5/29/2022

प्रबंध का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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प्रबंध का अर्थ (prabandh kya hai)

prabandh arth paribhasha visheshta;वास्‍तव में प्रबन्‍ध एक अत्‍यन्‍त जटिल एवं गूढ़ शब्‍द है। कुछ विद्वान प्रबन्‍ध को एक प्रक्रिया मानते हैं तो कुछ विद्वानों के अनुसार यह काम कराने की एक युक्ति है, जो लोग इस प्रकार दूसरों से काम सम्‍पन्‍न कराते हैं, प्रबन्‍धक कहलाते हैं। कुछ लोग प्रबन्‍ध शब्‍द को समूह वाचक संज्ञा के रूप में उच्‍च स्‍तर के प्रबन्‍ध के पर्यायवाची के रूप में लेते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग इसे मशीन, श्रम, माल व बाजार आदि उत्‍पादन तत्त्वों के समन्‍वय की एक तकनीक कहते हैं, जबकि कुछ लोग प्रबन्‍ध को विज्ञान भी कहते हैं। 

प्रबंध की परिभाषा (prabandh ki paribhasha)

(अ) प्रबन्‍ध की निर्णयन एवं नेतृत्‍व प्रधान परिभाषाएं 

रॉस मूरे के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध का आशय निर्णय लेना है।"

स्‍टेनले वेन्‍स के अनुसार, ‘‘संक्षेप में प्रबन्‍ध का आशय निर्णय लेने तथा मानवीय क्रियाओं पर नियंत्रण रखने की प्रक्रिया से है जिससे कि पूर्व निर्धारित लक्ष्‍य आसानी से प्राप्‍त किया जा सकें।"

(ब) प्रबंध की कार्यात्‍मक परिभाषाएं

हेनरी फेयाल के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध करने का आशय पूर्वानुमान करना एवं योजना बनाना, संगठित करना, निर्देश देना, समन्‍वय करना एवं नियंत्रित करना है।"

डेविस के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध सर्वत्र कार्यकारी नेतृत्‍व का कार्य है। यह संगठन के उद्देश्‍यों की पूर्ति के लिये इसकी क्रियाओं के नियोजन, संगठन एवं नियंत्रण करने का कार्य है।"

(स) प्रबन्‍ध की मानव प्रधान परिभाषाएं 

लॉरेन्‍स एप्‍पले के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध व्‍यक्तियों का विकास है, न कि वस्‍तुओं का निर्देशन।"

(द) प्रबन्‍ध की कार्य करवाने की कला सम्‍बन्‍धी परिभाषाएं 

हिक्‍स एवं गुलेट के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध दूसरों के द्वारा तथा उनके माध्‍यम से कार्य करवाने की प्रक्रिया है।"

(ई) प्रबंध की ज्ञान के क्षेत्र एवं तकनीक सम्‍बन्‍धी परिभाषाएं

एल.ए.एलन के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध व्‍यवस्थित ज्ञान का समूह है, जो व्‍यावसायिक पेशे के सन्‍दर्भ में प्रमाणन योग्‍य कुछ सामान्‍य सिद्धांतों पर आधारित है।"

पीटरसन तथा प्‍लोमेन के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध का तात्‍पर्य उस तकनीक से है जिसके द्वारा एक विशिष्‍ट मानव समुदाय के उद्देश्‍यों का निर्धारण, स्‍पष्‍टीकरण एवं क्रियान्‍वयन किया जाता है।"

प्रबन्‍ध की ऊपर दी गयी परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रबन्‍ध का आशय उस कला से है जिसके द्वारा प्रशासन द्वारा निर्धारित नीतियों को कार्यान्वित किया जाता है तथा सामान्‍य उद्देश्‍यों की प्राप्ति के लिये मानवीय क्रियाओं का निर्देशन, संचालन, नेतृत्‍व तथा नियंत्रण किया जाता है।

प्रबंध की विशेषताएं (prabandh ki visheshta)

प्रबन्‍ध मानवीय संगठनों का एक विशिष्‍ट कार्य है। इसके अर्थ, अवधारणा एवं प्रकृति को सही रूप में समझने के लिए इसकी प्रमुख विशेषताओं का अध्‍ययन करना आवश्‍यक है। प्रबन्‍ध की मुख्‍य विशेषताएं निम्‍नलिखित हैं--

