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1/28/2021

वित्तीय प्रशासन के अभिकरण

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वित्तीय प्रशासन के अभिकरण 

वित्तीय प्रशासन के संचालन तथा नियंत्रण मे मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिकरण इस प्रकार है--

1. व्यवस्थापिका 

प्रजातंत्र मे धन पर व्यवस्थापिका का ही पूर्ण अधिकार होता है। व्यवस्थापिका जनता का प्रतिनिधित्व करती है, अतः आय-व्यय उसके अधिकार मे होता है। बिना इसकी स्वीकृति के कार्यपालिका न तो किसी नये धन का संचय कर सकती है और न ही धन को खर्च कर सकती है। वार्षिक बजट पास करना व्यवस्थापिका का एक महत्वपूर्ण कार्य है। जिन देशों मे संसदीय प्रजातंत्र है, वहां व्यवस्थापिका के कर्तव्यों मे निम्न कर्तव्य शामिल होते है---

(क) यह वार्षिक आय और व्यय का विवरण (बजट) पास करती है।

(ख) नए कर लगाना और प्रचलित करों मे संशोधन करना।

(ग) लोक ऋण की व्यवस्था करना।

(घ) व्यय करने वाली शक्तियों के ऊपर लेखा परीक्षण द्वारा नियंत्रण करना।

अनेक प्रजातंत्र देशों मे यह कार्य व्यवस्थापिका का जन निर्वाचित निम्म सदन करता है। इंग्लैंड मे कामन्स सभा तथा भारत मे लोकसभा इन कर्तव्यों को पूरा करती है।

2. कार्यपालिका 

वित्तीय प्रशासन से संबंधित दूसरा महत्वपूर्ण अभिकरण कार्यपालिका होती है। बजट बनाने का उत्तरदायित्व कार्यपालिका पर होता है, क्योंकि वही वित्तीय नीति का निर्धारण करती है। किसी विभाग के कुशल संचालन के लिए कितने धन की आवश्यकता होगी या किसी भी कल्याणकारी योजना को चलाने मे कितना व्यय होगा इन सब, बातों पर निर्णय कार्यपालिका ही लेती है। कर्मचारियों के वेतन, भविष्य निधि एवं अन्य प्रासंगिक व्ययों के बाबत् विधायिका अनुमान नही लगा सकती, इन सबका निश्चय कार्यपालिका करती है। यद्यपि शासन के समस्त विभाग बजट निर्माण मे अपनी भूमिका अदा करते है, तथापि इन सबमे वित्त विभाग ही शीर्ष पर रहता है। विभिन्न विभागों से पूर्व वर्षों के वास्तविक व्यय एवं आगामी वर्षों के अनुमान पूछने से वित्त विभाग अपनी कार्यवाही शुरू करता है तथा समस्त विभागों के दस्तावेजों तथा प्रपत्रों को राष्ट्रीय आवश्यक के अनुसार अंतिम रूप देता है।

3. राजकोष तथा वित्त विभाग 

वित्त व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण विभाग केन्द्रीय वित्त विभाग है। इसे इंग्लैंड मे राजकोष और बहुत से अन्य देशों मे वित्त मंत्रालय कहते है। बजट इसी के द्वारा बनाया जाता है। देश की वित्त व्यवस्था तथा वित्त प्रक्रिया पर इसी का अधिकार होता है। इसका सर्वोच्च अधिकारी वित्तमंत्री होता है। उसके कार्यों मे देशव्यापी व्यय व्यवस्था का निरीक्षण, करों का एकीकरण, अर्थव्यवस्था से संबंधित प्रशासनिक विभागों को वित्तीय परामर्श देना तथा सार्वभौम आर्थिक नियंत्रण आदि शामिल है। अमेरिका मे वित्त व्यवस्था के लिए ऐसी कोई सुसंगठित संस्था नहीं है। यह कार्य कई विभागों मे बंटा है। एक बजट समिति है, कोष विभाग है, प्रधान नियंत्रणकर्ता है तथा अन्य दूसरे संस्थान है, जो अलग-अलग ढंग से अपना कार्य संचालित करते है।

4. शासन के विभिन्न विभाग 

शासन के सभी विभाग वित्तीय प्रशासन से सम्बद्ध रहते है। बजट के पूर्व समस्त विभाग अपने-अपने प्रस्ताव, नई मांगे तथा उनका औचित्य वित्त मंत्रालय के पास भेजते है। वित्त मंत्रालय उनका परीक्षण करके आवश्यकतानुसार प्रस्तावों को बजट मे शामिल करता है। विधायिका द्वारा बजट पारित कर दिए जाने के बाद वित्त संबंधित विभाग को वित्तीय स्वीकृति प्रदान करता है। बजट के पारित होने तथा वित्त विभाग की स्वीकृति के बाद धनराशि का विधिवत उपयोग करने तथा इसका लेखा रखने की जवाबदारी संबंधित विभाग की ही होती है। विभागध्यक्ष का यह कर्तव्य है कि वह यह देखे कि स्वीकृति राशि से ज्यादा धन व्यय न हो तथा जिस कार्य/योजना हेतु वित्तीय स्वीकृति है, इसी पर व्यय किया जावे।

