस्वीकार कर सकता था।

8. भारतीय परिषद अधिनियम 1892 के अनुसार भारत के गवर्नर जनरल को आदेश दिया गया कि यह परिषदो के अतिरिक्त सदस्यों का नामांकन करने के लिए देश की प्रतिनिधि निकायों को निर्वाचित करने, चयन करके या प्रत्यायुक्त करने के लिए व्यवस्था करे। इस प्रकार की इकाइयों के अंतर्गत जमींदारी के संगठन, विश्वविद्यालय, धार्मिक संप्रदाय तथा नगरपालिकाएं आती थी। क्योंकि इन्ही इकाइयों मे से परिषद् के सदस्यों को मनोनीत किया जाता था। यदि परिषद् अधिनियम 1892 की तात्विक व्याख्या की जाय तो उसके निम्नलिखित पहलुओं को समझा जा सकता है--

(अ) इस अधिनियम द्वारा परिषदों के सदस्यों मे बढ़ोतरी की गयी, 

(ब) बंगाल परिषद के सदस्यों की अधिकतम सीमा 20 निश्चित की गई थी। 

(स) आंशिक रूप से चुनाव के सिद्धांत को स्वीकार किया गया था।

(द) परिषदों के कार्यकलापों मे वृद्धि की गई थी।

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