3/25/2021

बहमनी साम्राज्य का प्रशासन, पतन के कारण

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बहमनी साम्राज्‍य का प्रशासन 

केन्द्रीय शासन

शासन का प्रधान सुल्‍तान था जो निरंकुश और स्‍वेच्‍छाचारी शासक होता था, जो केंद्रीय प्रशासन सामान्‍यतः 8 मंत्रियों के सहयोग से संचलित किया जाता था। जो इस प्रकार है।--

1. वकील-उस-सल्‍तनत - यह प्रधानमंत्री था। सुल्‍तान के सभी आदेश उसके द्वारा ही पारित हेाते थे। 

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2. अमीर-ए-जुमला - यह वित्तमंत्री था।

3. वजीर-ए-अशरफ - यह विदेश मंत्री था। 

4. वजीर-ए-कुल - यह सभी मंत्रियों के कार्यो का निरीक्षण करता था। 

5. पेशवा - यह वकील के साथ संयुक्‍त रूप से कार्य करता था। 6. नाजिर - यह अर्थ विभाग से संलग्‍न था तथा उपमंत्री की भांति कार्य करता था। 

7. कोतवाल - यह पुलिस विभाग का अध्‍यक्ष था। 

8. सद-ए-जाहर - यह सुल्‍तान के पश्‍चात् राज्‍य का मुख्‍य न्‍यायाधीश था तथा धार्मिक कार्यो तथा राज्‍य को दिये जाने वाले दान की भी व्‍यवस्‍था करता था। 

प्रान्‍तीय शासन 

प्रान्‍तीय शासन व्‍यवस्‍था को व्‍यवस्थित करने के लिए अपने राज्‍य का चार सूबों में विभाजित किया गुलबर्गा, दोलताबद, बरार और बीदर। प्रान्‍तीय गवर्नर अपने-अपने प्रान्‍त में सर्वोच्‍च होता था तथा उसका प्रमुख कार्य अपने प्रान्‍त में राजस्‍व वसूलना, सेना संगठित करना व प्रान्‍त के सभी नागरिक व सैनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की नियुक्ति करना था। मुहम्‍मद शाह तृतीय के समय में बहमनी साम्राज्‍य का सर्वाधिक विस्‍तार हुआ। उसके प्रधानमंत्री महमूद गवां ने प्रशासनिक सुधारों के अन्‍तर्गत प्रान्‍तों को आठ सूबों - बरार को गाविल व माहूर में, गुलबर्गा को बीजापूर व गुलबर्गा में, दौलताबाद को दौलताबाद व जुन्‍नार में तथा बीदर को राजामुंदी और वारंगल में विभाजित किया। 

बहमनी साम्राज्‍य के पतन के कारण 

इस्‍लामी राज्‍यों के पतन में अमीरों की महत्‍वपूर्ण भूमिका सदैव से रही है। बहमनी राज्‍य भी इस्‍लामी राज्‍य था जो साम्राज्‍य में परिवर्तित हुआ और नष्‍ट हो गया। 

बहमनी साम्राज्य के पतन  के निम्‍न प्रमुख कारण थे--

1. राष्‍ट्रीयता का अभाव 

बहमनी राज्‍य में जनता, अमीरों तथा सुल्‍तानों में आपसी द्वेष, शत्रुता और स्‍वार्थ सक्रिय थे। उनमें धर्म, जाति, भाषा, संस्‍कृति की एकता और इसकी रक्षा का भाव नहीं था। अतः साम्राज्‍य का पतन हुआ। 

2. धर्मान्‍धता

कट्टर सुन्‍नी मुसलमानों सदैव से बहुत अधिक धर्मान्‍ध थे। उन्‍होनें सिया और सुन्‍नी मुसलमानों का भी कत्‍ल-ए-आम किया। हिन्‍दूओं के साथ बर्बरता का व्‍यवहार किया। इसी कारण बहमनी सुल्‍तानों ने विजयनगर पर आक्रमण किये। इस धर्मान्‍धता ने हिन्‍दू और सियाओं में असन्‍तोष के साथ धर्म, संस्‍कृति तथा देश और राज्‍य की रक्षा का भाव उत्‍पन्‍न किया। अतः बहमनी राजवंश समाप्‍त हो गया। 

3. पड़ौसी राज्‍यों से युद्ध 

इनके पड़ोस में ही विजयनगर था जो एक हिन्‍दू साम्राज्‍य था और कुछ मुस्लिम राज्‍य थे, जैस-तेलंगाना, उड़ीसा और गोलकुण्‍डा आदि, इन सभी पर बहमनी राज्‍य में निरन्‍तर आक्रमण, लूट और विध्‍वंस जारी रखा। इससे इसके चारों ओर के राज्‍य शत्रु बन गये। अतः युद्ध में भारी मात्रा में धन का व्‍यय हुआ और आर्थिक क्षति हुई । इससे साम्राज्‍य कमजोर हो गया।

4. निर्बल अयोग्‍य शासक 

बहमनी राज्‍य आरम्‍भ से ही धर्मान्‍ध था। उसके सुल्‍तानों की धर्मान्‍धता ने उनके विवेक, राज्‍य और शासन स्‍थायित्‍व, अपनी और जनता की खुशी आदि के विचार को पूर्णरूप से नष्‍ट कर दिया। बाद में जो उत्तराधिकारी हुये वे अधिक निर्बल और धर्मान्‍ध थे और उनकी कोई आर्थिक, कृषि, उद्योग, भाईचार तथा राज्‍य में शान्ति की कोई नीति और योजना नहीं थी। शासकों की अयोग्‍याताओं को उनकी विलासिता, लोभ, सुरा-सुन्‍दरी, षड्यन्‍त्र ने और भी अधिक बढ़ा दिया। अतः साम्राज्‍य का पतन हो गया। 

5. मेहमूद गवां की हत्‍या और साम्राज्‍य विभाजन 

मौहम्‍मद शाह तृतीय ने अपने सबसे अधिक योग्‍य सेनापति और प्रधानमंत्री की अमीरों के कहने से हत्‍या करवा दी। यह सबसे अधिक कुशल शासक था। इसकी हत्‍या से षड्यन्‍त्रकारी विद्रोहियो को अवसर मिला। इन्‍ही विद्रोहियो के कारण बहमनी राज्‍य अहमदनगर, बीजापुर एंव गोलकुण्‍डा में बंटकर अपनी प्रतिष्‍ठा, शक्ति और प्रभाव को खो चुका था। यह घटना सन् 1463 से  1482 के मध्‍य हुई तथा सन् 1526 में साम्राज्‍य की अन्तिम दीवार भी ढह गई। 

निष्‍कर्ष 

लगभग 170 वर्ष के बहमनी राज्‍य में आन्‍तरिक और बाहरी संघर्ष होते रहे, जिसे सुल्‍तानों की धर्मान्‍धता ने और भी अधिक बढ़ा दिया। इसके सभी सुल्‍तान सैनिक तानाशाह थे, परन्‍तु किसी में भी शासन करने की प्रतिभा नही थी। पूरे काल में बहमनी राज्‍य में केवल एक योग्‍य प्रशासक मेहमूद गंवा ही हुआ और उसकी भी हत्‍या हो गई। बहमनी राज्‍य आन्‍‍तरिक और विदेशी आक्रमणों से तथा अमीरों के षड्यनत्रों से नष्‍ट हो गया तथा तीन भागों में बंट गया।

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