11/30/2019

उग्रवाद के उदय (उत्पत्ति) के कारण

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उग्रवाद (गरम दल)

उग्रवादी दल को गरम दल के नाम से भी जाना जाता हैं। उग्रवादी दल का उदय 1895 से माना जाता हैं। उग्रवादी (गरम दल) के प्रमुख नेताओं के नाम इस प्रकार हैं--- 1.गंगाधर तिलक 2. लाला लाजपत राय 3. विपिन चन्द्र पाल 4. महर्षि अरविंद आदि उग्रवादी दल के प्रमुख नेता थे। उग्रवादी दल के नेता चाहते थे कि कांग्रेस का एकमात्र ध्येय स्वराज्य हो। स्वराज्य को आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता द्वारा प्राप्त किया जाए। कांग्रेस का यह अंग्रेज विरोधी दल गरम दल या उग्रवादी दल के नाम से जाना जाता हैं।
आज के इस लेख मे हम उग्रवादी आन्दोलन की उत्पत्ति के कारण जानेंगे लेकिन उस से पहले हम संक्षिप्त मे उग्रवादी और उदारवादी दल मे अंतर को जान लेते हैं।
उग्रवाद का उदय

उदारवादियों और उग्रवादीयों में अंतर

1. उदारवादी कांग्रेस को एक कुलीन संस्था बनाना चाहते थे। उग्रवादी कांग्रेस को एक व्यापक संस्था का रूप देना चाहते थे।
2. उदारवादी अंग्रेजों की न्यायप्रियता पर विश्वास रखते थे। वे अंग्रेजों से स्थायी सम्बन्ध रखना चाहते थे लेकिन उग्रवादियों को अंग्रेजों की महानता और न्यायप्रियता व बिल्कुल भी विश्वास नहीं था।

3. उदारवादी मामूली सी मांगो से ही संतुष्ट हो जाते थे। वे प्रशासन मे सुधार चाहते थे लेकिन उग्रवादियों का दृष्टिकोण व्यापक था तिलक के शब्दों मे " स्वतंत्रता मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और मै इसे लेकर रहूंगा। उग्रवादी अंग्रेजों को भारत से खदेड़ देना चाहते थे।
4. उदारवादी शांति प्रिय थे उनके मुख्य शस्त्र निवेदन और मांग थे। उग्रवादीयों का कहना था कि भीख मांगने से स्वराज्य नही मिलता उसके लिए लड़ना पड़ता हैं।

उग्रवाद की उदय (उत्पत्ति) के कारण (ugravad ke uday ke karan)

1. अंग्रेजों की शोषण नीति का पर्दाफाश 

उग्रवादी आन्दोलन के प्रारंभ होने का एक कारण अंग्रेजों की शोषण नीति का पर्दाफाश होना था। अंग्रेजों की शोषण नीति का पर्दाफाश करने मे विभिन्न लेखों और पुस्तकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसका श्रेय दादाभाई नौरोजी, दिनशा वाचा, गोपाल कृष्ण गोखले, आनन्द चार्लू एवं मदन मोहन मालवीय आदि को जाता हैं। 

2. धार्मिक एवं सामाजिक प्रगति 
स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, अरविंद घोष, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, एनी बेसेन्ट तथा बकिंमचन्द्र चटर्जी ने यह बताया कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति श्रेष्ठ है, भारत का भूतकाल स्वर्णिम था और इसे दोबारा बनाया जा सकता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पश्चात धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों ने उग्र राष्ट्रवाद के लिए जमीन तैयार की।


3. आर्थिक असंतोष 

अंग्रेजों की आर्थिक नीति के कारण हथकरघा उधोग समाप्त हो गया था। श्रमिक बेरोजगार हो गए थे। कृषकों की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब थे। 

4. बंगाल का विभाजन तथा स्वदेशी आंदोलन 
बंगाल का विभाजन की उग्रवाद के उदय का कारण रहा। लाॅर्ड कर्जन ने सबसे कुटिय कार्य 1905 मे किया और वह बंगाल का विभाजन था। बंगाल लार्ड कर्जन के समय एक बहुत बड़ा प्रान्त था। लार्ड कर्जन का उद्देश्य न केवल शासन सुविधा के लिए बंगाल को बाॅटना था अपितु हिन्दू और मुसलमानों मे फुट डालकर राष्ट्रीय एकता को तोड़ना था। इस हेतु उसने पूर्वी बंगाल के मुसलमानों को बताया कि बंगाल के बंटवारे से पूर्वी बंगाल मे उनका बहुमत हो जाएगा और उन पर हिन्दुओं की प्रधानता नही रहेगी। 
जनता ने इसका विरोध सभाओं के माध्यम से किया। लोग मण्डली बनाकर निकलते और वन्देमातरम से सारा वातावरण गूंज उठता। सरकार ने दमन का सहारा लिया। जबाब मे भारतीयों ने विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई। गोखले ने भारत सचिव से बंगाल का विभाजन रद्द करने हेतु बहुत प्रार्थना की परन्तु भारत सचिव लार्ड मोर्ले ने स्पष्ट रूप से ऐसा करने से मना कर दिया। फलस्वरूप लोगों मे उदारवादियों की नीतियों से विश्वास उठ गया। जिससे उग्रवाद को बल मिला।

5. उदारवादियों की नीतियों के प्रति असन्तोष 

उग्रवादी उदारवादियों की प्रार्थन, ज्ञापन एवं विरोध की नीति से असन्तुष्ट थे। उदारवादियों ने इंग्लैंड मे भारतीयों की समस्याओं के प्रचार-प्रसार मे नीति अपनाई थी उससे भी उग्रवादी में असन्तोष था।

6. प्राकृतिक प्रकोप

इसी समय अकाल तथा प्लेग की बीमारी फैली थी। जिसमें दक्षिम भारत मे अकाल के कारण 2 करोड़ लोग मृत्यु व कुपोषण के शिकार हो गए थे। 1876 से 1900 के बीच लगभग 95 अकाल पड़े। इससे मुक्ति दिलाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कोई भी प्रयास ही नही किया।

7. विदेशों में भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार 

अंग्रेजों ने विदेशो मे भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार किया। अंग्रेज अपने आपको सर्वश्रेष्ठ और सभ्य जाति का मानते थे। अंग्रेजों ने भारतीयों को राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों से वंचित कर दिया था।

8. लार्ड कर्जन की दमकारी नीतियों

कर्जन का काल राजनीतिक भूलों से भरा हुआ था। उसने अनेक नियम पारित कर भारतीयों की स्वतंत्रता को छीनने का प्रयास किया। बंगाल के विभाजन ने उग्रवाद के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1905 में लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन सर्वाधिक निन्दनीय कार्य था।

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