1. एक प्रक्रिया अथवा कार्य 

प्रबन्‍ध संस्‍था के भौतिक एवं मानवीय संसाधनों को संयोजित करके निर्धारित लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने की प्रक्रिया है। इसमें नियोजन, संगठन, समन्‍वय, निर्देशन, अभिप्रेरण व नियंत्रण आदि कार्य सम्मिलित हैं। प्रबन्‍ध प्रक्रिया के माध्‍यम से ही संगठन के संसाधनों को उत्‍पादन एवं लाभ में रूपान्‍तरित किया जाता है। यह व्‍यक्तियों का निर्देशन करने एवं परिणाम प्राप्‍त करने की प्रक्रिया है। 

पीटर एफ. ड्रकर लिखते हैं कि ‘‘ प्रबन्‍ध एक कार्य है, अतः इसका अपना कौशल, अपने उपकरण एवं अपनी तकनीकें होती हैं।"

2. मानवीय प्रक्रिया 

प्रबन्‍ध मानवीय व्‍यवहार एवं प्रयासों के नियोजन, संगठन, निर्देशन, अभिप्रेरण एवं नियंत्रण से सम्‍बन्धित है। मानव एवं उसका व्‍यवहार ही प्रबन्‍ध की मुख्‍य विषयवस्‍तु है। 

पीटर एफ. ड्रकर के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध कार्य है, प्रबन्‍ध एक विधा है। किन्‍तु प्रबन्‍ध व्‍यक्ति भी है। प्रबन्‍ध की हर उपलब्धि प्रबन्‍धक  की उपलब्धि है। हर सफलता प्रबन्‍धक की सफलता है। व्‍यक्ति प्रबन्‍ध करते हैं न कि ‘‘शक्तियों‘‘ अथवा ‘‘तथ्‍य‘‘। प्रबन्‍धकों की दृष्टि, समर्पण व सत्‍यनिष्‍ठा की यह निर्धारित करती है कि वहां प्रबन्‍ध है या कुप्रबन्‍ध।" प्रबन्‍ध की मानवीय प्रकृति के कारण ही लॉरेन्‍स एप्‍पले ने कहा है कि, ‘‘प्रबन्‍ध व्‍यक्तियों का विकास है, निर्जीव वस्‍तुओं का निर्देशन नहीं।"

3. सामाजिक प्रक्रिया 

प्रबन्‍ध को सामाजिक प्रक्रिया भी माना गया है, क्‍योंकि इसमें व्‍यक्तियों के अन्‍तर-सम्‍बन्‍धों को सम्मिलित किया जाता है। एक उद्योग अथवा व्‍यवसाय स्‍वयं में एक समुदाय है जो विभिन्‍न वर्गो-अंशधारियों, कर्मचारियों, पूर्तिकर्ताओं, ग्राहकों, सरकार, व्‍यावसायिक संस्‍थाओं आदि के सहयोग से संचालित होता है। प्रबन्‍धक को इन सभी वर्गो के पारस्‍परिक सम्‍बन्‍धी, हितों व कल्‍याण के लिए उत्तरदायी रहना होता है। प्रबन्‍ध लक्ष्‍यों की पूर्ति से व्‍यक्तियों का सहयोग एवं योगदान प्राप्‍त करने का उत्तरदायित्‍व है। सामाजिक प्रक्रिया के कारण ही प्रबन्‍धक में सामाजिक कौशल का गुण होना आवश्‍यक है। 

ई.एफ.एच. ब्रेच के अनुसार, ‘‘संगठन में मानवीय तत्त्वों की सर्वव्‍यापकता ही प्रबन्‍ध को सामाजिक प्रक्रिया का स्‍वरूप प्रदान करती है।"

4. मानवीय संगठनों से सम्‍बन्धित 

प्रबन्‍ध मानवीय संगठनों का ही किया जाता है। पशुओं, भौतिक संसाधनों, यंत्रों, भूमि-भवनों तथा अन्‍य निर्जीव वस्‍तुओं का प्रबन्‍ध नहीं होता, क्‍योंकि इन्‍हें निर्देश देना तथा उनको पालन करवाना सम्‍भव नहीं होता है। 

कारलिसले के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध मानवीय संगठनों से सम्‍बन्धित कार्य है। पशुओं का प्रशिक्षक प्रबन्‍धक नहीं होता है, जबकि मनुष्‍यों का प्रशिक्षक प्रबन्‍धक हो सकता है।‘‘ सर्कस में पशुओं से कार्य लेने वाला ‘प्रशिक्षक‘ कहलाता है, प्रबन्‍धक नहीं। 