5. लेखा परीक्षण विभाग 

यह विभाग देखता है कि धन का व्यय व्यवस्थापिका के आदेशानुसार हुआ है या नही। यह धन व्यय हो जाने के पश्चात उसकी जांच करता है। इस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी " प्रधान नियंत्रणकर्ता और महालेखा परीक्षण " कहलाता है। इस अधिकारी का प्रमुख कार्य राजकोष से निकले धन पर नियंत्रण करना है। यह देखता है कि राशि बजट के अनुसार निकली है और उसका उचित और नियमित ढंग से व्यय हुआ है। यह विभागों के हिसाब-किताब को देखता है तथा व्यवस्थापिका को बजट के अनुसार न होने वाले व्यय का ब्यौरा देता है। भारत मे परीक्षण तथा लेखा दोनों एक ही अधिकारी के हाथों मे है। एक ही संस्थान मे दो प्रकार के कार्य होते है। अमेरिका मे यह विभाग इन दो कार्यों के अलावा एक तीसरा कार्य भी करता है। वह यह भी देखता है कि व्यय ठीक और कानून के अनुकूल हो रहा है अथवा नही, लेकिन यह कार्यपालिका के पास रहना ही अधिक ठीक है। लेखा परीक्षक के अधिकार कार्यपालिका की सीमा से बाहर होते है। भारतीय संविधान की धारा 148 के अंतर्गत महालेखा तथा गणना अधिकारी के कार्यों की व्यापक व्यवस्था है। इस अधिकारी द्वारा प्रतिवर्ष अपने कार्यों का प्रतिवेदन संसद के सम्मुख प्रस्तुत करना होता है। उसे केवल संसद के समक्ष उत्तरदायी बनाया गया है।

6. संसदीय समितियां 

यद्यपि विधायिका को पर्याप्त वित्तीय अधिकार दिए गए है। तथापि किसी भी संसद या विधायिका को इतना समय नही मिल पाता कि वह केवल एक ही कार्य करे। मूलतः वह अपनी कुछ समितियां नियुक्त करती है, जिनमे अनुमान समिति तथा लोक लेखा समिति प्रमुख होती है। अनुमान समिति सरकार के विभिन्न विभागों के व्यय मे मितव्ययिता लाने के सुझाव देती है और लोक लेखा समिति नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन को दृष्टिगत रखते हुए विनियोजन लाखों की जांच करती है और उसमे पाई जाने वाली अनियमितताओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करती है एवं भविष्य मे उसकी रोकथाम के सुझाव देती है।

7. रिजर्व बैंक 

वैसे तो उपर्युक्त 6 कारकों को ही परम्परागत रूप से वित्तीय प्रशासन का अंग माना जाता है तथापि रिजर्व बैंक एक ऐसी एजेंसी होती है जो कि देश के लिए मुद्रा का निर्गमन करती है तथा देश के अन्य बैंकों को नीतिगत निर्देश जारी करती है। देश की अर्थव्यवस्था का आकलन करना तथा इस हेतु सलाह देना रिजर्व बैंक का कार्य है। सरकार के लिए हुण्डियों को खरीदने व बेचने का कार्य भी यही बैंक करता है। वर्तमान वित्तीय प्रशासन के अभिकरण मे रिजर्व बैंक को भी मान्य किया जाने लगा है।

निष्कर्ष 

सरकारी धन जनता की धरोहर होता है जो कि शासन के पास अमानत के रूप मे रहता है। इस धरोहर का दुरूपयोग नही होना चाहिए। वित्तिय प्रशासन एवं वित्तीय नियंत्रण का उद्देश्य व्यय मे ईमानदारी तथा मितव्ययिता लाना होता है। चूंकि सरकारी धन करदाताओं द्वारा दिया जाता है, अतः वित्तीय अभिकरणों का कार्य यह देखना है कि करदाता के धन का ठीक प्रकार से एवं समुचित तरीके से उपयोग किया जा रहा है या नही। वित्तिय प्रशासन का कार्य यह देखना भी होता है कि जिस कार्य के लिए एक पैसा पर्याप्त हो, उस पर एक रूपया न खर्च किया जाये और यह भी कि एक पैसा भी किसी के व्यक्तिगत लाभ के लिए नही अपितु सम्पूर्ण समाज के लाभ के खर्च किया जाये।

शायद यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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