3/26/2022

सभ्यता का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं/लक्षण

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sabhyata arth paribhasha visheshta;सभ्यता का सम्बन्ध संस्कृति के भौतिक पक्ष से होता है। इसके अन्तर्गत वे चीजें आती है जिनका उपयोग करके व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। सभ्यता का सम्बन्ध उन भौतिक साधनों से हैं जिनमें उपयोगिता का तत्त्व पाया जाता है जैसे कि उद्योग, आवागमन के साधन मुद्रा इत्यादि। मानव की विविध प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के साधनों या माध्यमों को हम सभ्यता कह सकते हैं। मैथ्यू आरनोल्ड, अल्फ्रेड वेबर तथा मैकाइवर आदि विद्वानों ने संस्कृति के भौतिक पक्ष को ही सभ्यता कहा है। 

सभ्यता का अर्थ (sabhyata kise kahate hain)

सभ्यता शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'Civitas' तथा 'Civis' शब्दों से हुई है जिनका अर्थ क्रमशः 'नगर' तथा 'नगर निवासी' है। इस दृष्टि से सभ्यता का अर्थ उन नगरों या नगर निवासियों से है जो एक स्थान पर स्थायी रूप से निवास करते हैं, शिक्षित हैं तथा जिनका व्यवहार जटिल है।

अन्य शब्दों में उच्च एवं विकसित संस्कृति को ही सभ्यता कहा जाता है। 

सभ्यता की परिभाषा (sabhyata ki paribhasha)

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार," सभ्यता से हमारा अर्थ उस सम्पूर्ण प्रविधि तथा संगठन से है जिसे कि मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियन्त्रित करने के प्रयत्न से बनाया है।" 

ग्रीन  के अनुसार," एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जब उसके पास एक लिखित भाषा विज्ञान, दर्शन, अत्यधिक विशेषीकरण वाला श्रम विभाजन, एक जटिल तकनीकी तथा राजनीतिक पद्धति हो।" 

इस प्रकार हम कहे सकते है कि मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के माध्यम या साधन सभ्यता के परिचायक होते हैं। सभ्यता के अन्तर्गत उन समस्त साधनों को सम्मिलित किया जाता है, जो मानव की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित होते हैं तथा मानवीय जीवन के लिए आवश्यक होते हैं।

सभ्यता की विशेषताएं अथवा लक्षण (sabhyata ki visheshta)

सभ्यता के प्रमुख लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित है-- 

1. आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन

आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मानव द्वारा सभ्यता के विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता है। 

दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि सभ्यता मानव की किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति करती है।

2. परिवर्तनशील 

मानव की आवश्यकताओं में वृद्धि के साथ-साथ परिवर्तन होता रहता है। इसके परिणामस्वरूप आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले साधनों में भी परिवर्तन होता जाता है। जैसे पहले ठण्डे पानी के लिए मिट्टी के घड़े का इस्तेमाल होता था परन्तु आजकल कूलर या फ्रिज का इस्तेमाल किया जाता है। 

3. संचरणशील  

सभ्यता में उपयोगिता का तत्त्व अधिक मात्रा में होता है। इसी कारण सभ्यता एक स्थान से दूसरे स्थान तक तीव्रता से फैल जाती है। चाहे कोई दवाई हो या उन्नत ढंग का कपड़ा, जैसे ही किसी देश में इसका आविष्कार होता है शीघ्र ही उसका विश्व में इसका प्रसार हो जाता है।  

4. अग्रसर होना

सभ्यता निरंतर आगे बढ़ती रहती है। अगर यातायात के साधनों को देखें तो पता चलता है कि प्रत्येक आविष्कार से गति की मात्रा बढ़ी है। पहले बैलगाड़ी, फिर मोटर व रेलगाड़ी और आजकल ध्वनि के वेग की गति से भी तेज उड़ने वाले विमानों का आविष्कार हो चुका है। 

5. बाह्य आचरणों से संबंधित 

सभ्यता मानव के बाहरी आचरणों से सम्बन्धित होती है। 

समाज में जो बाहरी आचरण किया जाता है वह सभ्यता का परिचायक माना जाता है। उदाहरणार्थ, हमारे कपड़े हमारी सभ्यता के परिचायक हैं। 

6. प्रविधियों से सम्बन्धित 

सभ्यता के अन्तर्गत मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले उपकरणों का समावेश होता है। 

7. भौतिक स्वरूप 

सभ्यता का स्वरूप भौतिक होता है। इसको देखा व स्पर्श किया जा सकता है। इस संसार में जितने भी भौतिक उपकरण एवं साधन है, जोकि हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित हैं, उन्हें हम सभ्यता के अन्तर्गत ही रखते हैं।

8. सभ्यता साधन है, साध्य नहीं 

सभ्यता हमारी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन मात्र है साध्य नही हैं।

संदर्भ; उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय 

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