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10/31/2021

कला शिक्षण के उद्देश्य

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कला शिक्षण के उद्देश्य

kalaa shikshan ke uddeshy;बालकों की पैतृक गुणवत्ता का क्षेत्र बड़ा व्यापक है। कुछ बालक मेधावी होते हैं, और कुछ अत्यधिक संवेदनशील, कुछ में शारीरिक लाघव होता है तो कुछ में प्रत्यक्षीकरण की अद्भुत क्षमता होती है। कोई भी बालक शून्य नहीं होता और न ही किसी बालक में समस्त गुण होते हैं। कलात्मक प्रतिभा का जन्म किसी भी आयुकाल में हो सकता है। इसलिये कला के अनुभव का अवसर प्रत्येक बालक को दिया जाना चाहिये, क्योंकि कला जीवन में एक आल्हादिनी शक्ति को प्रेरित करती है जो व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक होती हैं। कला-शिक्षण के माध्यम से बालक के शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक विकास में सहायता मिलती है। अतः कला शिक्षण से निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति होती है--- 

1. शारीरिक विकास

संरचनात्मक कार्यों से बालक का शारीरिक विकास होता है, क्योंकि प्रत्येक स्तर पर स्नायु तंत्र उसे विकसित होने के लिये प्रेरित करता है। बालक विकास के प्रत्येक स्तर पर संरचनात्मक क्रियायें करता है, जैसे-- कागज मोड़ना, चिपकाना, बुनना, मॉडल बनाना, हथौड़ा चलाना आदि। 

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2. मानसिक विकास

संरचनात्मक एवं क्रियात्मक अनुभवों को ग्रहण करते समय बालक को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है तथा क्रिया के संचालन हेतु बौद्धिक निर्णय लेना होता है। ऐसे अवसर सामूहिक एवं व्यक्तिगत सभी क्रियाओं में आते हैं। सामूहिक क्रियाओं में बालक सीखने की परिस्थितियों के निर्माण में सहायता करता है। व्यक्तिगत क्रियाओं में यद्यपि वह स्वतंत्र क्रिया करता है फिर भी उसे स्पष्ट चिंतन और सावधानीपूर्वक योजना बनाने की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में वह अनेक बार निर्णय लेता है। पेंटिंग तथा मॉडलिंग में भी यद्यपि निर्णय शीघ्रता से लेने होते हैं फिर भी यह कार्य ध्यानपूर्ण, विचारपूर्ण एवं पूर्व निर्धारित कार्य है, जिससे मानसिक शक्तियों का विकास और पोषण होता है। 

3. सौंदर्यात्मक विकास  

कला के द्वारा होने वाले शारीरिक एवं मानसिक विकास को मापा जा सकता है, किन्तु सौन्दर्यत्मक विकास का प्रत्यक्षीकरण कुछ कठिन है। कुछ व्यक्ति कलात्मक कार्यों के प्रति अपनी गहरी रुचि एवं पसन्द को बाहरी व्यवहार से प्रदर्शित नहीं करते वरन् ध्यानमग्न होकर शान्तिपूर्ण ढंग से उसे अनुभव करते हैं। जबकि कुछ व्यक्ति अपने अनुभवों को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं तथा प्रशंसा एवं आनन्द का प्रदर्शन करते हैं। इस कारण सौन्दर्यात्मक वृद्धि का मूल्यांकन वैयक्तिक है और अत्यधिक कठिन है। 

4. स्वानुभव का विकास 

व्यक्ति के 'स्वत्व' का पोषण विभिन्न अनुभवों से होता है। यह व्यक्तित्व में अंतर्दृष्टि, संवेदना, कल्पना और भावना के रूप में विकसित होता है और सौन्दर्यात्मक रूप प्राप्त करता है। इस विकास से बालक अपने उद्देश्य को समझता है और उसमें कार्य का भार वहन करने की भावना, आत्मविश्वास, आलोचनात्मक योग्यता, निर्देशन और रचनात्मकता का विकास होता है।

