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12/02/2020

लार्ड लिटन का प्रशासन, आंतरिक या प्रशासनिक कार्य

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lord litan ka prashasan;1857 के पश्चात ब्रिटिश सरकार पर्याप्त भयभीत थी परन्तु भारत जैसे विशाल आर्थिक क्षेत्र के साम्राज्य को छोड़ने के लिये भी तैयार नही थी। उसको भी यह समझ आ गया था कि ब्रिटिश शासन के अत्याचारी और प्रतिक्रियावादी शोषण के कारण भारतीयों मे असन्तोष व्याप्त था। इसी कारण 1857 का संग्राम हुआ अतः उसने भारतीयो को संतुष्ट करने के लिये केनिंग, एल्गिन, मेयो और नार्थ ब्रुक को भेजा गया। इन्होंने अनेक सुधार किये परन्तु यह भी प्रतिक्रियावादी थे। इनके बाद लिटन और फिर रिपन आये थे। 

लार्ड लिटन के प्रशासनिक या आंतरिक प्रशासन मे सुधार कार्य 

लार्ड लिटन के प्रशासनिक कार्य इस प्रकार है--

1. स्वतंत्र व्यापार की नीति

लिटन स्वतंत्र व्यापार की नीति का समर्थक था। औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन इस समय उद्योग तथा व्यापार की दृष्टि से संपूर्ण संसार का नेतृत्व कर रहा था और स्वतंत्र व्यापार की नीति उसके हित मे थी। भारत से ब्रिटेन को कच्चे माल की आवश्यकता होती थी तथा उसके बने हुए माल को अच्छा बाजार प्राप्त होता था। इस कारण भारत मे स्वतंत्र व्यापार की नीति को अपनाना ब्रिटेन के उद्योगो और व्यापार के हित मे था। ब्रिटेन के व्यापारी भारत सरकार द्वारा लगाये विभिन्न आयात निर्यात करो का विरोध कर रहे थे। अंत मे भारत सचिव के आदेश तथा अपनी सम्मति से लाॅर्ड लिटन ने स्वतंत्र व्यापार की नीति अपनायी तथा प्रायः उनतीस वस्तुओं से आयात-निर्यात कर खत्म कर दिया और इस तरह ब्रिटेन के हित की पूर्ति के लिए भारत के हित का बलिदान किया गया।

2. नमक कर लगाना 

विभिन्न प्रांतों के विभिन्न भागो मे नमक कर की भिन्न-भिन्न दरें थी। लिटन ने इन्हे समान करके नमक चोरी को रोका। भारतीय रियासतो पर नमक बनाने के लिये प्रतिबन्ध लगाये गये, परन्तु इसलिये उन्हें क्षतिपूर्ति नही दी गई। इस प्रकार नमक चोरी को तो रोक लिया परन्तु भारतीयो को हानि पहुंचा कर कंपनी की आय मे वृद्धि की। अनेक स्थानों पर नमक पर नियंत्रण के लिये अनेक चुंगी क्षेत्र बनाये गये जिससे वस्तुओं के दामो मे और निर्धन जनता की कठिनाइयों मे अपार वृद्धि हो गई।

3. प्रेस एक्ट 

सन् 1876 मे प्रेस एक्ट द्वारा भारतीय पत्रो की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया गया जिसके अत्याचारी स्वरूप से चिढ़कर भारतीयों ने इसे हैंगिंग एक्ट या गलाघोंटू कानून की संज्ञा दी।

4. सन् 1876-78 अकाल और लाॅर्ड लिटन की नीति

भारत मे अकाल की स्थिति सन् 1873-79 से ही बनी हुई थी। सन् 78 तक यह स्थिति भयावह हो चुकी थी। सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र मद्रास, बम्बई, मैसूर, हैदराबाद और मध्यभारत के कुछ भाग तथा पंजाब थे। अकाल का प्रभाव लगभग 2,57,000 वर्ग मील और 5 करोड़ 80 लाख लोगो पर पड़ा। आर. सी.दत्ता का मानना है कि लगभग 50 लाख लोग एक बर्ष मे भूख से मर गये थे। सन् 1878 मे रिचर्ड स्टैची की अध्यक्षता मे एक अकाल कमिश्नर की स्थापना हुई जिसने पेट पालने के लिए काम, पर्याप्त मजदूरी तथा स्थायी प्रान्तीय अकाल कोष के निर्माण का सुझाव दिया। अकाल की रोकथाम के लिए सिंचाई योजनाएं तथा रेलवे लाइनें बिछाने का कार्यक्रम बनाया गया। इस प्रकार सरकार की आगामी अकाल नीति का आधार निर्मित हुआ। 

5. शिक्षा व्यवस्था 

लाॅर्ड लिटन ने शिक्षा के नाम पर हिन्दुओं और मुसलमानों मे फूट डालने के लिये अलीगढ़ मुस्लिम काॅलेज स्थापित किया जिसका प्राचार्य बैक नामक अंग्रेज था जिससे सर सैय्यद अहमद खाँ जैसे व्यक्ति भी हिन्दु-मुस्लिम एकता का रास्ता छोड़कर भारत द्रोही साम्प्रदायिक रास्ते पर चल पड़े।

6. सम्राट पद कानून 

1876 मे सम्राट पद कानून के अंतर्गत रानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी का पद प्रदान किया गया। इसकी घोषणा के लिए लिटन ने 1 जनवरी 1877 को दिल्ली मे एक शानदार दरबार का आयोजन किया। दरबार की शानशौकत पर बेहद खर्च किया गया और वह भी उस समय जबकि भारत के अधिकांश भागो मे घोर अकाल पड़ा हुआ था। इससे भारत मे तीव्र असंतोष हुआ तथा इसी समय मे सुरेंद्रनाथ बनर्जी और लाला लाजपतराय ने अपना जन आन्दोलन शुरू किया था।

7. आम्र्स एक्ट 

इस एक्ट के अनुसार यह निश्चित किया गया कि भारतीय बिना लाइसेंस के हथियार नही रख सकते।

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