5.एकीकृत प्रक्रिया  

प्रबन्‍ध सामूहिक अपने विशिष्‍ट कार्यो जैसे नियोजन, संगठन निर्देशन, नियंत्रण समन्‍वय आदि की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें इन सभी कार्यो को एक संयोजित एंव एकीकृत प्रक्रिया के रूप में किया जाता है। ये सभी कार्य पृथक-पृथक या एकाकी रूप से निष्‍पादित नहीं किये जाते हैं। ये सभी कार्य एक-दूसरे से सम्‍बन्धित एवं प्रभावित होते है। 

ब्रेच के अनुसार, ‘‘प्रबन्‍ध एक एकीकृत या संयोजित प्रक्रिया है।"

6. सामूहिक प्रयास 

प्रबन्‍ध सामूहिक प्रयासों की व्‍यवस्‍था है। इसकी आवश्‍यकता व्‍यक्ति विशेष के प्रयासों के लिए नहीं होती है। संगठन के लक्ष्‍यों की प्राप्ति एक व्‍यक्ति की तुलना में सामूहिक रूप से कर पाना ज्‍यादा सुगम होता है। समूह के प्रयासों को समन्वित करने व प्रभावी बनाने के लिए प्रबन्‍धकीय निर्देशन एवं नियंत्रण की आवश्‍यकता होती है। प्रबन्‍ध की समूह प्रकृति के कारण ही कूण्‍ट्ज एवं ओ‘डोनेल ने अपनी परिभाषा में, ‘‘औपचारिक रूप से संगठित समूहों‘‘, चार्ल्‍स रेनाल्‍ड ने ‘‘समुदाय का अभिकरण‘‘ तथा लॉरेन्‍स एप्‍पले ने ‘‘दूसरे व्‍यक्तियों के प्रयास‘‘ शब्‍दों का प्रयोग किया है।

7. पदानुक्रम व्‍यवस्‍था

प्रबन्‍ध अधिकारों की एक श्रेणीबद्ध व्‍यवस्‍था है। इसी कारण व्‍यक्तियों को स्थितियों, भूमिकाओं, सत्ता व दायित्‍वों में भेद हो जाता है। संस्‍था में कर्मचारियों के निर्देशन, अभिप्रेरण व नियंत्रण की आवश्‍यकता होती है। बड़े अधिकारी अपने अधीनस्‍थों को आदेश-निर्देश देते हैं, नियमानुसार कार्य करवाते हैं तथा कार्य की प्रगति के बारे में पूछते हैं। वे अपने अधीनस्‍थों का नेतृत्‍व करते है। 

हरविसन तथा मेयर्स ने लिखा है कि, ‘‘प्रबन्‍ध वास्‍तविक अर्थो में नियम बनाने व लागू करने वाली संस्‍था है। यह स्‍वयं में उच्‍च अधिकारियों एवं अधीनस्‍थों के सम्‍बन्‍ध जाल में बंधी हुई होती है। 

8. समन्‍वयकारी शक्ति 

प्रबन्‍ध एक समन्‍वयकारी शक्ति है। यह व्‍यक्तियों के कार्यो में सामंजस्‍य स्‍थापित करने, विभिन्‍न वर्गो के हितों को समन्वित करने तथा संस्‍था के उद्दश्‍यों व उपलब्‍ध संसाधनों के मध्‍य एकीकरण करने की प्रक्रिया है। प्रबन्‍धक अपने समस्‍त कार्यो-नियोजन संगठन, निर्देशन, अभिप्रेरण, नियंत्रण आदि में समन्‍वय के तत्त्व पर अधिक बल देता है। प्रबन्‍ध का आधारभूत स्‍वरूप समन्‍वयकारी ही है। 

9. उद्देश्‍यपूर्ण 

प्रबन्‍ध संस्‍थान के लक्ष्‍यों की प्राप्ति का महत्त्वपूर्ण साधन है। इन उद्देश्‍यों की प्राप्ति के लिए उसे नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण, समन्‍वय तथा नियंत्रण के महत्त्वपूर्ण कार्य करने होते हैं, प्रबन्‍धकीय सफलता का मूल्‍यांकन पूर्व-निर्धारित उद्देश्‍यों की पूर्ति के आधार पर ही किया जा सकता है। कोई अधिकारी अपने अधीनस्‍थों को आदेश-निर्देश देने व उन पर अधिकार रखने मात्र से प्रबन्‍धक नहीं बन जाता है, प्रबन्‍धक की वास्‍तविक पहचान लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करना है।

