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12/02/2020

भारत सरकार अधिनियम 1858

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भारत सरकार अधिनियम 1858 

bharat sarkar adhiniyam 1858 in hindi;सन् 1858 के भारत सरकार अधिनियम के पहले भारत का प्रशासन चार्टर अधिनियम 1853 के द्वारा चलता था। सन् 1858 तक ब्रिटिश के निवासियों की धारणा बन चुकी थी कि भारत का शासन प्रत्यक्ष रूप से सम्राट के अधीन होना चाहिए। एक तरफ भारत मे कंपनी का प्रशासन संतोषजनक नही था, तो दूसरी ओर इंग्लैंड की संसद भारत के प्रशासन को अपने नियंत्रण मे लेना चाहती थी।

सन् 1857 मे भारतीय कंपनी के शासन के विरुद्ध उठ खड़े हुए सैनिको ने अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। भारतीय भारत मे कंपनी के शासन की समाप्ति चाहते थे। शासन असहनीय हो गया था। इंग्लैंड मे राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे। एक तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार तो खत्म हो चुका था, लेकिन उससे संबंधित सभी बुराइयां कंपनी मे विद्यमान थी।

चार्टर अधिनियम 1853 के द्वारा भारतीय प्रशासन मे सुधार करने की योजना बनाई थी, लेकिन वह योजना असफल हो चुकी थी। भारत मे उत्तरदायी सरकार की स्थापना न हो सकी। भारत के प्रशासन मे भारतीयों का योगदान नगण्य था, लेकिन उनकी लगातार उपेक्षा हो रही थी। भारतीयो को भारतीय व्यवस्थापिका मे प्रतिनिधित्व प्राप्त नही था। एक ओर भारतीयों को भारतीय प्रशासन से दूर रखा जा रहा था तो दूसरी तरफ अंग्रेजों को भारतीय परिस्थितियों का ज्ञान नही था। तात्कालिक न्यायालयों से भारतीयो को न्याय उपलब्ध नही हो पाता था। कुल मिलाकर भारतीय कंपनी के प्रशासन से रूष्ट एवं असंतुष्ट थे।

भारत सरकार (शासन) अधिनियम 1858 की पृष्ठभूमि 

इंग्लैंड की संसद प्रयत्न करने के पश्चात भी कंपनी के व्यापारिक स्वरूप को समाप्त नही कर पाई थी। कंपनी के कर्मचारियों पर प्रशासन का अंकुश न था, फलतः वह भ्रष्ट्र थे। निकम्मे व्यक्तियों को भी कंपनी के प्रशासन मे उच्च पदो पर आसीन किया गया था। भारत की सरकार इंग्लैंड सरकार के मंत्रियों पर आश्रित थी। इसी कारण निर्णयों के क्रियान्वयन मे विलंब होता था। उस समय की कंपनी की सरकार पर कठोर अंकुश जरूरी थे, पर ईस्ट इंडिया कंपनी नियंत्रणो को स्वीकार करने हेतु उत्सुक नही थे। 

सन् 1857 की घटना ने स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय कंपनी के प्रशासन मे रहने के लिए तैयार नही थे। इंग्लैंड की संसद को भी अहसास हो चुका था कि समय आ चुका था। अब भारतीय प्रशासन मे अविलंब परिवर्तन वांछनीय थे। अतः ईस्ट इंडिया कंपनी के विरोधों के बावजूद भी इंग्लैंड की संसद ने सन् 1858 मे भारत शासन अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम द्वारा भारतीय प्रशासन मे महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये थे। कालांतर से भारत सरकार अधिनियम, 1858 संवैधानिक विकास का आधार बना।

भारत सरकार अधिनियम 1858 की विशेषताएं या व्यवस्थाएं या धाराएं 

ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभावशाली विरोध के बावजूद भी इंग्लैंड की संसद ने भारत सरकार अधिनियम का निर्माण किया। इस अधिनियम का उद्देश्य भारत मे अच्छी सरकार की स्थापना करना था। अधिनियम द्वारा तात्कालिक शासन व्यवस्थाएं इस प्रकार थी--

1.  अधिनियम मे घोषणा की गयी कि " अब से भारत पर रानी के द्वारा तथा उसके नाम से शासन किया जायेगा और कंम्पनी के समस्त प्रदेश तथा शक्तियाँ रानी मे निहित होगी।

2. नियंत्रण परिषद् (बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल) तथा निदेशक मण्डल समाप्त कर दिये गये और उनका स्थान भारत मंत्री एवं परिषद् ने ले लिया। 

3. भारत मंत्री ब्रिटेन के मंत्रिमण्डल का सदस्य होगा और संसद मे बैठेगा। उसकी सहायता के लिये एक संसदीय सचिव होगा।

4. भारत सरकार अधिनियम 1858 मे यह भी प्रावधान किया गया कि भारत मंत्री प्रति वर्ष भारत की भौतिक तथा नैतिक प्रगति की रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

