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6/28/2021

नगरीय परिवार की विशेषताएं

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नगरीय परिवार 

नगरीय परिवार से हमारा अभिप्राय ऐसे परिवार से है जिसका उद्भव नगरों मे हुआ हो अर्थात् जो नगरीय वातावरण में विकसित हुए हो। आधुनिक औद्योगीकरण नगरीयकरण और वर्तमान शिक्षा तथा पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से परिवारों का प्राचीन परम्परागत स्वरूप परिवर्तित हो रहा है। परिवार का यह परिवर्तित स्वरूप अपने कार्यात्मक संगठन और संरचनात्मक प्रकृति मे नगरीय वातावरण मे एक भिन्न स्वरूप लिए विकसित हुआ है जिसे नगरीय परिवार के नाम से संबोधित किया जा सकता है।

नगरीय परिवार की विशेषताएं (nagariya parivar ki visheshta)

नगरीय परिवार की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. व्यक्तिवादी दृष्टिकोण 

नगरीय परिवार का व्यक्ति व्यक्तिवादी होता है। वह स्वयं अपनी इच्छाओं का मालिक है। वह वही करता है जो उसकी इच्छा है। उसकी सूची मे अच्छा और खराब शब्द नही होते। वह अपने स्वार्थों, इच्छाओं और महत्वकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए किसी भी माध्यम को अपना सकता है। उस पर न किसी का अंकुश, दबाव अथवा नियंत्रण है। इसलिए वह अपने बनाये हुए घेरे में जीता और मरता है।

2. स्वार्थी परिवार 

इन परिवारों के दूसरे परिवारों अथवा व्यक्तियों से संबंध सामान्यतः स्वार्थों पर आधारित होते है। ये अपने संबंध उन्हीं से रखते है जहाँ इनके स्वार्थों की पूर्ति प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से होती है। इसलिए इनके संबंध किसी से सामान्यतः स्थायी नही होते बल्कि स्वार्थों के अनुसार इनके संबंध दूसरों से टूटते और बनते रहते है।

3. कम अतिथि सत्कार

नगरीय परिवारों मे अतिथि सत्कार की परम्परा न तो पहले थी और न अब है। यद्यपि औपचारिक रूप से सभी परिवारों मे अतिथि की आवभगत की जाती है। वे समय से इतने दबे हुए होते है कि उनके पास अच्छी प्रकार से आवभगत करने का अवसर ही नही होता। साथ ही साथ नगरीय परिवारों के सामने भौतिकवाद द्वारा प्रस्तुत की गई इतनी समस्याएं है कि नगरीय परिवार अब अधिक आत्मकेन्द्रित बन गये है जिससे अतिथि सत्कार इत्यादि का महत्व ही समाप्त हो गया है।

4. सीमित आकार 

ग्रामीण परिवार मे पति-पत्नी और उनके बच्चों के अतिरिक्त विवाह तथा रक्त संबंधित अन्य बहुत से व्यक्ति भी परिवार मे रहते है। नगरीय परिवार का आकार पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चों तक ही सीमित रह गया है।

5. परम्पराओं का कम महत्व 

नगरीय परिवार के व्यक्ति प्राकृतिक वातावरण से दूर होने के कारण तथा केन्द्रक ढांचे मे होने के कारण परम्पराओं को कम महत्व देते है।

6. अर्ध टूटे परिवार 

इन परिवारों मे कुछ ऐसा परिवार होते है जिसमें पत्नी किसी दूसरे नगर में कार्य करती है और पति किसी दूसरे मे। बच्चे या तो पिता के साथ रहते है अथवा माता के साथ। महानगरों मे ऐसे परिवारों की संख्या अधिक होती है।

7. दिनचर्या मे अंतर 

नगरीय परिवार के प्रत्येक सदस्य की दिनचर्या एक दूसरे से भिन्न होती है। पिता किसी समय काम पर जाता है और पत्नी किसी समय। लड़के और लड़कियां अलग-अलग कार्यालयों मे अलग-अलग समय मे जाते है। इसी तरह प्रत्येक सदस्य के घुमने, खाने और सोने का समय भी अलग-अलग है।

8. बच्चों की कम संख्या 

ये परिवार क्योंकि बहुत जागरूक होते है। इन्हें अपने अधिकार, कर्तव्य और उत्तरदायित्व ज्ञात होते है। इसलिए इनके परिवार में एक या दो बच्चे ही होते है। ये अपने परिवार को सीमित रखते है जिससे कि वे इन्हें योग्य नागरिक बना सकें। अस्तु नगरीय परिवार बड़े और विशाल नही होते है।

