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6/29/2021

निर्धनता के प्रकार

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निर्धनता के प्रकार 

nirdhanta ke prakar;निर्धनता एक ऐसी सार्वभौमिक अवधारणा है जो सभी काल तथा सभी समाज में विद्यमान रही है। चाहे उसका स्वरूप अलग रहा हो। भारतीय समाज के संदर्भ में देखें तो निर्धनता दो प्रकारों से देखी जा सकती है। नगरीय/शहरी निर्धनता तथा ग्रामीण निर्धनता जो कि इस प्रकार है--

1. नगरीय निर्धनता 

इस निर्धनता का स्वरूप जैसा कि इसका शीर्षक है नगरों या शहरों में देखा जाता है। सामान्यता शहरों या नगरों में निवास करने वाले लोग व्यापारपेशा या नौकरीपेशा होते है। यही इनकी आजीविका का साधन होता है। निर्धनता के संबंध मे पिछले लेख मे दी गई निर्धनता की परिभाषाओं के संदर्भ मे देखे तो वे शहरों/नगरों में निवास करने वाले अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाती है, तो वे शहरी/नगरीय निर्धन लोगों के वर्ग में शामिल किए जाएंगे। इस वर्ग में ज्यादातर कारखानों में काम करने वाले मजदूर छोटा-मोटा काम करने वाले लोग आते हैं।

शहरों में कारखानों आदि में काम करने वाले मजदूरों को उनकी मेहनत का इतना परिश्रमिक नहीं मिल पाता कि वे अपनी तथा अपने परिवार की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाएं। वह ऐसी स्थिति में जीवन बसर करते हैं जहां उन्हें समुचित कैलोरी का भोजन नहीं मिल पाता। वही उन्हें सर छुपाने के लिए कोई व्यवस्थित आवास की व्यवस्था भी नहीं हो पाती। अतः यह गंदी बस्तियों में निवास करते हैं जहां ना तो समुचित रोशनी वा पानी की व्यवस्था होती है और ना ही वहां का वातावरण ठीक रहता है। फलस्वरुप यह लोग कई बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। बहुत से लोग तो फुटपाथ पर ही अपना जीवन बसर कर लेते हैं।

2. ग्रामीण निर्धनता 

भारत की अधिकांश जनता लगभग 2 तिहाई से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन कृषि है। कुछ लोग या तो स्वयं ही भूमि पर कृषि करते हैं और कुछ खेतिहर मजदूर होते हैं। हमारे यहां कृषि मानसून पर निर्भर है जबकि मानसून की स्थिति अनिश्चित होती है। कुछ क्षेत्रों में अवर्षा या अल्प वर्षा की स्थिति रहेगी या कहीं कहीं अति वर्षा की स्थिति बनती है। ऐसे में कृषि की स्थिति ठीक नहीं रहती ऐसे में कृषि पर निर्भर लेने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति सामान्यतः पिछड़ी हुई है। कुछ सक्षम लोग तो अपनी खेती के लिए आधुनिक कृषि उपकरणों व साधनों की सहायता से कृषि कर लेते हैं। किंतु अपेक्षाकृत कमजोर लोग ऐसा नहीं कर पाते। फलस्वरुप वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते और वह निर्धन रह जाते हैं। इस स्थिति को ग्रामीण निर्धनता कहते हैं। इस श्रेणी में आने वाले लोग खेतिहर मजदूर तथा भूमिहीन किसान होते हैं।

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