5. अधिनियम मे कहा गया कि भारत के शासन का उत्तरदायित्व ब्रिटिश क्राउन ने अपने ऊपर ले लिया है और इसकी घोषणा रानी के द्वारा भारतीय राजा-महाराजाओं के समक्ष कर दी जायेगी।

6. भारत के बाहर सैनिक कार्यवाहियों के लिये भारतीय कोष से ब्रिटिश संसद की अनुमति के बिना धन खर्च नही किया जायेगा, किन्तु आक्रमण का मुकाबला करने हेतु और अचानक उत्पन्न हुई आवश्यकता की पूर्ति हेतु बिना संसद की अनुमति के भी धन खर्च किया जा सकेगा।

7. क्राउन गवर्नर जनरल तथा प्रान्तों के गवर्नरों की नियुक्ति करेगा। लेफ्टीनेंट गवर्नरों की नियुक्ति गवर्नर जनरल करेगा, किन्तु इसके लिये उसे क्राउन का अनुमोदन प्राप्त करना होगा। विभिन्न परिषदों के सदस्यों की नियुक्ति भारत मंत्री एवं परिषद् करेगी।

8. कंपनी की सभी सन्धियाँ, समझौते और देनदारियाँ क्राउन पर लागू होंगी।

9. प्रावधान किया गया कि भारत मंत्री की सहायता के लिये 15 सदस्यों की एक भारत परिषद् होगी जिसके 8 सदस्यों को क्राउन (ताज) तथा 7 को निर्देशक-मण्डल नियुक्त किया जायेगा।

10. क्राउन द्वारा नियुक्त सदस्यों के पद पर जब रिक्त होगे तो उन पर नियुक्ति क्राउन ही करेगा तथा निर्देशको द्वारा नियुक्त सदस्यों के रिक्त स्थानो को भरने का अधिकार स्वयं परिषद् को होगा।

11. भारत मंत्री परिषद् की बैठको की अध्यक्षता करेगा। कुछ विषयो मे मंत्री को परिषद् के अधिकतम सदस्यों की राय से काम करना होगा, जैसे - भारत के राजस्व मे से धन व्यय करना, गवर्नर जनरल की परिषद् के साधारण सदस्यों की नियुक्ति इत्यादि। अन्य मामलों मे वह परिषद् की राय के विरुद्ध भी कार्य कर सकेगा।

12. यह प्रावधान किया गया कि भारत के राजस्व का प्रयोग भारत के लिये किया जायेगा। मंत्री तथा उसकी परिषद् के सदस्यों का वेतन तथा भारत मंत्री कार्यालय (इंडिया ऑफिस) का खर्च, कंपनी के ॠण की राशि तथा उसके शेयरो के लाभांश की राशि भारतीय राजस्व से चुकायी जायेगी।

भारत सरकार अधिनियम 1858 का मूल्यांकन या महत्व 

1858 के अधिनियम को भारत के लिये उत्तर सरकार का अधिनियम कहा गया है। यद्यपि इस अधिनियम से भारत के प्रशासन मे कोई बड़ा परिवर्तन नही हुआ, किन्तु इसका संवैधानिक तथा क्रांतिकारी महत्व अवश्य है। 

1. इससे भारतीय इतिहास मे नयी अवधि का सूत्रपात हुआ। कंपनी की सत्ता समाप्त होकर भारतीय सत्ता ताज के हाथ मे आ गई। भारत के संवैधानिक इतिहास मे नये युग का आरंभ हुआ।

2. गृह सरकार के ढ़ाँचे मे परिवर्तन हुआ। पहले शासन का दायित्व संचालक मण्डल और नियंत्रण मंडली के हाथ मे था किन्तु नयी व्यवस्था के अनुसार द्वैध शासन के स्थान पर नई व्यवस्था लागू की गई।

3. भारत का शासन भारत सचिव और भारतीय परिषद् को सौंप दिया गया, क्योंकि भारतीय परिषद् एक स्वतंत्र संस्था थी और इसके सदस्यों को भारतीय समस्याओं का पूरा ज्ञान रहता था। गौरव, शक्ति और अधिकार का प्रतीक भारत सचिव का पद भी इस अधिनियम की ही देन थी। यह संस्था साधारण सुधारों के साथ ब्रिटिश शासन के अंतकाल तक चलती रही।

4. इस अधिनियम के द्वारा विदेशी शासको और देशी रियासतो के बीच मधुर संबंध स्थापित हुए और ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि वह देशी राजाओं के अधिकतर, गौरव और प्रतिष्ठा का सम्मान करेगी।

5. भारत सरकार अधिनियम 1858 मे धार्मिक सहनशीलता का सिद्धांत रखा गया। लोकसेवा आयोग मे भी भर्ती के लिये भेदभाव खत्म कर दिये गये। इस संबंध मे कुपलैंड का कथन है कि परिवर्तन से महत्वपूर्ण यह भावना थी कि इसने (अधिनियम ने) एंग्लोइंडियन इतिहास का अध्ययन बंद कर दिया और एक नया अध्याय प्रारंभ किया।

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