9. विवाह-विच्छेद की अधिक संख्या 

नगरीय परिवार में स्त्री शिक्षित और कामकाजी महिला होती है। वह आत्मनिर्भर होती है। उसका अपना सोचने का ढंग है। उसका अपना व्यक्तित्व है। यहाँ सजातीय और अन्तरजातीय विवाह दोनों ही होते है। पर किसी भी दशा मे स्त्री अब पुरूष की दासी बनकर नही रहना चाहती। वह शोषण के विरुद्ध संघर्ष करती है। यदि पुरूष अत्याचार करता है अथवा वह परस्पर मेल-मिलाप से नही रहना चाहता है तो स्त्री अथवा पुरूष तलाक लेना अधिक उचित समझते है। इसलिए नगरों में तलाक देने की संख्या मे निरन्तर वृद्धि हो रही है।

10. नियंत्रण का अभाव 

नगरीय परिवारों मे प्रायः अनौपचारिक नियंत्रण की कमी रहती है। इसका प्रमुख कारण तो यह है कि परिवार के सब सदस्य स्वतंत्र रहते है, स्वयम् पढ़े लिखे होते है तथा तार्कित बुद्धि के होते है। इसलिए सभी सदस्य अत्यधिक नियंत्रण को पसंद नही करते।

11. आध्यात्मिकता की कमी 

नगरीय परिवारों मे लगभग सभी सदस्य थोड़े बहुत पढ़े लिखे होते है फलस्वरूप इन परिवारों के सदस्य धार्मिक विचार के न होकर निरपेक्ष हो जाते है और आध्यात्मिकता की बातों को छोड़कर भौतिकवाद की ओर अधिक विश्वास बना लेते है। नगरीय परिवार धार्मिकता और आध्यात्मिकता से परे इसलिए भी रहते है कि उनके चारों ओर का वातावरण कृत्रिम होता है।

12. केन्द्रक परिवार 

औद्योगिकरण के कारण परिवार का स्वरूप नगरों मे बदला है। भारत के नगरों मे केन्द्रक परिवार की प्रक्रिया विकसित हुई है। नगरीय परिवार का रूप प्रायः एकाकी या केन्द्रक ही दृष्टिगत होता है जिसमे पति-पत्नी और उनके बच्चे होते है।

13. पारिवारिक समितियां

नगरों मे परिवार के बहुत से कार्य एजेन्सियों द्वारा किये जाने लगे है, जैसे मातृत्व अस्पताल, शिशु शालायें तथा बालोद्दान, बच्चों के अस्पताल, बाल पालक, होटल तथा रैस्टोरेंट, परिवार को राजकीय सहायता, क्लब, सिनेमा आदि मनोरंजन के साधन। इन सब समितियों के विकास के नगरीय पारिवारिक संगठन को शिथिल कर दिया है।

14. आर्थिक कार्यों मे सन्तान का सहयोग नही 

ग्रामीण परिवार में बच्चे भी उत्पादन की इकाई समझे जाते है, क्योंकि वे अपनी क्षमतानुसार आर्थिक कार्यों मे सहयोग प्रदान करते है। लेकिन नगरीय परिवारों मे सन्तानें अपने माता-पिता के साथ आर्थिक कार्यों मे किसी प्रकार का सहयोग प्रदान नही करते।

यद्यपि किसी-किसी परिवार में शिक्षित पत्नी नौकरी करके पति का उत्पादन मे सहयोग देती है लेकिन सन्तान नही। यही कारण है कि नगरीय परिवारों के बच्चे काफी पढ़-लिख जाने और अधिक आयु के होने जाने के बाद भी पारिवारिक आय पर निर्भर रहते है।

15. स्त्री की समान स्थिति 

नगरीय परिवार मे स्त्रियों की स्थिति पुरूष की तरह समान है। वह पुरूष की सहभागी है। वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है। शिक्षित है वह विभिन्न विषयों और समस्याओं पर अपने विचार स्वतंत्र रूप से प्रकट करती है। वह जिस रूप में संयुक्त परिवार के व्यक्तियों की दास थी-- अब नही है। परिवार मे उसका स्थान अब सम्मानजनक है और पति भी उसे सहभागी और मित्र के रूप मे देखता है।

यह भी पढ़ें; ग्रामीण और नगरीय समाज में अंतर

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