मैसी के शब्‍दों में, ‘‘प्रबन्‍धक वास्‍तव में क्रियाशील व्‍यक्ति है।"

इसी प्रकार ड्रकर के यह शब्‍द अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण हैं कि ‘‘प्रबन्‍ध का स्‍वयं अपने लिए ज्ञान से कोई सम्‍बन्‍ध नहीं हैं, इसका सम्‍बन्‍ध निष्‍पादन से है।"

10. पृथक अस्तित्‍व 

आधुनिक व्‍यवसाय में प्रबन्‍ध का एक पृथक स्‍थान बन गया है। यह व्‍यवसाय के स्‍वामियों एवं कर्मचारियों से भिन्‍न व्‍यक्तियों का एक ऐसा वर्ग है जिसके हाथों में प्रबन्‍ध-व्‍यवस्‍था की समस्‍त बागडोर होती है। प्रबन्‍ध निर्णय लेने, नेतृत्‍व प्रदान करने व कार्यो पर नियंत्रण करने वाले व्‍यक्तियों का एक विशिष्‍ट वर्ग है। प्रबन्‍ध अन्‍य व्‍यक्तियों से कार्य करवाने एवं परिणामों के लिए दायी रहने वाले व्‍यक्तियों का एक पृथक वर्ग हैं। मैनी ने प्रबन्‍ध को ‘‘विशिष्‍टता प्राप्‍त वर्ग‘‘ कहा है। यह वर्ग ज्ञान, पद स्थिति व अधिकारों में उच्‍च होता है। वर्तमान में प्रबन्‍धकों के इस विशिष्‍ट वर्ग को पेशेवर प्रबन्‍धकों के रूप में जाना जाता है।

11. अमूर्त शक्ति 

जॉर्ज टेरी ने प्रबन्‍ध को अदृश्‍य शक्ति का संज्ञा दी है। कुछ अन्‍य विद्धानों ने भी प्रबन्‍ध को अस्‍पृश्‍य, अविचारणीय एवं अमूर्त बताया है। इसका आशय है कि प्रबन्‍ध की विद्यामानता को इसके प्रयासों के परिणामों, जैसे-सुव्‍यवस्‍था, कर्मचारी संतुष्टि, श्रेष्‍ठ उत्‍पादन, उत्‍साह, उत्तम नीतियों आदि से अनुभव किया जा सकता है। इसी प्रकार अकुशल प्रबन्‍ध की जानकारी, योग्‍य प्रबन्‍ध की तुलना में, कर्मचारियों व समाज को शीघ्र हो जाती है। 

12. सर्वव्‍यापी प्रक्रिया 

प्रबन्‍ध सर्वव्‍यापी प्रक्रिया है। इसके सिद्धांत, कौशल व तकनीकें सभी प्रकार के मानवीय संगठनों के संचालन में समान रूप से लागू होती है। व्‍यावसायिक एवं गैर-व्‍यावसायिक संगठनों के साथ-साथ प्रत्‍येक देश एवं अर्थव्‍यवस्‍था में संस्‍थाओं की सफलता के लिए प्रबन्‍ध कार्य आवश्‍यक होता है। संगठन के विभिन्‍न स्‍तरों पर भी प्रबन्‍ध प्रक्रिया की समान रूप से आवश्‍यकता होती है। इस प्रकार दूसरे शब्‍दों में यह कहा जा सकता है कि प्रबन्‍धकीय कौशल योग्‍यता एवं अनुभव विभिन्‍न मानवीय संगठनों में हस्‍तान्‍तरणीय है। 

14. कला व विज्ञान दोनों ही

प्रबन्‍ध एक कला एवं विज्ञान दोनों ही है। विज्ञान के रूप में प्रबन्‍ध सुव्‍यवस्थित एवं क्रमबद्ध सिद्धान्‍तों, विधियों व तकनीकों का ज्ञान समूह है। कला के रूप में प्रबन्‍ध इन सैद्धान्तिक नियमों का व्‍यावहारिक प्रयोग है। प्रबन्‍ध की सफलता इसका विधिवत् ज्ञान प्राप्‍त करने एवं व्‍यक्तिगत आधार पर व्‍यवहार में इसके कुशल प्रयोग करने, दोनों ही पर निर्भर करती है। 

टेरी के शब्‍दों में, ‘‘प्रबन्‍ध का अध्‍ययन किया जा सकता है, इसका ज्ञान प्राप्‍त किया जा सकता है तथा इसके प्रयोग में प्रवीणता प्राप्‍त की जा सकती है।"

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