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1/28/2021

वित्तीय प्रशासन का अर्थ, सिद्धांत, कार्य

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वित्तीय प्रशासन का अर्थ (vittiya prashasan kya hai)

vittiya prashasan arth siddhan karya;वित्तीय प्रशासन एक ऐसी व्यवस्था है जो उन नीतियों का निर्माण करता है, जिनके द्वारा लोकसेवाओं के संचालन के लिए धन प्राप्त किया जाता है, व्यत किया जाता है और उसका हिसाब रखा जाता है। वित्तीय प्रशासन मे वे क्रियाएं आती है, जो लोक सेवाओं पर व्यय किये जाने के लिए जरूरी है नीतियों के प्राप्त करने, व्यय करने तथा लेखा रखने से संबंध रखती है। इसका संबंध उन साधनों से होता है, जिसके द्वारा प्रशासन हेतु धन की व्यवस्था की जाती है। वित्तीय प्रशासन की क्रियाओं का आशय धन एकत्र करना और शासन के लिए प्रस्तुत करना है। इसके अंतर्गत यह भी देखा जाता है कि धन का सदुपयोग हो रहा है या नही तथा धन का व्यय कानून के अनुसार है अथवा नही। प्रजातंत्र देशों मे व्यवसायिकता कर लगाती है तथा बजट पास करती है। वित्तीय प्रशासन यह देखता है कि जनता पर अनुचित कर भार तो नही है, व्यय की राशि उचित रूप से खर्च की जा रही है या नही तथा लेखांकन ठीक है या नही।

वित्तीय प्रशासन मे दक्षता, मितव्ययिता और सार्वजनिक कल्याण को एक साथ मिलाना पड़ता है। बजट, बजट की विधायी अनुमति, बजट का पालन, राजकोष का प्रबंध वित्तीय उत्तरदायित्व तथा लेखांकन तथा लेखा परीक्षण वित्तीय प्रशासन के विषय है। इस वित्तीय प्रशासन के अंतर्गत राजकीय आय का एकीकरण संरक्षण और वितरण आय-व्यय का समायोजन, राजकीय ॠणों की व्यवस्था, वित्त पर राजकीय नियंत्रण आदि का समावेश्सा होता है।

वित्तीय प्रशासन के सिद्धांत (vittiya prashasan ke siddhant)

वित्तीय प्रशासन की कुशलता के लिये जिन सिद्धांतों को आवश्यक माना जाता है वे इस प्रकार हैं--

1. प्रभावशाली नियंत्रण 

वित्तीय व्यवस्थाओं पर विधायिका एवं कार्यपालिका का प्रभावशाली नियंत्रण आवश्यक है।

2. विधायिका की भावनाओं की अभिव्यक्ति 

वित्तीय मामलों मे विधायिका की भावनाओं के अनुसार ही कार्यवाही की जाना चाहिए क्योंकि वही जन इच्छाओं को अभिव्यक्त करने वाली संस्था होती है।

3. संगठन और एकता 

किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था मे शासन मे एकरूपता होना चाहिए। इस हेतु वित्तीय संगठन का एकीकरण करके उसमे अधिकारियों के उत्तरदायित्व निश्चित किये जाने चाहिए। अधिकारियों के मध्य उचित समन्वय भी होना चाहिए।

4. सरलता 

वित्तीय प्रशासनिक व्यवस्था सरल किन्तु समुचित होना चाहिए। सरल से आशय यह है कि वित्तीय कार्यों का सम्पादन शीघ्रता और मितव्ययिता से हो सके।

वित्तीय प्रशासन के कार्य (vittiya prashasan ke karya)

वित्तीय प्रशासन के कार्य इस प्रकार है--

1. बजट तैयार करना अर्थात् यह अनुमान लगाना कि आने वाले वित्त वर्ष मे क्या-क्या आय तथा व्यय होगे?

2. उस आय-व्यय को व्यवस्थापिका अथवा अन्य उचित सत्ता द्वारा स्वीकृत करना।

3. बजट को कार्यान्वित करना अर्थात्  स्वीकृति आय-व्यय के अनुसार कर उगाहना तथा व्यय करना।

4. राजकोष का प्रबंध अर्थात् जमा की धनराशि सुरक्षा तथा व्यय के लिए धन निकालने की व्यवस्था।

5. लेखांकन तथा लेखा परीक्षण अर्थात् कार्यकारी वर्ग को हिसाब देना तथा लेखाधिकारी के द्वारा उसका परीक्षण कराना।

वित्तीय प्रशासन के तत्व 

वित्तीय प्रशासन मे निम्न तत्व शामिल होते है--

1. धन संबंधी नीति का निर्धारण करना, कार्यपालिका के द्वारा बजट तैयार करना, अर्थात् आय-व्यय का अनुमान लगाना।

2. आय-व्यय के अनुमान पर व्यवस्थापिका की स्वीकृति प्राप्त करना।

3. व्यवस्थापिका की स्वीकृति के बाद बजट को व्यावहारिक रूप प्रदान करना।

4. प्रबंध संबंधी तत्व, इसके अंतर्गत स्वीकृति वित्तीय संगठन, विभिन्न वित्तीय अधिकारी उनके कर्तव्य, बजट संबंधी प्रक्रिया, लेखा परीक्षण तथा व्यवस्थापिका के सामने प्रतिवेदन आदि कार्य शामिल है।

वित्तीय प्रशासन एक ऐसी व्यवस्था है जो उन नीतियों का निर्माण करता है जिनके द्वारा लोक सेवाओं मे संचालन हेतु धन प्राप्त किया जाता है, व्यय किया जाता है और उसका लेखा रखा जाता है।

यह भी पढ़ें; वित्तीय प्रशासन के अभिकरण

शायद यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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