प्रत्येक बालक में कुछ न कुछ निर्माण करने की क्षमता होती है और मेधावी बालक अपना मार्ग स्वतः खोज लेते हैं। वस्तुतः कला के द्वारा बालक के नैसर्गिक रूप का विकास होता है और उसमें जिज्ञासा की प्रवृत्ति बढ़ती है। कलात्मक प्रदर्शन में 'स्वानुशासन' रचनात्मक प्रवृत्ति को बाहर लाता है और चेतना को जाग्रत करता है। इस प्रकार कला आत्मानुभूति को आगे बढ़ाकर पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करती है। 

5. रचनात्मक कल्पना का विकास 

बालक के विकास का सजीव पक्ष उसकी रचनात्मक कल्पना की परिपक्वता में है। कल्पना के कई रूप हो सकते हैं। यह रचनात्मक, खोजी, चंचल, चपल, चल अचल, स्थिर अस्थिर हो सकती है। कल्पना की शक्ति एक दैवीय वस्तु है जो बालक के लिये सर्वाधिक मूल्यवान है। यदि इस कल्पना को समुचित निर्देशन न मिले तो वह बालक में दिवास्वप्नों, कल्पनात्मक कहानियों और आत्मप्रदर्शन की नाटकीयता का कारण बन सकती हैं। 

अतः शिक्षकों एवं माता-पिता को बालकों की कल्पनाओं को समझने के लिये प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये। रचनात्मक कल्पना को प्रोत्साहन देने से बालक की धारणा शक्ति का विचार  विकास होता है। यह बालक के अनुभवों को पूर्ण करके उन्हें आकर्षक बनाती है और जो विचार हम शब्दों द्वारा प्रकट नहीं कर पाते उन्हें प्रकट करती है।

6. समस्या समाधान की कुशलता का विकास 

समस्या समाधान शिक्षा का एक महत्वपूर्ण भाग है। जैसे-जैसे बालक अपनी समस्याओं का समाधान करता जाता है, वैसे-वैसे उसकी बुद्धि का विकास होता रहता है। विभिन्न समस्याओं का समाधान करते करते बालक के व्यवहार में जो परिवर्तन आता है वह यह प्रदर्शित करता है कि सीखने का कार्य संपन्न हुआ है और इच्छित मनोवृत्ति की स्थापना हुई है। 7. आर्थिक कुशलता का विकास 

यद्यपि कला शिक्षा का विशेष संबंध मानसिक एवं रचनात्मक विकास से है तथापि व्यापारिक एवं व्यावसायिक कलायें आर्थिक क्षमता भी प्रदान करती है। आधुनिक समय में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अधिक आकर्षक और नवीन सामग्री प्रस्तुत करने की होड़ लगी है, जिसमें कलात्मक संगठन में निपुणता कलाकार को आर्थिक उन्नति के अधिक अवसर प्रदान करती हैं 

8. नैतिक उन्नयन 

मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति में ऐसी कई मूल प्रवृत्तियों की विवेचना की है जिनका की समाज में अभिव्यक्ति उचित नहीं है। इनमें क्रोध, एकाधिकार और सेक्स की मूल प्रवृत्तियाँ प्रमुख हैं। कला के द्वारा इन मूल प्रवृत्तियों का मार्गान्तीकरण होता है जिससे व्यक्ति के नैतिक और व्यावहारिक स्तर उन्नयन होता है। 

9. आध्यात्मिक विकास 

भारतीय विद्वानों ने कला को ईश्वरीय कला की प्रतिकृति कहा है, जो कला के ब्रह्म से स्थापित होने वाले संबंध को प्रकट करता है। जब कलाकार स्वयं में केन्द्रित न रहकर ईश्वर की रचना से आनंदित होता है और उसकी रचना का अनुकरण करता है, तब उसे परम आनन्द की प्राप्ति होती है, जो आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा है।

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